असम के नूरुद्दीन अहमद को पद्मश्री, गांव से राष्ट्रपति भवन तक का प्रेरक सफर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 25-06-2026
Assam's Nuruddin Ahmed receives Padma Shri; an inspiring journey from village to Rashtrapati Bhavan. AI photo
Assam's Nuruddin Ahmed receives Padma Shri; an inspiring journey from village to Rashtrapati Bhavan. AI photo

 

आरिफ़ुल इस्लाम / गुवाहाटी

 अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कला निर्देशक और मूर्तिकार नूरुद्दीन अहमद की जिंदगी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि प्रतिभा, मेहनत और लगन के सामने कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। असम के एक छोटे से गांव से निकलकर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल पद्मश्री प्राप्त करने तक का उनका सफर लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बन गया है।

मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक भव्य समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नूरुद्दीन अहमद को कला, रंगमंच, मूर्तिकला और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया।पिछले पांच दशकों से नूरुद्दीन अहमद कला के माध्यम से समाज की सेवा कर रहे हैं। यह सम्मान केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि असम की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कला परंपरा और रचनात्मक प्रतिभा को भी राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान है।
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साधारण कलाकार से पद्मश्री तक का सफर

'आवाज द वॉयस' से विशेष बातचीत में नूरुद्दीन अहमद ने इस सम्मान के लिए केंद्र और राज्य सरकार का आभार जताया।उन्होंने कहा, "मैं भारत सरकार और असम सरकार का हृदय से आभारी हूं। मैं एक साधारण इंसान हूं। गांव से आता हूं और खुद को एक सामान्य कलाकार मानता हूं। मुझे खुशी है कि मुझे इस सम्मान के योग्य समझा गया। साथ ही अब समाज के प्रति मेरी जिम्मेदारी और बढ़ गई है।"

नूरुद्दीन अहमद का जन्म असम के नलबाड़ी जिले के हाटीकुची गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें कला में रुचि थी। उन्होंने दिवंगत कलाकार आद्या शर्मा के मार्गदर्शन में कला की शुरुआती शिक्षा ली।इसके बाद वह मुंबई गए और फिर लखीमपुर में प्रसिद्ध कलाकार चंद्रकमल बरदोलोई से प्रशिक्षण प्राप्त किया। वर्ष 1981 से 1983 के बीच उन्होंने दिल्ली में आधुनिक मूर्तिकला और कठपुतली कला का विशेष प्रशिक्षण भी लिया।

परिवार भी आगे बढ़ा रहा कला की विरासत

नूरुद्दीन अहमद की कला विरासत को उनके दोनों बेटे आगे बढ़ा रहे हैं। दोनों ने रंगमंच, मंच सज्जा और दृश्य कला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है।अपने बेटों की उपलब्धियों पर गर्व जताते हुए अहमद ने कहा, "मेरे बेटे मुझसे भी बेहतर काम कर रहे हैं। उन्होंने नाटक, थिएटर और फिल्मों में अपनी प्रतिभा साबित की है। विशेष रूप से श्रीमंत शंकरदेव की जन्मस्थली बोरदवा में उनके कार्यों को लोगों ने काफी सराहा है।"

पुरस्कार समारोह में मौजूद उनके छोटे बेटे दीप अहमद ने इस अवसर को परिवार के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया।उन्होंने कहा, "यह सम्मान हमारे परिवार के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह मेरे पिता के जीवनभर के समर्पण की सबसे बड़ी पहचान है। देश की कई प्रमुख हस्तियों की मौजूदगी में उन्हें पद्म पुरस्कार प्राप्त करते देखना बेहद गर्व का क्षण था।"

450 से अधिक मोबाइल थिएटर और 5600 नाटकों की कला सज्जा

नूरुद्दीन अहमद का नाम असम के प्रसिद्ध मोबाइल थिएटर आंदोलन के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।अपने लंबे करियर में उन्होंने 450 से अधिक मोबाइल थिएटर प्रस्तुतियों के लिए मंच सज्जा तैयार की है। इसके अलावा उन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं के करीब 5600 नाटकों में कला निर्देशन का कार्य किया है। यह उपलब्धि अपने आप में बेहद दुर्लभ मानी जाती है।

उन्होंने अनेक ऐतिहासिक स्मारकों, प्रसिद्ध स्थलों, शास्त्रीय कलाकृतियों और महान हस्तियों की आदमकद प्रतिमाएं तैयार की हैं।हाल ही में उन्होंने दिवंगत असमिया संगीतकार जुबिन गर्ग की पूर्णाकृति प्रतिमा अपने निजी खर्च पर बनाकर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। महज 18 दिनों में तैयार की गई इस प्रतिमा का अनावरण गायक की पहली पुण्यतिथि के अवसर पर किया गया था।
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असम की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाई

गुवाहाटी के कई प्रमुख दुर्गा पूजा पंडालों की थीम और सजावट भी नूरुद्दीन अहमद और उनके बेटों ने तैयार की है।असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के दूसरे कार्यकाल के शपथ ग्रहण समारोह का भव्य मंच भी उन्होंने ही डिजाइन किया था।

इसके अलावा जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची के प्रस्तावित असम दौरे के लिए राज्य सरकार द्वारा तैयार की गई सांस्कृतिक प्रदर्शनी परियोजनाओं का नेतृत्व भी उन्होंने किया था।उनकी चर्चित रचनाओं में इंद्रप्रस्थ, चीन की महान दीवार और रोमन कोलोसियम की कलात्मक प्रतिकृतियां शामिल हैं। इन कृतियों ने उन्हें देशभर में विशेष पहचान दिलाई।

अब नई पीढ़ी को देंगे कला की शिक्षा

राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने के बाद भी नूरुद्दीन अहमद का ध्यान भविष्य की पीढ़ी पर केंद्रित है।उन्होंने बताया कि वह गुवाहाटी के काहिलीपारा स्थित अपने आवास के निकट एक संग्रहालय और कला विद्यालय स्थापित करना चाहते हैं। इसका उद्देश्य युवा कलाकारों और मूर्तिकारों को प्रशिक्षण देना होगा।उनका संस्थान 'राजदीप स्टूडियो' पहले से ही उभरते कलाकारों और शिल्पकारों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। यहां प्रशिक्षण के साथ रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराए जाते हैं।

कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से हो चुके हैं सम्मानित

नूरुद्दीन अहमद को वर्ष 2005 में मंच सज्जा के लिए कमल लाल स्मृति पुरस्कार मिला था। वर्ष 2017 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।इतनी उपलब्धियों के बावजूद उनके सहयोगी और प्रशंसक आज भी उनकी सादगी, विनम्रता और कला के प्रति समर्पण की सराहना करते हैं।

नलबाड़ी के एक छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने का नूरुद्दीन अहमद का सफर केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है। यह असम की सांस्कृतिक अस्मिता, रचनात्मक शक्ति और संघर्षशील भावना का प्रतीक है। उनकी जीवन यात्रा आने वाली पीढ़ियों को बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने की प्रेरणा देती रहेगी।