एयर इंडिया हादसे में बेटे-बहू को खोने वाले पिता को एक पाकिस्तानी हर दिन क्यों करता है फोन ?

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 16-07-2026
A father who lost his son and daughter-in-law in the Air India crash receives a phone call every day at 3 PM.
A father who lost his son and daughter-in-law in the Air India crash receives a phone call every day at 3 PM.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

नमस्कार, मेरा नाम सर्वत है। लंदन से आने वाली एक आवाज पिछले एक साल से गुजरात के एक गांव में हर दिन सुनाई देती है। यह आवाज है पाकिस्तान मूल के उमर अली की, जो लंदन में रहते हैं और कभी गुजरात के थावर गांव के रहने वाले कमलेश चौधरी के साथ काम करते थे। कमलेश सावधानभाई चौधरी और रतनीबेन के बड़े बेटे थे, लेकिन 12 जून 2025 को हुए एयर इंडिया विमान हादसे ने इस परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी।

12 जून 2025 को अहमदाबाद से लंदन के गैटविक जा रहा एयर इंडिया का बोइंग 787 ड्रीमलाइनर विमान उड़ान भरने के कुछ ही मिनट बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। विमान में कुल 242 यात्री सवार थे, जिनमें से 241 लोगों की मौत हो गई थी। इस हादसे में कमलेश चौधरी और उनकी पत्नी धापूबेन भी जान गंवाने वालों में शामिल थे।

गुजरात के बनासकांठा जिले के थावर गांव में रहने वाले 48 वर्षीय किसान सावधानभाई चौधरी और उनकी पत्नी रतनीबेन के लिए यह हादसा जिंदगी का सबसे बड़ा दुख बन गया। बेटे और बहू को खोने के बाद दोनों पति-पत्नी का जीवन जैसे रुक गया था। दिन और रात काटना मुश्किल हो गया था। इसी दर्द के बीच एक दिन लंदन से उमर अली का फोन आया। यह फोन सिर्फ एक बातचीत नहीं थी, बल्कि धीरे-धीरे एक ऐसा सहारा बन गया जिसने टूट चुके परिवार को संभालने में मदद की।

उमर अली करीब 40 साल के हैं और लंदन में एक फैंसी गुड्स की दुकान में काम करते थे। इसी दुकान में कमलेश भी काम करते थे। हादसे से पहले उमर और कमलेश के बीच बहुत गहरी दोस्ती नहीं थी। दोनों सिर्फ सहकर्मी थे, लेकिन कमलेश की मौत की खबर सुनकर उमर अंदर तक टूट गए। उन्होंने अपने साथी के परिवार से संपर्क करने का फैसला किया।

हादसे के बाद अब हर दिन काम पर जाते समय उमर सावधानभाई को फोन करते हैं। कभी दोनों मौसम की बात करते हैं, कभी परिवार की, कभी खाने-पीने की। कभी सावधानभाई के स्वास्थ्य की चिंता होती है तो कभी उनके नाखून में हुए संक्रमण के बारे में पूछा जाता है। कई बार बातचीत दोपहर के खाने में खाई गई गवार फली तक पहुंच जाती है। उमर पूछते हैं कि गवार क्या होती है, कैसी दिखती है। कभी बातचीत उमर के क्लीन शेव लुक तक पहुंच जाती है। एक दिन भी ऐसा नहीं जाता जब दोनों के बीच फोन या मैसेज से बातचीत न हो।

सावधानभाई बताते हैं कि उमर अब उनके परिवार का हिस्सा बन चुके हैं। वह कहते हैं कि उनके नाखून में अगर जरा सा भी दर्द हो जाए तो उमर तुरंत पूछ लेते हैं कि क्या हुआ। वहीं उमर के घर में कोई बीमार हो जाए या किसी को हल्का बुखार भी हो, तो उसकी जानकारी सावधानभाई को मिल जाती है।

इस रिश्ते में भाषा भी कभी बाधा नहीं बनी। सावधानभाई गुजराती बोलते हैं और उमर हिंदी में बात करते हैं। शुरुआत में सावधानभाई हिंदी में बातचीत करने की कोशिश करते थे, लेकिन कई बार भावनाओं में गुजराती बोलने लगते थे। उमर धैर्य से उनकी हर बात सुनते रहते थे। क्योंकि एक पिता के दुख को समझने के लिए हमेशा भाषा की जरूरत नहीं होती।

कमलेश की यादें आज भी सावधानभाई के फोन में मौजूद हैं। हादसे के करीब छह महीने बाद इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टर ऋतु शर्मा ने थावर गांव जाकर सावधानभाई से मुलाकात की थी। उस दौरान उन्हें एक 30 सेकेंड का वीडियो देखने को मिला था। यह वीडियो 12 जून 2025 को अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट के बाहर बनाया गया था। वीडियो में कमलेश और धापूबेन एयरपोर्ट के एंट्री गेट पर दिखाई दे रहे थे।

सावधानभाई आमतौर पर वीडियो नहीं बनाते थे, लेकिन उस दिन उन्होंने रिकॉर्डिंग सिर्फ इसलिए की थी क्योंकि उनकी बहू धापूबेन पहली बार फ्लाइट में बैठने जा रही थीं। यह उनकी पहली हवाई यात्रा थी। अहमदाबाद से लौटते समय सावधानभाई और उनका परिवार 100 किलोमीटर से भी ज्यादा आगे निकल चुका था, जब उन्हें विमान हादसे की खबर मिली। उन्होंने चमत्कार की उम्मीद करते हुए तुरंत अपनी कार अहमदाबाद की ओर मोड़ दी, लेकिन तब तक विमान उड़ान भरने के कुछ ही मिनट बाद बीजे मेडिकल कॉलेज की मेस बिल्डिंग से टकराकर दुर्घटनाग्रस्त हो चुका था।

कमलेश सितंबर 2022 से लंदन में रह रहे थे। 22 नवंबर 2024 को वह अपनी शादी के लिए बनासकांठा आए थे। शादी के बाद वह वापस लंदन चले गए। कुछ महीनों बाद वह फिर भारत लौटे, लेकिन इस बार अपनी पत्नी धापूबेन को अपने साथ लंदन ले जाने के लिए। परिवार के अनुसार कमलेश को दो साल पहले वर्क वीजा मिला था और उनका सपना था कि अगले पांच साल में वह अपना छोटा व्यवसाय शुरू करेंगे। वह चाहते थे कि अपने छोटे भाई हितेश को भी अपने साथ लंदन ले जाएं। 23 वर्षीय हितेश बनासकांठा से एग्रीकल्चर बिजनेस मैनेजमेंट में मास्टर्स कर रहे हैं।

6 जनवरी 2026 को सावधानभाई एक बार फिर अहमदाबाद गए। वह उस होटल पहुंचे जहां एयर इंडिया ने हादसे में जान गंवाने वाले यात्रियों के परिवारों के लिए फैमिली रिटर्न सेंटर बनाया था। यहां परिवारों को उनके अपनों का बचा हुआ सामान लौटाया जा रहा था। उस बड़े कमरे में सावधानभाई खुद को संभाल नहीं पाए और छोटे बच्चे की तरह रो पड़े।

उनकी हथेलियों में कुछ पारदर्शी जिपलॉक बैग थे। एक बैग में उनके बेटे कमलेश का जला हुआ वेडिंग एल्बम था। दूसरे बैग में एक डेस्कटॉप कैलेंडर था, जिसमें कमलेश और धापूबेन की तस्वीर थी। उस कैलेंडर पर लिखा था कि दो आत्माएं एक सोच के साथ और दो दिल एक साथ धड़कते हैं। कैलेंडर के 12 पन्नों पर दोनों की तस्वीरें थीं। कुछ अन्य बैग में उनके अधजले पहचान पत्र भी थे। सावधानभाई कहते हैं कि बड़े बेटे और बहू की मौत वाले दिन उनकी जिंदगी का एक हिस्सा खत्म हो गया था।

लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। पिछले एक साल से सावधानभाई और रतनीबेन की जिंदगी में एक नया इंतजार जुड़ गया है। हर दिन दोपहर 3 बजे उमर का फोन आता है। पहले उमर काम पर निकलते समय अपने माता-पिता को फोन करते थे, लेकिन हादसे के बाद उनकी यह आदत बदल गई। अब वह उसी समय कमलेश के माता-पिता को फोन करते हैं।

शुरुआत में दोनों की बातचीत बहुत छोटी होती थी। सावधानभाई हिंदी में बात करने की कोशिश करते थे और उमर धैर्य से सुनते थे। धीरे-धीरे यह बातचीत एक रिश्ते में बदल गई। उमर कहते हैं कि उन्हें और कमलेश को कभी बहुत गहरी दोस्ती का मौका नहीं मिला था। दोनों सिर्फ साथ काम करते थे। उमर उसी दुकान में सेल्स मैनेजर थे और कमलेश दुकान के दूसरे हिस्से को संभालते थे।

जब एयर इंडिया हादसे की खबर आई और उमर को पता चला कि कमलेश और धापूबेन की मौत हो गई है, तो वह टूट गए। उन्होंने बताया कि वह बहुत रोए और पूरा स्टाफ उन्हें संभालने के लिए उनके पास आ गया। इसके बाद कमलेश के परिवार के सदस्य तन्नी भाई ने उमर से कहा कि वह सावधानभाई को फोन करें। उमर ने कमलेश के रूममेट दीक्षित पटेल से सावधानभाई का नंबर लिया और कई कोशिशों के बाद दोनों की बात हो पाई।

उमर बताते हैं कि सावधानभाई के शब्द आज भी उन्हें याद हैं। उन्होंने कहा था, “मेरा बेटा चला गया।” उमर समझ गए थे कि फोन के दूसरी तरफ एक पिता रो रहा है। उनके पास कहने के लिए ज्यादा शब्द नहीं थे। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि आपका बेटा और हमारा भाई चला गया है, हिम्मत रखिए, मैं फिर फोन करूंगा। और उसी दिन से एक नया रिश्ता शुरू हुआ।

कमलेश के जाने के बाद सावधानभाई का फोन उनकी यादों का घर बन गया है। इस फोन में वह लंदन में कमलेश के बॉस तन्नी भाई के साथ हुई बातचीत और संदेश संभालकर रखते हैं। पिछले 12 महीनों से तन्नी भाई हर महीने सावधानभाई के खाते में 50 हजार रुपये भेज रहे हैं। यह मदद किसी प्रचार के साथ नहीं आती, बल्कि एक खामोश सहारे की तरह है।

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यह रिश्ता अब सिर्फ फोन और संदेशों तक सीमित नहीं है। कुछ महीने पहले उमर ने कमलेश के छोटे भाई हितेश के लिए ब्लेजर और शर्ट भेजी। उन्होंने रतनीबेन के लिए एक स्वेटर भी भेजा। वहीं सावधानभाई ने भी उमर के लंदन वाले पते पर 10 किलो का एक पार्सल भेजा। उसमें घर का बना घी, पाचन वाला चूरन और उमर की पत्नी समीना के लिए सूखी कचौरी के दो पैकेट थे।

यह वही अपनापन था जो कभी वह अपने बेटे कमलेश के लिए महसूस करते थे। अब दो अलग-अलग देशों में रहने वाले दो परिवार एक-दूसरे के सुख-दुख का हिस्सा बन चुके हैं।12 जून को एयर इंडिया हादसे की पहली बरसी है। इस दिन सावधानभाई, रतनीबेन और उनका पूरा परिवार अहमदाबाद जाएगा। उनके लिए यह सिर्फ कुछ किलोमीटर का सफर नहीं होगा, बल्कि उस बेटे की यादों तक जाने का रास्ता होगा जिसे उन्होंने खो दिया।

कमलेश अब उनके बीच नहीं हैं, लेकिन उनके जाने के बाद भी कुछ रिश्ते खत्म नहीं हुए। वह रिश्ते अब रोज आने वाली फोन कॉल में हैं, हर महीने भेजी जाने वाली मदद में हैं और उस अनकही जिम्मेदारी में हैं जिसे उमर ने बिना किसी औपचारिक रिश्ते के अपना लिया। यह कहानी बताती है कि कई बार रिश्ते खून से नहीं, बल्कि इंसानियत, संवेदना और साथ निभाने से बनते हैं।