टैरिफ से आगे भारत की नई आर्थिक रणनीति

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 26-09-2026
India's New Economic Strategy Beyond Tariffs
India's New Economic Strategy Beyond Tariffs

 

राजीव नारायण

वर्षों से भारत ने दुनिया को अपने विशाल घरेलू बाज़ार के दम पर लुभाया है। लेकिन आज के दौर में,जहाँ मनचाहे टैरिफ (आयात शुल्क) लगाए जा रहे हैं, सप्लाई चेन (आपूर्ति श्रृंखलाएँ) अस्त-व्यस्त हो रही हैं और वैश्विक समीकरण तेज़ी से बदल रहे हैं,वहाँ केवल बाज़ार का बड़ा आकार ही काफी नहीं है। भारत को अब एक ऐसा देश बनना होगा, जिसकी अनदेखी करना या जिसे छोड़ना वैश्विक व्यापारिक जगत के लिए मुमकिन न हो।

भारत-अमेरिका व्यापार, टैरिफ और वार्ताओं के इस शोर-शराबे के बीच एक अच्छी बात यह हो रही है कि भारत अब टैरिफ की सीमाओं से परे सोच रहा है। यह बेहद अहम बदलाव है, क्योंकि टैरिफ आखिरकार एक कीमत ही तो हैI

एक ऐसी कीमत जो किसी उत्पाद को सस्ता या महँगा बना सकती है, कोई बाज़ार खोल सकती है या बंद कर सकती है, और किसी निवेश को आकर्षित कर सकती है या डराकर भगा सकती है।

लेकिन भारत के सामने असली और बड़ा सवाल यह नहीं है कि कोई दूसरा देश कल उस पर क्या टैरिफ लगाने वाला है; सवाल यह है कि कोई वैश्विक कंपनी आज भारत को क्यों चुने, और 10 साल बाद भी उसे भारत की ज़रूरत क्यों बनी रहे? और यह सवाल इतना आसान नहीं है।

हाल ही में वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि भारत के नए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) इस तरह तैयार किए जा रहे हैं ताकि दीर्घकालिक निवेशकों को भारत में अपनी वैश्विक सप्लाई चेन स्थापित करने का भरोसा मिले।

ये समझौते टैरिफ में स्पष्टता और लगभग 60ट्रिलियन डॉलर के विशाल बाज़ार तक पहुँच प्रदान करते हैं। सोच में आया यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है। एक एफटीए सिर्फ उत्पादों की सूची पर आयात शुल्क घटाने का साधन भर नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक आर्थिक प्रस्ताव का हिस्सा बन सकता है: यहाँ निवेश कीजिए, यहाँ निर्माण कीजिए, यहाँ से निर्यात कीजिए और भारत को अपने वैश्विक उत्पादन नेटवर्क का मुख्य स्तंभ बनाइए।और असली कामयाबी इसी में छिपी है।

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केवल बड़ा बाज़ार होना काफी नहीं

दशकों से भारत का सबसे बड़ा आर्थिक आकर्षण बिल्कुल साफ था,140करोड़ लोगों का एक विशाल बाज़ार, युवा आबादी और बढ़ती आमदनी। लेकिन केवल एक बड़ा बाज़ार बने रहने में एक बड़ी कमी भी है: दूसरे देश भी आगे चलकर बड़े बाज़ार बन सकते हैं। इसके अलावा, विदेशी कंपनियाँ आपकी सीमाओं के भीतर निर्माण किए बिना भी आपको अपना सामान बेच सकती हैं। भारत को अब इस पायदान से ऊपर उठना होगा।

लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि भारत महज़ एक ऐसा स्थान बना रहे जहाँ दुनिया भर की कंपनियाँ आकर अपना सामान बेचें। लक्ष्य यह होना चाहिए कि भारत वह जगह बने जहाँ कंपनियाँ अपने उत्पाद बनाएँ, उनका डिज़ाइन तैयार करें, कलपुर्जों की सोर्सिंग करें, उनसे जुड़ी तकनीक विकसित करें और उन्हें दुनिया भर में निर्यात करें।यह बदलाव वैश्विक रिश्ते की पूरी नीव ही बदल देता है।

भारत में सामान बेचने वाली कंपनी बाज़ार में थोड़ी सी कड़वाहट आते ही बोरिया-बिस्तर समेट सकती है। लेकिन जिस कंपनी के कारखाने, सप्लायर, इंजीनियर, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और निर्यात प्रतिबद्धताएँ भारत से जुड़ी होंगी, उसका गणित बिल्कुल अलग होगा। मैन्युफैक्चरिंग इसलिए मायने रखती हैI यह महज़ सुनने में अच्छी नहीं लगती, बल्कि एक कारखाना अपने आसपास एक पूरा आर्थिक इकोसिस्टम खड़ा कर देता है।

किसी भी मैन्युफैक्चरिंग प्लांट की असेंबली लाइन को पार्ट्स यानी कलपुर्जों की ज़रूरत होती है। कलपुर्जों के लिए सप्लायर्स चाहिए। और उन सप्लायर्स को मशीनरी, लॉजिस्टिक्स, सॉफ्टवेयर, इंजीनियर, फाइनेंस और कुशल कामगारों की आवश्यकता होती है।

इसके बाद जो सामान बनता है, उसका एक बड़ा हिस्सा निर्यात किया जा सकता है। इस तरह एक कारखाना पूरी सप्लाई चेन में बदल जाता है; सप्लाई चेन एक स्थायी आर्थिक रिश्ते का रूप ले लेती है; और यही आर्थिक रिश्ता समय के साथ देश के लिए एक 'रणनीतिक ताक़त' (स्ट्रैटेजिक लेवरेज) बन जाता है।

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'सस्ते' से 'भरोसेमंद' बनने की ओर

भारत को एक और अहम सबक सीखने की ज़रूरत है। वैश्विक अर्थव्यवस्था अब सिर्फ निर्माण के लिए किसी सस्ती जगह की तलाश नहीं कर रही है; वह ऐसी जगहों की तलाश में है जो 'भरोसेमंद' हों।

कोविड-19 महामारी ने दुनिया को किसी एक देश में सप्लाई चेन केंद्रित होने के ख़तरे अच्छी तरह समझा दिए थे। तब से, भू-राजनीतिक तनावों ने शिपिंग मार्गों, ऊर्जा आपूर्ति, महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीकी घटकों को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना दिया है। यहाँ तक कि आज अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भी राष्ट्रीय सुरक्षा के गणित से तय हो रहा है।

इस बदलते परिवेश में पारंपरिक तुलनात्मक लाभ (कम्पैरेटिव एडवांटेज) के साथ-साथ स्थिरता (रेज़िलिएंस) और विविधता (डाइवर्सिफिकेशन) बेहद अहम हो गए हैं। यह बात भारत के लिए किसी सुखद संदेश से कम नहीं होनी चाहिए।

लेकिन इसमें एक पेंच है। दुनिया केवल संभावनाओं और क्षमता के आधार पर सप्लाई चेन का निर्माण नहीं करती; वह यह काम 'विश्वसनीयता' के आधार पर करती है। विश्वसनीयता का मतलब है,पारदर्शी व स्थिर नियम, कुशल बंदरगाह, शानदार सड़कें और रेल नेटवर्क, निर्बाध बिजली, प्रतिस्पर्धी लॉजिस्टिक्स, तेज़ कस्टम क्लीयरेंस, एकसमान गुणवत्ता, कुशल श्रम, स्थिर नीतियाँ और ऐसे सप्लायर्स जो हर बार एक ही उच्च गुणवत्ता वाला कलपुर्जा डिलीवर कर सकें।

'मेक इन इंडिया' और 'डिपेंड ऑन इंडिया' के बीच का अंतर बहुत बड़ा है। भारत को अब इस दूसरे पायदान तक पहुँचना ही होगा।

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विविधता ही असली ताक़त है

यहीं पर भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंध प्रासंगिक हो जाते हैं, भले ही वे पूरी कहानी का एकमात्र हिस्सा न हों। अमेरिका भारतीय निर्यातकों के लिए एक बहुत बड़ा बाज़ार है, और भारत के पास वहाँ के बाज़ार तक स्थिर व पारदर्शी पहुँच के लिए कड़ा मोलभाव करने की हर वाजिब वजह मौजूद है। लेकिन टैरिफ के झटकों से मिलने वाला सबक यह नहीं होना चाहिए कि भारत को अमेरिका के साथ सिर्फ बेहतर बहस की तैयारी करनी है।

सबक यह होना चाहिए कि भारत के पास हर जगह अपनी बात रखने के रास्ते और विकल्प होने चाहिए। भारतीय कंपनियाँ जितने अधिक बाज़ारों तक पहुँच बनाएँगी, किसी एक बाज़ार के उतार-चढ़ाव से उन्हें उतना ही कम ख़तरा होगा।

यही वजह है कि भारत का एफटीए (FTA) नेटवर्क का विस्तार करना इतना महत्वपूर्ण है। भारत ब्रिटेन, ओमान, न्यूज़ीलैंड, यूरोपीय संघ और अन्य साझेदारों के साथ समझौतों पर तेज़ी से काम कर रहा है और कई अन्य वार्ताओं को आगे बढ़ा रहा है। यह सिर्फ व्यापारिक कूटनीति नहीं है; यह एक सोची-समझी 'आर्थिक जोखिम प्रबंधन' (इकोनॉमिक रिस्क मैनेजमेंट) रणनीति है।

अगर कोई भारतीय कंपनी एक के बजाय पाँच बड़े बाज़ारों में अपना सामान बेचती है, तो किसी एक बाज़ार में अचानक टैरिफ बढ़ना उसके लिए तकलीफदेह ज़रूर होगा, लेकिन विनाशकारी नहीं।

इसी तरह, अगर कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत में मैन्युफैक्चरिंग करती है और यहाँ से अन्य बाज़ारों को स्थिर शर्तों पर निर्यात करती है, तो भारत एक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में और अधिक आकर्षक बन जाता है। इसलिए, विविधता लाने का मतलब अमेरिका, चीन या यूरोप से दूर जाना नहीं है, बल्कि उनमें से किसी एक पर भी बहुत ज़्यादा निर्भर न होना है।दोनों में बड़ा फ़र्क़ है। और इसी फ़र्क़ को 'रणनीतिक ताक़त' या 'लेवरेज' कहते हैं।

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नया वैश्विक मापदंड

भारत ने खुद को बड़ा और शक्तिशाली बनाने में कई दशक बिताए हैं। अब उसे ऐसा बनना होगा जिसे हटाना या जिसकी जगह किसी और को लाना मुमकिन न हो। इसके लिए प्रतिस्पर्धी मैन्युफैक्चरिंग, मजबूत घरेलू सप्लाई चेन, आधुनिक बुनियादी ढांचा, उन्नत तकनीकी क्षमताएँ और ऐसी कंपनियों की ज़रूरत है जो वैश्विक स्तर पर मुकाबला कर सकें।

इसके साथ ही भारत को यह भी समझना होगा कि निवेशक असल में क्या खरीद रहे हैं। वे केवल 140करोड़ उपभोक्ताओं के बाज़ार तक पहुँच नहीं खरीद रहे; वे भारत में एक ऐसी फैक्ट्री लगाने का अवसर खरीद रहे हैं जो पूरे विश्व को अपनी सेवाएँ दे सके।यह एक बड़ा और दूरगामी विचार है, जो हमारी आर्थिक कूटनीति की पूरी परिभाषा को बदल देता है।

पुरानी सोच सिर्फ बेहतर बाज़ार पहुँच हासिल करने के बारे में थी। नई सोच भारत के अनुकूल शर्तों पर एक ऐसी 'आर्थिक परस्पर निर्भरता' पैदा करने के बारे में है जो भारत के हित में काम करे। यही कारण है कि भारत-अमेरिका व्यापार को केवल टैरिफ के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

एक टैरिफ निर्यात को अस्थाई चोट पहुँचा सकता है, लेकिन वह यह तय नहीं कर सकता कि भारत वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बनेगा या नहीं। यह फैसला आखिरकार कारखाने, निवेशक, इंजीनियर, निर्यातक और उपभोक्ता मिलकर करेंगे।

भारत का काम इस फैसले को उनके लिए आसान और स्वाभाविक बनाना है। हमारी महत्वाकांक्षा महज़ एक 'पसंदीदा ठिकाना' बनने से कहीं आगे की होनी चाहिए। भारत को एक ऐसा गंतव्य बनना चाहिए जिसकी जगह कोई न ले सके,एक ऐसा देश जो दुनिया के बाज़ारों को सामान पहुँचाए, कलपुर्जे बनाए, तकनीक का निर्माण करे, उत्पाद निर्यात करे और एक अटूट सप्लाई चेन दे। एक ऐसा देश, जिसकी गैरमौजूदगी से पूरी दुनिया के व्यापार में ठहराव आ जाए।

दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाज़ार होना भारत को सबका ध्यान और आकर्षण दिलाता है। एक मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई-चेन हब बनना उसे आर्थिक वज़न देता है। लेकिन ऐसा देश बनना जिसकी जगह कोई न ले सके,भारत को वह चीज़ देता है जो सबसे ज़्यादा कीमती है: मोलभाव की असली ताक़त (बारगेनिंग पावर)।

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