ब्रिक्स से ग्लोबल साउथ की आवाज बना भारत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 22-09-2026
BRICS Summit: India's major diplomatic victory amidst the changing global order.
BRICS Summit: India's major diplomatic victory amidst the changing global order.

 

अब्दुल्लाह मंसूर 

जब भी कभी इतिहास के पन्ने पलटकर इस दौर की तरफ देखा जाएगा, तो नई दिल्ली की धरती पर सजा वह 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन सिर्फ एक कूटनीतिक बैठक भर के तौर पर याद नहीं किया जाएगा; वह एक सुकून भरा अहसास था, एक ऐसी खुशी और फक्र का लम्हा था जिसने बरसों से हाशिए पर धकेल दिए गए देशों की आंखों में उम्मीद की नई चमक भर दी।

याद कीजिए उन पुराने दिनों को, जब दुनिया चंद बड़े देशों के इशारों पर चला करती थी और गरीब या विकासशील मुल्क बस दर्शक बनकर तालियां पीटा करते थे। लेकिन इस बार जब दिल्ली के कूटनीतिक गलियारों में मेहमानों की चहल-पहल बढ़ी, तो हवा में एक अलग ही अपनापन और आत्मविश्वास था।

चार देशों के एक छोटे से सफर 'ब्रिक' से शुरू होकर 11 देशों के इस विशाल और जीवंत परिवार यानी ब्रिक्स तक का यह सफर आसान बिल्कुल नहीं रहा। रास्तों में कांटे भी थे, महाशक्तियों की खींचतान की चुभन भी थी, और आपसी गिले-शिकवे भी थे। पर जिस प्यार, सब्र और बड़े दिल वाले बड़प्पन के साथ भारत ने इन तमाम विरोधी हितों वाले देशों को एक ही छत के नीचे, एक ही मेज पर और एक ही सुर में ला बैठाया वह देखकर दिल सचमुच गदगद हो जाता है।

यह सिर्फ सरकारों की जीत नहीं थी, यह उस 'ग्लोबल साउथ' यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उन करोड़ों साधारण इंसानों की जीत थी जो दशकों से दुनिया के मंच पर अपनी एक अदद सुने जाने वाली आवाज के लिए तरस रहे थे।

आज का दौर वह पुराना दौर नहीं है जब दुनिया लाल और नीले दो खेमों में बंटी होती थी और हर किसी को किसी एक बड़े साहब की गुलामी करनी पड़ती थी। आज दुनिया बेहद पेचीदा और कई ध्रुवों में फैली हुई है। एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी मुल्क हैं जो अपनी अकड़ में हैं, तो दूसरी तरफ रूस और चीन जैसी महाशक्तियां हैं जो अपने दबदबे के लिए मचल रही हैं।

ऐसे सुलगते और तनाव से भरे माहौल में ब्रिक्स जैसे बड़े कुनबे को एकजुट रखना लोहे के चने चबाने से कम नहीं था। जरा सोचिए, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE जैसे देशों के बीच हालात कितने नाजुक हैं, ईरान लगातार ड्रोन हमला कर रहा है UAE पर, कुछ ही महीने पहले तक विदेश मंत्रियों की बैठकों में आग बनकर फूट पड़ते थे।

इसके अलावा, चीन और रूस जहां ब्रिक्स को अमेरिका और पश्चिमी आधिपत्य के खिलाफ एक कड़े और आक्रामक भू-राजनीतिक संतुलनकारी मंच या काउंटरवेट के रूप में देखना पसंद करते थे, वहीं भारत और ब्राजील का रुख शुरू से ही बिल्कुल स्पष्ट और व्यावहारिक था। भारत इसे विशुद्ध रूप से आर्थिक सहयोग, संस्थागत सुधार-उन्मुख मंच और विकासशील देशों के जन-कल्याण का एक मजबूत जरिया मानता था।

भारत की कूटनीतिक जीत और नया भरोसा

यहीं पर भारत की असली कूटनीतिक समझ और इंसानी जुड़ाव की परीक्षा हुई। नई दिल्ली शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी खूबसूरती यही रही कि भारत ने इन तमाम कड़वाहटों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, बल्कि सबको गले लगाते हुए लगभग 50 पन्नों का वह खूबसूरत 'नई दिल्ली घोषणापत्र' सबके सामने रखा जिस पर हर किसी ने मुस्कुराते हुए हामी भरी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब वह 12-सूत्रीय खाका और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC,जो दुनिया के फैसलों का सबसे बड़ा और ताकतवर केंद्र है और जिसमें भारत का हक दशकों से अटका पड़ा है,में बदलाव के लिए वह 10-सूत्रीय रोडमैप पेश किया, तो लगा कि भारत अब दुनिया को सिर्फ उपदेश नहीं दे रहा, बल्कि रास्ता दिखा रहा है।

आतंकवाद के नाम पर जब दुनिया कन्नी काटती है, तब भारत ने डंके की चोट पर हर रूप में इसकी भर्त्सना की। जलवायु परिवर्तन की मार झेलते छोटे गरीब देशों के लिए न्याय की आवाज उठाई और उनकी थाली की रोटी यानी खाद्यान्न संकट को सबसे ऊपर रखा। यह देखकर मन को बड़ा सुकून मिलता है कि हमारी कूटनीति अब दबी जुबान में बात करने वाली नहीं रही, बल्कि दुनिया के एजेंडे को नए सिरे से गढ़ने वाली बन रही है।

भारत ने बार-बार यह साबित किया है कि रिश्तों की नाजुक डोरी को टूटने न देना ही सबसे बड़ा हुनर है। आज जब दुनिया में चारों तरफ नफरत और टकराव का धुआं उठ रहा है, तब भारत ने ईरान और खाड़ी के देशों के बीच एक बड़े भाई की तरह संवाद का पुल बनाया।

भारत ने जिस संवेदनशीलता के साथ ईरान और खाड़ी देशों के तनाव को थामा है और रूस-यूक्रेन संकट के मानवीय व आर्थिक पहलुओं को ग्लोबल साउथ के परिप्रेक्ष्य से रखा है, उसने वैश्विक मंच पर भारत को एक पुल निर्माणकर्ता यानी ऐसे देश के रूप में स्थापित किया है जो परस्पर विरोधी खेमों के बीच बातचीत का रास्ता खोल सकता है। यह जीत केवल कूटनीतिक दस्तावेजों की नहीं है, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि भारत की आवाज को अब अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अनसुना नहीं किया जा सकता।

'मल्टी-अलाइनमेंट' और आर्थिक साझेदारी

हमारी विदेश नीति की सबसे प्यारी बात यह रही है कि हमने कभी किसी के पिछलग्गू बनकर रहना नहीं सीखा। हमारी नीति 'मल्टी-अलाइनमेंट' की रही है यानी हम किसी एक खेमे के गुलाम नहीं बनेंगे, बल्कि सबके दोस्त बनकर चलेंगे। 

आज के इस अनिश्चित दौर में जहां दुनिया के कई देश किसी एक बड़े गुट में बंधने को विवश महसूस करते हैं, वहीं भारत एक ही समय में क्वाड यानी Quad का अत्यंत सक्रिय हिस्सा भी है, जिसमें भारत के साथ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं और जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की दादागिरी रोकता हैI

भारत G20 की ऐतिहासिक और सफल मेजबानी भी कर चुका है, शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO के मंच पर भी संवाद बनाए हुए है जो यूरेशिया का राजनीतिक व सुरक्षा मंच है, और अब ब्रिक्स की सफलतापूर्वक अध्यक्षता संभालकर ग्लोबल साउथ का नेतृत्व भी कर रहा है।

यह किसी प्रकार की अवसरवादिता नहीं है, बल्कि एक गहरी यथार्थवादी सोच है जो यह अच्छी तरह समझती है कि भारत के सामरिक और आर्थिक हित किसी एक गुट या ब्लॉक की सीमाओं में सिमटने के लिए बहुत बड़े हैं।

पड़ोसी चीन के साथ हमारे रिश्तों को ही देख लीजिए। गेम थ्योरी वाले उसे 'नैश इक्विलिब्रियम' यानी एक ऐसा फंसा हुआ नाजुक मोड़ कहते हैं जहां दोनों पक्ष अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वे आपस में टकराए या लड़ बैठे, तो दोनों का नुकसान तय है।

सीमा पर तनाव और गलवान की तल्खियों के बावजूद आज भी भारत और चीन के बीच सौ अरब डॉलर से ज्यादा का कारोबार चलता है। हम सामान भी खरीदते हैं, तकनीक भी साझा करते हैं और समझदारी से यह भी तय करते हैं कि चीन कभी भी ब्रिक्स जैसे मंच को भारत के खिलाफ या अमेरिका विरोधी एकतरफा अखाड़े में न बदल पाए।

इसी तरह, यूक्रेन संघर्ष को लेकर भारत का रुख भी पूरी दुनिया में प्रशंसा का केंद्र रहा है। एक तरफ जहां रूस के साथ ऐतिहासिक, रक्षात्मक और ऊर्जा संबंधी गहरे रिश्ते बदस्तूर कायम हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत लगातार यह स्पष्ट पैग़ाम देता रहा है कि 'यह युद्ध का दौर नहीं है' और ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्था पर पड़ रही इसकी भारी मार को देखते हुए कूटनीति और शांति की बहाली ही एकमात्र और स्थायी रास्ता है।

भारत ने रूस और पश्चिमी देशों के बीच एक ऐसे अत्यंत विश्वसनीय और तटस्थ मध्यस्थ की छवि गढ़ी है, जिसकी बात आज दोनों खेमे पूरी गंभीरता और इत्मीनान से सुनते हैं।

अर्थव्यवस्था और वित्तीय ढांचे के मोर्चे पर भी भारत की रणनीति बेहद सूझबूझ भरी और यथार्थवादी रही है। चीन का यह लगातार जोर था कि ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार के लिए एक साझा 'ब्रिक्स मुद्रा' जारी की जाए, ताकि अमेरिकी डॉलर के वैश्विक वर्चस्व को सीधी और आक्रामक चुनौती दी जा सके।

लेकिन भारत ने इस अति-महत्वाकांक्षी और वर्तमान वैश्विक बाजार की सच्चाइयों से परे दिखने वाले विचार से बड़ी समझदारी से दूरी बनाए रखी। भारत यह जानता हैं कि रातों-रात किसी नई मुद्रा को उतार देने से पूरी दुनिया के बाजारों में हाहाकार मच जाएगा, गरीबों की गाढ़ी कमाई पर महंगाई की ऐसी मार पड़ेगी कि घर चलाना मुश्किल हो जाएगा।

इसलिए भारत ने समझदारी भरा रास्ता चुना, हम डॉलर की गुलामी से धीरे-धीरे बाहर निकलेंगे, पर कैसे? आपस के व्यापार में अपनी-अपनी देसी मुद्राओं का इस्तेमाल करके! जैसे भारत और रूस ने आपस में रुपया और रूबल में कारोबार किया, UAE के साथ दिरहम और रुपये का तालमेल बिठाया, इंडोनेशिया के साथ रिश्ता जोड़ा, और अपना 'BRICS Pay' जैसा डिजिटल पेमेंट सिस्टम खड़ा किया बिल्कुल वैसे ही जैसे आज भारत का हर इंसान चाय की दुकान पर UPI से चुटकी बजाते ही पेमेंट कर देता है। यह होता है जमीन से जुड़ा प्रैक्टिकल काम!

और हाँ, शंघाई में बैठे हमारे 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' यानी NDB को ही देख लीजिए, जिसे आप आसान शब्दों में 'ब्रिक्स बैंक' कह सकते हैं और जो बिल्कुल विश्व बैंक की तरह गरीब और विकासशील देशों को उनके अपने पुल, अस्पताल और सड़कें बनाने के लिए मदद देता है।

भारत के कहने पर इस बैंक ने अब तक 140 से ज्यादा विकास परियोजनाओं के लिए करीब 44 अरब डॉलर की मदद पहुंचाई है। हमारा मकसद कभी किसी को कर्ज के जाल में फंसाकर उसकी जमीन हड़पने वाला 'बेल्ट एंड रोड' जैसा घटिया खेल खेलना नहीं रहा, बल्कि हमारा सपना रहा है कि हमारे पड़ोसी देश अपने पैरों पर खड़े हों।

आज जब क्रय शक्ति क्षमता यानी PPP के हिसाब से पूरी दुनिया की कुल आमदनी या GDP में ब्रिक्स की हिस्सेदारी बढ़कर 36.8% तक पहुंच गई है और हमने मिलकर उस पुराने रईसों के क्लब यानी G7 को भी पीछे छोड़ दिया है, तब भी भारत अभिमान में चूर नहीं होता; भारत उस ताकत का इस्तेमाल पूरी दुनिया के गरीबों के आत्म-सम्मान के लिए करता है।

आज़ादी के बाद के दशकों के सफर से लेकर आज की 21वीं सदी की बहुध्रुवीय दुनिया तक, भारतीय विदेश नीति ने हमेशा यह सिखाया है कि वैश्विक मामलों को देखने और समझने के लिए दूसरों के चश्मे की जरूरत नहीं होती।

नई दिल्ली में संपन्न हुआ यह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस बात पर ऐतिहासिक मुहर लगाता है कि भारत अब वैश्विक व्यवस्था का केवल एक लाभार्थी यानी किसी व्यवस्था का केवल फायदा उठाने वाला देश भर नहीं रहा, बल्कि उसके नियमों, मूल्यों और दिशा को तय करने वाला एक प्रमुख, अडिग और मार्गदर्शक स्तंभ बन चुका है।

यह कूटनीतिक विजय किसी शोर-शराबे वाली या खोखली बयानबाजी वाली नहीं, बल्कि शांत, गंभीर, बौद्धिक और अटूट विश्वास वाली है.एक ऐसी जीत जो भारत को विश्वबंधु के रूप में ग्लोबल साउथ के दिलों और वैश्विक मंच पर और अधिक मजबूती व गरिमा के साथ स्थापित करती है।

( अब्दुल्लाह मंसूर  मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय और पसमांदा मुद्दों पर लिखते-बोलते हैं।)