प्रमोद जोशी
अमेरिकी संसद से हाल में पास हुए ग्राहम लिंडसे विधेयक की गाज भारत पर गिरेगी या नहीं गिरेगी, इसे लेकर अटकलें ही हैं, पर इतना साफ है कि दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व को बनाए रखने की यह एक और कोशिश है.
डॉनल्ड ट्रंप मानते हैं कि यूक्रेन की लड़ाई रोकने के लिए रूस को कमज़ोर करना ज़रूरी है और इसके लिए सबसे बड़ा हथियार आर्थिक पाबंदियाँ हैं. पिछले साल शुरू हुए अपने टैरिफ-संग्राम में ट्रंप ने भारत को रूसी पेट्रोलियम की खरीद के नाम पर घसीटा. अब वे ग्राहम लिंडसे की तलवार घुमाएँगे.
हालाँकि भारत की तुलना में चीन ने रूस से ज्यादा मात्रा में पेट्रोलियम का आयात किया है, पर ट्रंप की तलवारबाज़ी चीन के खिलाफ उतनी चपल नहीं होती है, जितनी तेजी से भारत के खिलाफ चलती है.
वजह भी साफ है. चीन के पास भी अमेरिका को अर्दब में लेने के आर्थिक और तकनीकी औजार हैं. वह भारत से बेहतर स्थिति में है. इस वजह से दोनों एक-दूसरे से सीधे पंगा लेने में सतर्कता बरत रहे हैं. इस हफ्ते 24 सितंबर को ट्रंप और सी चिनफिंग की वार्ता में स्पष्ट हो जाएगा कि अमेरिका-चीन टकराव वास्तव में होगा, या ‘नूरा-कुश्ती’ चलती रहेगी.

भारत की राह
भारत उसी रास्ते पर नहीं जा सकता, जिस पर चीन जा रहा है. हमें डिप्लोमेसी और लेन-दिन का सहारा लेना होगा. भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी की वजह यह भी है कि परिस्थितियों की जटिलता बहुत सी बातों को रोक रखा है.
भारत के लिए यह संधिकाल है. हमें एक महाशक्ति के बढ़ते क्षय और दूसरी के क्रमशः बढ़ते उभार के बीच से रास्ता निकालना है. भारत ने अतीत में वेनेजुएला, ईरान और रूस जैसे देशों से आयात कम करने के लिए अमेरिका के दबाव का पालन किया है. भारत फिर से रूसी तेल आयात में कटौती करेगा, तो ईंधन की आपूर्ति और कीमतों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा.
ट्रंप-प्रशासन के इरादों की आलोचना कितनी भी करें, हमें देखना होगा कि रास्ता क्या है? अब तक के दंडात्मक शुल्कों की तुलना में इसबार का टैरिफ कहीं अधिक गंभीर होगा.
यह अधिनियम अमेरिकी कांग्रेस से पास हुआ है, इसलिए इसे कानूनी स्थायित्व और अधिकार प्राप्त है. ट्रंप को भी किसी छूट देने से पहले कांग्रेस को लिखित रूप में उसका औचित्य सिद्ध करना होगा.
How can this arrogant American senator dare threaten India in an intimidating tone ? Does US own the World? India has the capacity to deal with such empty threats. To begin with @USAmbIndia should be denied the free access his has acquired for every door of the Indian…
— PrabhuChawla (@PrabhuChawla) September 17, 2026
भारत पर दबाव
भारत की अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को दो संभावित स्थितियों में देखना चाहिए. पहली यह कि रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदना जारी रखें और शुल्क का बोझ वहन करें.
दूसरी यह कि रूस से तेल का आयात कम करें और संभावित शुल्क को हटवाने में सफल हो जाएँ. तीसरा रास्ता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध रुकवा दें. ‘सदाबहार दोस्त’ रूस का साथ छोड़ना आसान भी नहीं है. बावज़ूद इसके भारत की प्रतिक्रिया कठोर नहीं होगी. चीन के बयानों में भी कड़वाहट नहीं है.
भारत के लिए तेल के नए स्रोतों की खोज करना बहुत महंगा साबित होगा. इससे बाजार में ईंधन की कीमतों में वृद्धि होगी. यह वृद्धि राजनीतिक रूप से घातक होगी, क्योंकि अगले छह महीनों में कई महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव हैं.
आप पूछ सकते हैं कि तब हम करेंगे क्या? रूसी पेट्रोलियम का आयात बंद कर देंगे या वैकल्पिक रास्ते खोजेंगे? वैकल्पिक रास्ते हैं भी या नहीं? हैं, तो क्या हैं?

छूट का विकल्प
वर्तमान स्थिति में, भारत के लिए एक रास्ता कानून में उल्लिखित छूट के विकल्प के लिए दबाव डालना है, जिसके तहत राष्ट्रपति प्रतिबंधों को तब हटा सकते हैं, जब यह ‘अमेरिका के राष्ट्रीय हित में’ हो.
विधेयक में उन देशों को छूट दी गई है, जो रूस से अपनी प्राकृतिक गैस का 15 प्रतिशत से कम आयात करते हैं, और आयात को कम करने के लिए ‘महत्वपूर्ण’ कदम उठा रहे हैं.
अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है, ऐसे में भारत छूट की मांग कर सकता है. छूट मिल भी गई, तब भी यह अस्थायी समाधान होगा. इसके अलावा विधेयक में रूसी अधिकारियों और मॉस्को के ‘गुप्त जहाजी बेड़े (शैडो फ्लीट)’ के खिलाफ कई प्रतिबंधों का प्रावधान है. इनमें जहाज के मालिक, ऑपरेटर, मैनेजर, बीमाकर्ता और संबद्ध गतिविधियों में शामिल अन्य पक्ष शामिल हैं.
निशाने पर कौन?
यह कानून राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर लागू हो जाएगा. इसके तहत, उन देशों से आयातित सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाना जरूरी है, जो कानून बनने से पहले के 12 महीनों में रूसी खनिज तेल या प्राकृतिक गैस के शीर्ष पाँच खरीदार रहे हैं.
किसी देश का रूसी गैस आयात, लागू अवधि के दौरान रूस के कुल निर्यात का 15 प्रतिशत से कम रहा हो और उसने उस आयात को कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम. उठाए हों, तो उसे गैस से जुड़े शुल्कों से छूट मिल सकती है.
विधेयक पारित होने के बाद, सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने सार्वजनिक रूप से टिप्पणी की कि चीन और भारत को अपनी ‘स्थिति सुधारनी चाहिए’ और तेल और गैस ‘कहीं और से’ खरीदनी चाहिए.
अगस्त 2026 तक, भारत रूस से तेल खरीदने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश था, जो केवल चीन से पीछे था. ज़ाहिर है कि ये दोनों संभावित अमेरिकी टैरिफ के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं. दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच, रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत थी, जबकि भारत की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत थी.
51 प्रतिशत आयात
नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 51% से अधिक थी. ऐसे समय में जब होर्मुज जलडमरूमध्य से आवागमन अब भी प्रतिबंधित है, 30 दिनों के भीतर इसे काफी हद तक कम करना भारत के लिए संभवतः असंभव होगा.
शुल्क लगाने का दूसरा मानदंड यह है कि क्या कोई देश अधिनियम के लागू होने की तिथि से पूर्व के 12 महीनों के दौरान रूसी तेल प्रतिबंधों से बचने में सहायता करने वाले शीर्ष पांच देशों में शामिल था.
इस मानदंड के तहत शुल्क के दायरे में आने का भारत का जोखिम काफी कम है, क्योंकि भारतीय तेल विपणन कंपनियों ने बार-बार कहा है कि उनकी सभी खरीद प्रतिबंधों का उल्लंघन किए बिना की गई है.

भारतीय प्रतिक्रिया
भारत के विदेश मंत्रालय ने विधेयक पारित होने पर तुरंत बयान जारी कर कहा कि उसने इस मुद्दे को अमेरिका के साथ उठाया था और द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर इसके प्रभाव को रेखांकित किया था.
मंत्रालय ने यह भी कहा कि भारत ‘अपनी 1.4 अरब आबादी के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है.’ मंत्रालय ने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करने के भारत के संकल्प की भी घोषणा की.
भारत के बयान की भाषा और लहजा पिछले साल की प्रतिक्रिया से फर्क है, जब ट्रंप ने 6 अगस्त, 2025 को भारतीय वस्तुओं पर ‘दंडात्मक’ टैरिफ लगाने की घोषणा की थी.
पश्चिमी पाखंड!
तब भारत ने अमेरिकी कार्रवाई को ‘अनुचित और तर्कहीन’ बताया और पश्चिमी देशों के पाखंड पर प्रहार किया था. भारत ने कहा कि यूरोपीय संघ और अमेरिका दोनों रूस के साथ व्यापार जारी रखे हुए हैं.
पाखंड पर प्रहार करने की नीति से हटकर भी हमें कुछ करना होगा. ऊर्जा सुरक्षा के अलावा पाबंदियों का असर भारतीय रिफाइनरियों के कामकाज पर भी पड़ेगा.
भारत के सबसे बड़े समूह, रिलायंस इंडस्ट्रीज, के पास दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे जटिल तेल शोधन केंद्र है. पिछली बार उसने आयात रोका था. उस समय निजी
रिफाइनरियों के अलावा सरकारी नियंत्रण वाली रिफाइनरियों ने भी रूसी तेल का आयात निलंबित किया था. पिछले साल भारत का अमेरिका से आयात बढ़ा और रूस से घटा. पश्चिम एशियाई तेल का आयात भी बढ़ा.
पाबंदियों से छूट
ईरान-युद्ध के कारण प्रतिबंधों में छूट मिली, जिसके बाद रूसी तेल की आमद फिर बढ़ी. इस साल जुलाई तक, भारत का रूसी खनिज तेल का आयात लगातार दूसरे महीने रिकॉर्ड ऊँचाई पर था.
प्रतिबंधों के कारण परिवहन की लागत बढ़ने के बावज़ूद रूस ने कीमतों में छूट देकर खनिज तेल को किफायती बनाए रखा था. अब, सस्ता रूसी तेल बंद होने के कारण कीमतें फिर बढ़ेंगी. यह स्थिति भारत के लिए ही नहीं अमेरिका समेत सारी दुनिया के लिए परेशानी पैदा करेगा.

ईरान भी शामिल
लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026 में मूल रूप से ईरान का नाम नहीं था. इसमें 'एंड ईरान' शब्द जोड़ा गया ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ये उपाय ईरान को भी लक्षित करते हैं.
पाठ में संशोधन करके यह कहा गया है कि ईरान पर प्रतिबंध अगले पाँच वर्षों तक, यानी 2031 तक लागू रहेंगे. इस तरह से ईरान पर दबाव बनाने का भी उपकरण यह कानून बनेगा.
कानून में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत लगाया गया आयात शुल्क किसी भी वस्तु पर लगाए गए अन्य किसी भी शुल्क के अतिरिक्त. होगा.
अन्य टैरिफ
इसमें 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत लगाए गए शुल्क भी शामिल हैं, जो अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि को अमेरिकी व्यापार को नुकसान पहुँचाने वाली विदेशी व्यापार प्रथाओं की जाँच करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार देता है.
इसके अलावा 1962 के व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 भी शामिल है. यदि जाँच में पाया जाता है कि विदेशी वस्तुएँ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं, तो अमेरिकी राष्ट्रपति आयात प्रतिबंधित करने या शुल्क लगाने का अधिकारी है.
ये दोनों अन्य अधिनियम महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत उन देशों में शामिल है जिन पर पहले से ही इनके तहत शुल्क लागू हैं. अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने धारा 301 का उपयोग करके अमेरिकी व्यापार भागीदारों की जाँच की ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्या उन्होंने बेगार श्रम से निर्मित वस्तुओं के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाए हैं.
अपनी जाँच के आधार पर, उसने भारत से आयात पर 10% का शुल्क लगाया. इसके अलावा, ट्रंप ने धारा 232 के तहत शुल्कों का दायरा बढ़ाकर इसमें इस्पात,एल्युमिनियम, तांबा और संबंधित व्युत्पन्न उत्पादों को भी शामिल कर लिया और दर को बढ़ाकर 50% कर दिया.

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