सिर्फ प्रशिक्षण ही काफी नहीं

Story by  हरजिंदर साहनी | Published by  [email protected] | Date 20-09-2026
Training alone is not enough.
Training alone is not enough.

 

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मुंबई के पास भिवंडी पूर्व के विधायक रईस शेख ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है जिसे आज के माहौल में नजरंदाज कर दिए जाने की पूरी आशंका है। यह भी हो सकता है कि कुछ लोग उसकी निंदा करें या मजाक उड़ाएं।

विधायक ने महाराष्ट्र की अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री सुनेत्रा अजित पवार से मांग की है कि प्रदेश के मुस्लिम नौजवानों को कारोबारी बनने की प्रशिक्षण दिया जाए। जिससे कि वे अपने कारोबार शुरू कर सकें और खुद अपने उद्योग धंधें चला सकें।

वैसे रईस शेख ने जो मांग की है वह कोई नई नहीं है। कई दलित विचारक और नेता अपने समुदाय के लिए इसकी लंबे समय से मांग करते रहे हैं। इस मांग के समर्थन में उनके दो तर्क रहे हैं।

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एक तो अगर दलित उद्योगपति बनेंगे तो वे अपने आस-पड़ोस के और अपने समुदाय को लोगों को नौकरी पर रखेंगे जिससे पूरे समुदाय का उत्थान होगा। कम से कम वे किसी को काम पर रखने से पहले वे जाति के पूर्वाग्रहों से ग्रस्त तो नहीं ही होंगे।

दूसरे अगर ऐसा होता है तो दलित समुदाय को अपने रोल माॅडल भी मिलेंगे। समुदाय को लोगों को लगेगा कि अगर वे भी कोशिश करें तो काफी आगे जा सकते हैं।
यह सच है कि देश में चंद बड़े मुस्लिम उद्योगपति हैं। मध्यम और छोटे स्तर के कारोबार में भी बहुत से मुस्लिम समुदाय के लोग मेहनत कर रहे हैं। लेकिन अगर बहुसंख्यक

समुदाय से तुलना करें तो उनका अनुपात काफी कम है। इसे लेकर जो थोड़े बहुत अध्ययन हुए हैं वे बताते हैं कि ये मुस्लिम कारोबारी भी एक सीमित भूगोल में ही हैं। इनमें से भी ज्यादातर वे हैं जो पीढ़ियों से इन कारोबार में काम करते रहे हैं।

जमीन से उभर कर आगे वाले नए मुस्लिम कारोबारियों की संख्या आपको काफी कम मिलेगी।लेकिन इसकी तुलना अगर हम दलित समुदाय से करें तो वहां मध्यम स्तर के कारोबारियों की संख्या भी न के बराबर ही है।

जो थोड़े बहुत हैं उनके जरिये पूरे समुदाय को प्रेरित करने के लिए कुछ लोगों ने दलित चैंबर आॅफ काॅमर्स जैसे संगठन भी बनाए हैं। लेकिन ये सब शुरुआती  कोशिशें हैं जिनके कोई बड़े नतीजे अभी तक सामने नहीं आए हैं।

दलित समुदाय के लोगों को प्रशिक्षण वगैरह देने की कोशिशें भी हुई हैं। लेकिन कारोबार सिर्फ प्रशिक्षण और कौशल से ही शुरू नहीं होता। इसके लिए पूंजी जुटाना सबसे बड़ी जरूरत होती है। सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए यह सबसे मुश्किल काम होता है।

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रईस अहमद ने इस बाबत जब सुनेत्रा अजित पवार को चिट्ठी लिखी तो शायद इन सभी बाधाओं का भी पता ही होगा। प्रशिक्षण अपने आप में महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ इतने से ही कुछ ज्यादा हासिल होने की उम्मीद नहीं है। दरअसल हमें दलितों, अल्पसंख्यकों, जनजातियों और सभी पिछड़े वर्गों के प्रतिभाशाली नौजवानों के कारोबारी जगत में पैर जमाने का एक विस्तृत रोडमैप बनाना होगा।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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