प्रमोद जोशी
पश्चिम एशिया में युद्ध भड़क के बाद हमारा ध्यान यूक्रेन और अफ़ग़ानिस्तान से हट गया, जबकि वहाँ भी लड़ाइयाँ चल रही हैं. ईरान की लड़ाई रुक भी जाएगी, पर लगता है कि यूक्रेन की लड़ाई और पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान टकराव जल्द खत्म नहीं होगा.
पाकिस्तान ने पिछली 25मार्च को कहा कि उसकी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ अभियान फिर से शुरू कर दिया है. क्या वजह है कि पाकिस्तान ने इस समय बड़ा फौजी अभियान चलाने का फैसला किया है? क्या इसका संबंध भी ईरान-युद्ध से है? क्या इसके पीछे अमेरिका की सहमति या उसकी ही योजना है?
ऐसे कुछ सवाल भी ज़ेहन में आते हैं. जो बाइडेन के कार्यकाल में अमेरिका ने अफग़ानिस्तान के मामले में भारत को महत्त्व दिया था, पर इस समय ट्रंप प्रशासन का पाकिस्तान पर पूरा भरोसा है. ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी ने कहा है कि तालिबान हमलों के खिलाफ आत्मरक्षा करने का पाकिस्तान को पूरा अधिकार है.

अस्पताल पर हमला
हाल में अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक नशा मुक्ति केंद्र पर पाकिस्तानी हवाई हमले में 400से अधिक लोग मारे गए थे. पाकिस्तान का कहना है कि हमने ये हमले ‘फौजी ठिकानों और आतंकवादी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाते हुए’ किए थे.
बहरहाल ईद के मौके पर तुर्की, कतर और सऊदी अरब के अनुरोध पर युद्ध-विराम की घोषणा की गई थी. इसके बाद इस्लामाबाद में विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक ब्रीफिंग में प्रवक्ता ताहिर अंदराबी ने कहा, यह अभियान तब तक जारी रहेगा जब तक लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो जाते.
क्या है पाकिस्तानी लक्ष्य? अक्तूबर में हुए हवाई हमलों के बाद से दोनों देशों के बीच सीमा पर व्यापार ठप है. पाकिस्तानी अधिकारियों के अनुसार तोरखम सीमा चौकी गुरुवार को सैकड़ों अफगान शरणार्थियों को घर वापस जाने की अनुमति देने के लिए अस्थायी रूप से खोल दी गई है.
शरणार्थियों की वापसी
पाकिस्तान ने पिछले कई दशकों से अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे युद्धों के कारण शरण लेने वाले बीस लाख से अधिक अफगान शरणार्थियों को आश्रय दिया था. वह अब चाहता है कि वैध वीज़ा धारकों को छोड़कर सभी अफगान उसके देश से चले जाएँ, क्योंकि वे आतंकवादी हमलों और अन्य अपराधों में शामिल रहते हैं.
पाकिस्तान का, शरणार्थियों को वापस भेजने का काम, 2023के अंत में शुरू की गई 'अवैध विदेशियों की प्रत्यावर्तन योजना' का हिस्सा है. शरणार्थियों को इस तरह वापस भेजना संयुक्त राष्ट्र की निगाह में, अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन है.
अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी से पहले, काबुल की तत्कालीन सरकार, तालिबान लड़ाकों की मदद करने का आरोप, पाकिस्तान पर लगाती थी. उस समय पाकिस्तान इन आरोपों को ‘हास्यास्पद’ बताता था.

तालिबान का जन्म
तालिबान का मतलब होता है, छात्र. अफगान तालिबान वस्तुतः पाकिस्तानी मदरसों से निकले छात्र हैं. अस्सी के दशक में जब सोवियत कब्जे से देश को मुक्त कराने की मुहिम चली थी, तब इन्हें तैयार किया गया था. उस मुहिम में अमेरिका भी पाकिस्तान के साथ था.
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों ने अफगान तालिबान के गठन में मदद की थी और 2001से पहले, तालिबान शासन के सलाहकारों, विशेषज्ञों और सैन्य उपकरणों एवं संचालन का काफी काम पाकिस्तानी करते थे.
2023में अमेरिकी सेना जब अफ़ग़ानिस्तान से वापस चली गई और तालिबान ने सत्ता संभाली, तो इस्लामाबाद ने शुरू में काबुल में नई सरकार का स्वागत किया. तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने उसे ‘गुलामी की बेड़ियों का टूटना’ बताया.
टीटीपी से नाराज़गी
तालिबान 1996से 2001तक, जब पहली बार सत्ता में थे, तब कुछ ही देशों ने उस सरकार को मान्यता दी थी. पाकिस्तान उनमें से एक था. अब तालिबान के दूसरी बार सत्ता में लौटने के बाद से दोनों देशों के बीच के टकराव से लगता है कि इसके पीछे कोई नया कारण या रणनीति है.
पाकिस्तान की नाराज़गी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से है, जिसे ‘पाकिस्तानी तालिबान’ के नाम से भी जाना जाता है. टीटीपी का उदय 2001में अमेरिका द्वारा अफ़ग़ानिस्तान पर किए गए आक्रमण का परिणाम था.उसकी औपचारिक स्थापना 2007में हुई थी. अफ़ग़ान-युद्ध में शामिल पाकिस्तानी जेहादी, वैश्विक आतंकवाद-विरोधी अमेरिकी प्रयासों को समर्थन देने वाली पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ हो गए.
टीटीपी का विस्तार
टीटीपी अत्यधिक विकेंद्रीकृत समूह है. इसके व्यापक उद्देश्य हैं, जिनमें पाकिस्तान के सुरक्षा बलों से लड़ना, पश्चिमी प्रभाव का विरोध करना और अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में शरिया कानून लागू करना शामिल है. 2013में मुल्ला फज़लुल्ला के नेतृत्व में, यह समूह अल-कायदा के करीब आ गया. अमेरिकी ड्रोन हमले में फज़लुल्ला की मौत के दो साल बाद, टीटीपी ने कहा कि पाकिस्तानी बलों को निशाना बनाने के अलावा उसका कोई अन्य क्षेत्रीय या वैश्विक एजेंडा नहीं है.
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद, पाकिस्तान को उम्मीद थी कि टीटीपी जैसे समूहों को पहले जैसा समर्थन नहीं मिलेगा और सीमा विवाद में सुधार होगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

भारत और तालिबान
पिछले साल अक्तूबर में, अफ़ग़ानिस्तान के विदेशमंत्री अमीर खान मुत्तकी ने दिल्ली का दौरा किया था, जिसके बाद भारत के साथ अफ़ग़ानिस्तान के साथ राजनयिक संबंध भी बहाल हो गए.उसी समय, पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने जियो न्यूज चैनल को दिए एक साक्षात्कार में अफ़ग़ानिस्तान पर आरोप लगाया कि वे ‘दिल्ली के छाया-युद्ध को चला रहे हैं.
सवाल तालिबान की विचारधारा का नहीं है, बल्कि भारत के हितों का और अफ़ग़ानिस्तान की भू-भौगोलिक स्थिति का है. भारत-अफ़ग़ानिस्तान रिश्ते हमेशा से दोस्ती के रहे हैं. इस दृष्टि से देखें, तो तालिबान के विदेशमंत्री की भारत-यात्रा अचानक नहीं हो गई.
इस नरमी को पर्यवेक्षक पाकिस्तान की ‘प्रतीकात्मक हार’ के रूप में देखते हैं. एक तरफ भारत इस क्षेत्र में निवेश करना चाहता है, वहीं तालिबान इस क्षेत्र के देशों के साथ संबंध बनाकर अपने अलगाव को खत्म करना चाहते हैं.
भारत का नज़रिया
तालिबान सरकार को व्यावहारिक समर्थन देने की भारत की क्षमता सीमित है, क्योंकि तालिबान, सख्त वैचारिक प्रणाली के माध्यम से देश को चलाते हैं, जिनका भारत समर्थन नहीं कर सकता.बावज़ूद इसके अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए भारत के अफ़ग़ानिस्तान के किसी भी प्रशासन के साथ मधुर संबंध निश्चित हैं. अफ़ग़ानिस्तान पर चीन का प्रभाव बढ़ रहा है. ऐसे में भारत नहीं चाहता कि वह पीछे रह जाए.
केवल 1996 से 2001 के तालिबान शासन को छोड़ दें, तो अफगानिस्तान के साथ भारत के रिश्ते हमेशा अच्छे रहे हैं. दूसरी तरफ कितना भी धार्मिक मतैक्य हो, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच सीमा विवाद हमेशा रहे हैं.
1947में अफगानिस्तान अकेला देश था, जिसने पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाने का विरोध किया था. यह विरोध इसलिए किया, क्योंकि वह पश्तूनिस्तान को अपने देश का हिस्सा मानता था. दोनों देशों की सीमा बनाने वाली डूरंड लाइन को वे स्वीकार नहीं करते हैं.
डूरंड लाइन
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच डूरंड रेखा अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाती है. इसे 1893में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर मॉर्टिमर डूरंड और अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच हुए समझौते के तहत तय किया गया था.
लगभग 2,640 किलोमीटर लंबी यह सीमा पश्चिमी बलोचिस्तान से पूर्वी नूरिस्तान तक फैली हुई है, और पश्तून और बलोच जनजातियों के पारंपरिक क्षेत्रों को विभाजित करती है. अफगानिस्तान का कहना है कि डूरंड समझौता ब्रिटिश साम्राज्यवादी दबाव में हुआ था.
डूरंड लाइन के पार के कुछ क्षेत्र, जो अब पाकिस्तान में हैं, जैसे खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के हिस्से, पहले अफ़ग़ानिस्तान में थे. यह समझौता 100वर्षों के लिए था, जो 1993में समाप्त हो चुका है.
इस रेखा ने पश्तून और बलोच जनजातियों को दो देशों में बाँट दिया, जिससे सांस्कृतिक और पारिवारिक एकता प्रभावित हुई. पश्तून समुदाय, जो दोनों देशों में फैला है, इसे अपनी एकता के लिए खतरा मानता है. कई पश्तून एकीकृत ‘पश्तूनिस्तान’ की माँग करते हैं.
खुला युद्ध
दोनों देशों के बीच तनातनी तो हमेशा ही चलती रहती है और छोटी-मोटी झड़पें अक्सर होती रहती हैं, पर अब खुला युद्ध शुरू हो गया है. 16मार्च को, पाकिस्तान ने काबुल के नशा मुक्ति केंद्र पर जो हवाई हमला किया, वह वस्तुतः अफ़ग़ानिस्तान के शहरी क्षेत्रों पर पहला पाकिस्तानी हमला था.
पाकिस्तान के रक्षामंत्री ने बाद में इसे अफ़ग़ानिस्तान के साथ ‘खुला युद्ध’ बताया. सीमा पर हिंसा की घटनाएं लगातार हो रही हैं. इससे संकेत मिलता है कि और भी बड़ी सैन्य कार्रवाई की संभावना है. फिलहाल दोनों पक्षों के लिए आम सहमति तक पहुँचना मुश्किल लगता है.
टीटीपी को नियंत्रित करने में तालिबान की दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि वह उसे अपना वफादार सहयोगी मानता है. वहीं, पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर ने टीटीपी को एक ऐसा कट्टर दुश्मन बताया है जिससे सुलह या बातचीत संभव नहीं है.

चीनी हस्तक्षेप
काबुल पर हाल ही में हुए हवाई हमलों के बाद चीन ने ‘जितनी जल्दी हो सके’ युद्धविराम का आह्वान किया है. साथ ही उसने पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान दोनों से जल्द से जल्द ‘शांतिपूर्वक और संयम से आमने-सामने की बातचीत’ करने का आग्रह किया है.
चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने पिछले सप्ताह इस मुद्दे पर अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों से फोन पर बात की. चीन, भारत और रूस सहित कई पड़ोसी देशों के अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के साथ जटिल संबंध हैं, जो शीत युद्ध के समय से चले आ रहे हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि इन देशों ने क्षेत्रीय स्थिरता, आतंकवाद और आर्थिक विकास पर इसके संभावित प्रभावों का आकलन करने के लिए संघर्ष को बारीकी से देखा है. ईरान ने पहले ही कहा था कि वह अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच वार्ता कराने के लिए तैयार है.
भारत पर तोहमत
पाकिस्तान ने टीटीपी को समर्थन देने के लिए भारत को दोषी ठहराया है, और पाकिस्तानी रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने भारत को अफ़ग़ानिस्तान का ‘छिपा हुआ सहयोगी’ बताया है.पर्यवेक्षक मानते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत, रूस और चीन की दिलचस्पी है, फिर भी इनमें से कोई भी देश ‘युद्ध में शामिल होने’ का इच्छुक नहीं होगा. अलबत्ता पाक-अफ़ग़ान टकराव बढ़ा, तो अमेरिका के लिए अलकायदा का खतरा बढ़ सकता है.
उधर चीन को शिनजियांग प्रांत में वीगुर प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है. इस इलाके में सक्रिय ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) से भी चीन को खतरा है. ईरान की अस्थिरता से इस इलाके में जोखिम और ज्यादा बढ़ गए हैं.
( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)