आवाज द वायसब्यूरो,पुणे
पूरी दुनिया में फैली इस्लामी तहरीक 'तब्लीगी जमात' के महाराष्ट्र के आमीर हाफिज मंजूर को सोमवार रात बेहद गमगीन लेकिन शांत माहौल में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। पिंपरी-चिंचवड के निगडी कब्रिस्तान में हज़ारों अकीदतमंदों की मौजूदगी में उनकी तदफीन हुई।
इस मौके तब्लीगी जमात के प्रमुख हज़रत मौलाना साद और उनके बेटे खास तौर पर मौजूद रहे और उन्होंने हाफिज मंजूर का आखिरी दीदार किया। हाफिज मंजूर का कल (18 मई को) पुणे में इंतकाल हो गया था। उनके गुज़र जाने से देशभर के मुस्लिम समाज में गम की लहर दौड़ गई है।
जनाज़े में उमड़ा जनसैलाब
शोहरत और किसी भी तरह के दिखावे से दूर रहकर हाफिज मंजूर ने अपनी पूरी ज़िंदगी समाज सुधार और दीन की खिदमत में गुज़ार दी। उनका जनाज़ा बेहद सादगी और मुकम्मल अनुशासन के साथ निकाला गया।
पूरे देश से उनके हज़ारों चाहने वाले सोमवार रात पुणे पहुंचे थे। उनके पार्थिव शरीर को आखिरी दीदार के लिए फातिमा मस्जिद में रखा गया था। मस्जिद से लेकर निगडी कब्रिस्तान तक लोगों की भारी भीड़ थी। इतनी बड़ी तादाद में लोगों के इकट्ठा होने के बावजूद पूरा जनाज़ा बहुत ही शांति और अनुशासन के साथ मुकम्मल हुआ।
आखिरी सांस तक दीन के काम में रहे एक्टिव
हाफिज मंजूर अपनी ज़िंदगी के आखिरी दिन तक पूरी तरह एक्टिव थे। इतवार की रात ही वह पुणे आए थे और अपने रोज़ के मामूल के मुताबिक उन्होंने सुबह की तहज्जुद और फज्र की नमाज़ अदा की थी।
फज्र की नमाज़ के बाद मस्जिद में ही उन्हें अचानक चक्कर आ गया। इलाज के लिए उन्हें फौरन अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनके करीबियों ने बताया कि वह हर सोमवार और गुरुवार को पाबंदी से रोज़ा रखते थे और इंतकाल के वक्त भी वह रोज़े की हालत में ही थे।
नशामुक्ति और समाज सुधार पर रहा ज़ोर
पुणे की फातिमा मस्जिद में रहकर उन्होंने कई दशकों तक दीन और समाज की खिदमत की। नौजवानों को नशे से दूर रखने और समाज में दहेज के खिलाफ बेदारी पैदा करने के लिए उन्होंने उम्र भर कड़ी मेहनत की।
वह हमेशा इस बात पर ज़ोर देते थे कि शादी-ब्याह जैसे कार्यक्रम बेहद सादगी से होने चाहिए। उनके इंतकाल से समाज का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है और लोगों का मानना है कि उन्होंने अपना एक सच्चा रहनुमा खो दिया है।
उम्मत का बड़ा नुकसान, तालीम हमेशा ज़िंदा रहेगी
हाफिज मंजूर का दुनिया से जाना पूरी उम्मत के लिए एक बहुत बड़ा नुकसान माना जा रहा है। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी दीन की खिदमत, समाज की भलाई और इंसानियत के लिए लगा दी।
उन्होंने नौजवानों को हमेशा अच्छी तालीम हासिल करने, बेहतरीन अखलाक अपनाने और सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा दी। उनकी मेहनत, सादगी, उम्मत की फिक्र और लोगों को जोड़ने का उनका हुनर हमेशा याद रखा जाएगा। आज भले ही वह जिस्मानी तौर पर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके किए गए नेक काम और उनकी दी गई तालीम हमेशा ज़िंदा रहेगी।
क्या है तब्लीगी जमात?
तब्लीगी जमात एक आलमी सुन्नी इस्लामी सुधारवादी तहरीक है। इस तहरीक की शुरुआत 1926 में मौलाना मोहम्मद इलियास कांधलवी ने भारत के मेवात इलाके से की थी।मुसलमानों को उनके बुनियादी मज़हबी उसूलों और तालीम की तरफ वापस लाना, इस तहरीक का अहम मकसद है। पाबंदी से नमाज़ पढ़ने और सादगी भरी ज़िंदगी गुज़ारने पर इनका सबसे ज़्यादा ज़ोर होता है।
यह जमात सियासत, सामाजिक विवादों और शोहरत से पूरी तरह दूर रहती है। इसके सदस्य कुछ दिनों का वक़्त निकालकर गांव-गांव और मस्जिदों में सफर करते हैं और दूसरे मुस्लिम भाइयों को दीन के रास्ते पर चलने की याद दिलाते हैं।इस तहरीक में राज्य या देश की रहनुमाई करने के लिए एक प्रमुख होता है, जिसे 'आमीर' कहा जाता है। हाफिज मंजूर इसी तब्लीगी जमात के महाराष्ट्र राज्य के आमीर थे।