देस-परदेस : बदलते वैश्विक-संदर्भों में भारत की चुनौतियाँ

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 19-05-2026
Des-Pardes: India's Challenges in Changing Global Contexts
Des-Pardes: India's Challenges in Changing Global Contexts

 

प्रमोद जोशी

वैश्विक-राजनीति में हमेशा ही कोई न कोई घटना ऐसी होती रहती है, जो किसी खास इलाके के लिए महत्त्वपूर्ण होती है. पिछले हफ्ते भारत में ‘ब्रिक्स’ विदेशमंत्रियों का सम्मेलन और प्रधानमंत्री का पाँच देशों की यात्रा पर निकलना भी ऐसी ही घटनाएँ हैं.

पिछले हफ्ते भारत ने नई दिल्ली में ‘ब्रिक्स’ के विदेशमंत्रियों की बैठक की मेजबानी की और अगले सप्ताह ‘क्वॉड’ के विदेश मंत्रियों मेजबानी और महीने के अंत में भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन का आयोजन भी करेगा. इनमें से हरेक आयोजन भारतीय डिप्लोमेसी के अलग-अलग पहलुओं पर रोशनी डालता है.

‘ब्रिक्स’ और ‘क्वॉड’ को अक्सर वैचारिक रूप से विरोधी संगठनों के रूप में चित्रित किया जाता है. ‘ब्रिक्स’ को पूर्वी देशों द्वारा पश्चिमी वर्चस्व को उखाड़ फेंकने के साधन के रूप में, जबकि ‘क्वॉड’ को चीन के विरुद्ध एक रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में. इस प्रकार के वर्णन दोनों समूहों की अतिरंजना करते हैं.

‘ब्रिक्स’ में टकराव

‘ब्रिक्स’ में ऐसे देश शामिल हैं, जिनके बीच प्रत्यक्ष संघर्ष हैं. ‘क्वॉड’, अपने बढ़ते सहयोग के बावजूद, औपचारिक गठबंधन नहीं है. भारत ने तो ‘क्वॉड’ को सुनियोजित सुरक्षा सहयोग के मंच में बदलने का हमेशा विरोध किया है.

पिछले हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की चीन-यात्रा के पीछे भी हमारे लिए कुछ संकेत छिपे हैं. उधर ‘ब्रिक्स’ के सम्मेलन में ईरान और यूएई के मतभेद उभर कर आए, जिनके कारण संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका.

अमेरिका और चीन की वार्ता के केंद्र में भारत भले ही नहीं था, पर दोनों के रिश्ते सुधरे, तो उसका, भारत-अमेरिका और भारत-चीन रिश्तों पर भी प्रभाव पड़ेगा. सवाल है कि क्या रिश्ते सुधरे?इन पंक्तियों के लिखे जाने तक प्रधानमंत्री, संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड्स और स्वीडन की यात्राएँ पूरी कर चुके हैं. इसके बाद वे नॉर्वे में नॉर्डिक शिखर-सम्मेलन में भाग लेंगे, और यात्रा के अंतिम चरण में इटली रुकेंगे.

स्वीडन में उन्हें ‘रॉयल ऑर्डर ऑफ पोलर स्टार कमांडर ग्रैंड क्रॉस’ से सम्मानित किया गया है. यह स्वीडन का सर्वोच्च सम्मान है, जो किसी देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्र प्रमुख को दिया जाता है.

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यूएई से रिश्ते

भारत के नजरिए से खोखले वैचारिक नारों के बजाय व्यावहारिक हितों की पूर्ति पर जोर देना बेहद ज़रूरी है. साफ है कि प्रधानमंत्री यूएई के प्रति अपने समर्थन को व्यक्त करने के लिए गए हैं.उन्होंने यूएई पर हुए हमलों की कड़ी निंदा को दोहराया, साथ ही होर्मुज़ स्ट्रेट से सुरक्षित आवाजाही और बिना किसी बाधा के जहाज़ों के आवागमन को सुनिश्चित करने के पक्ष में भारत का स्पष्ट रुख भी रखा.

इस दौरान भारत और यूएई के बीच रक्षा-साझेदारी की रूपरेखा पर समझौता भी हुआ. इसके तहत दोनों देश एडवांस रक्षा तकनीकों के संयुक्त विकास और सह-उत्पादन, इंटेलिजेंस साझा करने और आतंकवाद विरोधी सहयोग को और मजबूत करेंगे.

पहली नज़र में इस क्षेत्र के सभी देशों के साथ हमारे अच्छे रिश्ते है, पर यूएई के साथ हाल के वर्षों में खासतौर से सुधरे हैं. मतलब यह नहीं है कि दूसरे देशों के साथ रिश्ते खराब है, पर तुलनात्मक अंतर देखा जा सकता है.

हाल में यूएई ने ‘ओपेक’ से हटने का फैसला किया है. पेट्रोलियम का कारोबार करने वाले देशों में यूएई, अन्य देशों से कुछ हटकर सोच रहा है. भारत का पेट्रोलियम के अलावा पूँजी निवेश, वैज्ञानिक-तकनीकी और सामरिक-सहयोग का भी रिश्ता है.

यूएई का अंतरिक्ष कार्यक्रम, आसपास के देशों में सबसे ज्यादा विकसित है. उसका इस मामले में भारत के साथ सहयोग है. इसके अलावा वहाँ 45लाख भारतीय कामगारों की उपस्थिति इस रिश्ते को और भी मज़बूत बनाती है.

कश्मीर-नीति 

भारत की कश्मीर-नीति को लेकर भी यूएई की भूमिका पश्चिम एशिया में इसराइल को छोड़कर अन्य इस्लामिक-देशों की तुलना में कुछ अलग है, और भारत के प्रति अधिक सकारात्मक है.जहाँ शेष मुस्लिम देश परंपरा से पाकिस्तानी रुख का समर्थन करते हैं, वहीं यूएई ने अपनी नीति को भारत के साथ अपने आर्थिक और नीतिगत संबंधों के अनुसार ढाला है. कमोबेश ऐसा सऊदी अरब समेत खाड़ी के अन्य देशों का रुख भी है, पर यूएई का रुख कहीं ज्यादा स्पष्ट रहा है.

अगस्त 2019में जब भारत ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370हटाया, तब सऊदी अरब ने भारत की भर्त्सना ज़रूर नहीं की, पर चिंता व्यक्त की. वहीं यूएई ने इसे भारत का ‘आंतरिक मामला’ बताया.

उसके पहले मार्च 2019में तत्कालीन विदेशमंत्री सुषमा स्वराज को अबू धाबी के सम्मेलन में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया और पाकिस्तान के विरोध की अनदेखी की गई, जिसके विरोध में पाकिस्तान ने सम्मेलन का बहिष्कार किया.

यूएई की नीति 'इस्लामिक एकजुटता' से ऊपर उठकर 'आर्थिक डिप्लोमेसी' पर आधारित है. उनका यह भी कहना था कि कश्मीर, मुस्लिम दुनिया का मुद्दा नहीं है, बल्कि भारत-पाकिस्तान का द्विपक्षीय मसला है.डिप्लोमेसी में शब्दों का प्रयोग और प्रतीकों का गहरा अर्थ होता है. उन्हीं दिनों जब कश्मीर में लॉकडाउन चल रहा था, यूएई ने पीएम मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान, 'ऑर्डर ऑफ ज़ायेद' से नवाजा था.

यूएई ने ही इस्लामिक सहयोग संगठन में भारत को अतिथि के रूप में आमंत्रित करने और भारत-विरोधी बयानों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. जहाँ पाकिस्तान ने भारत से व्यापार बंद कर रखा है, वहीं यूएई ने भारत के साथ अपने व्यापार को प्राथमिकता दी है, जो 100अरब डॉलर से अधिक का है.

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ट्रंप का चीन दौरा

इस बीच, दुनिया की निगाहें पिछले सप्ताह बीजिंग में डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात पर टिकी थीं. नौ वर्षों में अमेरिकी राष्ट्रपति की चीन की यह पहली यात्रा थी.इस यात्रा के दौरान ट्रंप के बयानों से लगता है कि जैसे उनके रुख में नरमी आई है. इस बीच अमेरिकी चिप मेकर एनवीडिया को 10चीनी कंपनियों को सेमीकंडक्टर बेचने की मंज़ूरी दी गई और बोइंग को 200विमान का ऑर्डर मिला. सिटी को चीन में सिक्योरिटीज़ कारोबार चलाने की मंज़ूरी भी मिल गई.

इस किस्म के समझौते ज़रूर हुए हैं, पर ताइवान को लेकर अमेरिका ने कोई आश्वासन चीन को नहीं दिया है. ट्रंप ने ताइवान को प्रस्तावित 14अरब डॉलर की उस लंबित हथियार सौदे के बारे में कुछ नहीं कहा, जिसे चीन पर सख़्त रुख़ रखने वाले डेमोक्रेट और रिपब्लिकन पार्टी के नेता ज़रूरी मानते हैं.

ट्रंप ने एयर फ़ोर्स वन में पत्रकारों से कहा, ताइवान के मुद्दे पर शी जिनपिंग का रुख बहुत कठोर है. मैंने किसी भी तरफ़ कोई कमिटमेंट नहीं किया. बैठक के चीनी विवरण में ताइवान को सबसे अहम मुद्दा बताया गया और कहा गया कि इस मुद्दे को हल नहीं किया गया, तो टकराव और यहाँ तक कि संघर्ष भी हो सकता है. वाइट हाउस के बयान में ताइवान का ज़िक्र भी नहीं है.

रिश्तों का संतुलन

भारत की अभी तक की कोशिश अमेरिका के प्रति झुकाव की रही है, पर वह चीन के साथ रिश्तों में संतुलन बनाने का प्रयास भी करता है. मसलन भारत, ‘क्वॉड’ का सदस्य है, पर उसे चीन के खिलाफ मोर्चा नहीं मानता है.

दूसरी तरफ डॉनल्ड ट्रंप के कड़वे बयानों के बावज़ूद ‘ब्रिक्स’ के साथ भारत मजबूती के साथ खड़ा है. चीन और अमेरिका दोनों भारत के बड़े कारोबारी साझेदार हैं. कई मामलों में भारत की दोनों पर निर्भरता है.भारत बहुध्रुवीय दुनिया की बात करके चीनी नज़रिए से सहमति व्यक्त करता है, तो बहुध्रुवीय एशिया की बात भी करता है, जो चीन को चुभेगी. दुनिया में अमेरिका का दबदबा है और एशिया में चीन का.

अमेरिका भारत को चीन से मुक़ाबले के लिए अहम देश के रूप में देखता रहा है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप से दूसरे कार्यकाल में अमेरिका का यह नज़रिया बदला है.

भारत के ख़िलाफ़ ट्रंप के भारी टैरिफ़ ने, भारत को चीन से रिश्ते सुधारने की ओर प्रेरित किया. इसके साथ ही भारत ने अमेरिकी बाज़ार पर भारी निर्भरता कम करने के लिए अपने निर्यात में विविधता लाने की कोशिश भी की. ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन से समझौते किए. इस कोशिश में चीन भी शामिल है.

भारत के रिश्ते

ट्रंप की चीन-यात्रा से भारत के तईं कोई भी निष्कर्ष निकालना आसान नहीं है, पर इतना साफ है कि भारत न तो अमेरिका का पिट्ठू देश है और न चीन के दबाव में आने वाला है. भारत अपनी भरोसेमंद साझेदारियों को आगे बढ़ाएगा.

मोदी की खाड़ी यात्रा के बाद यूरोप का दौरा चल रहा है, जिसमें नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली शामिल हैं, साथ ही ओस्लो में नॉर्डिक शिखर सम्मेलन भी होगा. उनकी यूरोप-यात्रा इस बात को रेखांकित कर रही है कि यूरोप के साथ भारत की भागीदारी कितनी विकसित हुई है.

शीत युद्ध के दौरान, भारत-यूरोप रिश्ते अक्सर सोवियत संघ के घनिष्ठ संबंधों से प्रभावित होते थे. शीत युद्ध के तीन दशक बाद, भारत ने यूरोप के दूरगामी महत्व को पहचाना और हाल में यूरोपीय संघ के साथ फ्री-ट्रेड समझौता किया.

निर्यात बाजार, पूँजी-निवेश, उन्नत प्रौद्योगिकी और हरित ऊर्जा साझेदारियों में यूरोप, अब भारत का केंद्र बन गया है. यह भारतीय छात्रों, पेशेवरों और पर्यटकों के लिए भी एक आकर्षक गंतव्य बन गया है.यूरोप के छोटे देशों में भी ऐसी क्षमताएँ हैं जो भारत के आर्थिक, औद्योगिक और तकनीकी आधुनिकीकरण के लिए प्रासंगिक हैं. नीदरलैंड्स, स्वीडन, नॉर्वे और इटली तकनीकी लिहाज से उन्नत देश हैं.

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अफ्रीकी देश

इस लिहाज से महीने के अंत में होने वाला भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन एक नई दिशा की ओर इशारा कर रहा है, जिसका भारत के लिए महत्व आने वाले दशकों में लगातार बढ़ेगा.भविष्य की वैश्विक-अर्थव्यवस्था में अफ्रीका की केंद्रीय भूमिका होगी. उसकी युवा आबादी, बढ़ते बाजार और महत्वपूर्ण खनिजों के समृद्ध भंडार सभी प्रमुख शक्तियों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं.

अफ्रीका के साथ भारत के संबंध उपनिवेशवाद-विरोधी एकजुटता पर आधारित हैं. लेकिन अब इस रिश्ते में व्यापार, निवेश, संपर्क और सुरक्षा सहयोग पर अधिक रणनीतिक ध्यान देने की आवश्यकता है.हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि चीन और अमेरिका भी अफ्रीका पर प्रभाव जमाने के दावेदार हैं और काफी साधन इस काम में लगाते हैं.

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