हाउसिंग सोसायटियों में मुजतबा सर की साइंस क्लास का जादू

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 21-05-2026
Prof. Mujtaba Lokhandwala is sowing the seeds of science in housing societies.
Prof. Mujtaba Lokhandwala is sowing the seeds of science in housing societies.

 

मृदगंधा दीक्षित

आमतौर पर किसी भी शहर की हाउसिंग सोसायटी में शाम के वक्त क्या नज़ारा देखने को मिलता है? ऑफिस से थके-हारे लौटते लोगों की गाड़ियों की पार्किंग में गहमागहमी, चबूतरों पर जमे बुज़ुर्गों की गपशप और खुली जगह पर शोर मचाते हुए खेलते बच्चे। आजकल तो इन खेलने वाले बच्चों की तादाद भी कम हो गई है, क्योंकि ज़्यादातर नन्ही फौज घरों में ही मोबाइल या टीवी की स्क्रीन में आंखें गड़ाए बैठी रहती है। एक तरफ जहां यह एक बंधा-बंधाया और रोज़ाना का नज़ारा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ सोसायटियों में शाम के वक्त कुछ बहुत ही अनोखा हो रहा होता है।

वहां बच्चे कुछ अलग ही कर रहे होते हैं। उनके हाथों में कभी प्लास्टिक की बोतलें, कभी धागे, कभी गुब्बारे तो कभी चुंबक के टुकड़े होते हैं। वहां एक अलग ही खेल चल रहा होता है, और विज्ञान की एक नई दुनिया खुल रही होती है। इस नई और प्रेरणा देने वाली साइंटिफिक पहल के मास्टरमाइंड हैं प्रो. मुजतबा लोखंडवाला। रटंत विद्या वाली पढ़ाई के दायरे से बाहर जाकर, बच्चों के मन में मौजूद कुदरती जानने की इच्छा  को जगाने का बेहद अहम काम लोखंडवाला सर सोसायटियों के आंगनों में कर रहे हैं।

चबूतरे पर सजी लैबोरेटरी

आज की पढ़ाई की व्यवस्था में साइंस जैसे दिलचस्प विषय को भी अक्सर सिर्फ अच्छे नंबर लाने और रटने के लिए पढ़ा जाता है। 'न्यूटन का नियम क्या है?' यह तोता-रटंत बताने वाले बच्चे, अक्सर यह बताने में लड़खड़ा जाते हैं कि असल ज़िंदगी में वह नियम कैसे लागू होता है। बिल्कुल इसी कमी को पहचानते हुए लोखंडवाला सर ने सोसायटी के बच्चों के लिए 'एक्टिविटी बेस्ड लर्निंग' (खेल-खेल में सीखना) शुरू किया। वह भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science and Technology) के लिए 'एक्टिविटी बेस्ड लर्निंग' के ऑफिशियल ट्रेनर के तौर पर भी काम करते हैं।

इन प्रैक्टिकल एक्सपेरिमेंट्स की अहमियत पर बात करते हुए सर कहते हैं, "साइंस का असली मकसद इम्तिहान में नंबर लाना नहीं है, बल्कि हमारे आस-पास होने वाली घटनाओं को जानने की इच्छा और लॉजिकल नज़रिए से देखना है।

बच्चों के हाथों में महंगे गैजेट्स थमाने के बजाय, जब घर के बेकार पड़े सामान से कोई नियम साबित होता है, तो वह हमेशा के लिए उनकी याददाश्त में बैठ जाता है। प्रयोगशाला किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि सोसायटियों के आंगनों में और बच्चों के हाथों में होनी चाहिए।"

सोसायटी के लोग सर से संपर्क करके उनकी वर्कशॉप तय करते हैं। बच्चे उनके चारों ओर इकट्ठा हो जाते हैं। सर के हाथ में कोई मोटी-भारी किताब नहीं होती। उनके पास रोज़मर्रा के इस्तेमाल की बेहद सादी और आसान चीज़ें होती हैं।

एक छोटे से स्ट्रॉ और खाली बोतल की मदद से वह बच्चों को सिखाते हैं कि हवा का कैसे काम करता है। दो सादे शीशों के ज़रिए रोशनी के परावर्तन का खेल जमता है। खेलते-खेलते बच्चे गुरुत्वाकर्षण, गतिऔर ऊर्जा के नियम सीखने लगते हैं। यहां किसी को 'गलत या सही' का डर नहीं होता। बच्चों को सवाल पूछने की पूरी आज़ादी होती है।

"जब बच्चा पूछता है 'ऐसा क्यों?', तभी असल मायनों में साइंटिफिक प्रक्रिया की शुरुआत होती है," सर खास तौर पर इस बात पर ज़ोर देते हैं। एक बार यह वर्कशॉप हो जाने के बाद, उस सोसायटी में एक 'साइंस क्लब' बना दिया जाता है। उसे आगे चलाते रहने के लिए, लोखंडवाला सर सोसायटी के इच्छुक बड़ों को ट्रेनिंग भी देते हैं। यह उम्मीद की जाती है कि वह क्लब पहल करके महीने में कम से कम एक बार बच्चों के साथ कोई 'साइंस एक्टिविटी' ज़रूर करे।

जब छत पर उतरता है आसमान...

यह पहल ज़मीन से जुड़े विज्ञान के साथ-साथ सीधे आसमान तक भी पहुँचती है। खगोल विज्ञान लोखंडवाला सर के दिल के बहुत करीब का विषय है। वह भारत की सबसे पुरानी और मशहूर खगोलशास्त्र संस्था 'ज्योतिर्विद्या परिसंस्था' के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। उनके इस लंबे तजुर्बे का सबसे बड़ा फायदा इन नन्हे बच्चों को मिलता है।

जैसे-जैसे अंधेरा घिरने लगता है और आसमान में तारे टिमटिमाने लगते हैं, इस पहल का दूसरा दौर शुरू होता है। कई बार सोसायटी की छतों पर एस्ट्रोनॉमी की क्लास लगती है। जब ये बच्चे पहली बार टेलिस्कोप से चांद के गड्ढे या बृहस्पति ग्रह के चांद देखते हैं, तो उनकी आँखों में जो हैरत और जानने की चमक होती है, वह किसी भी किताबी ज्ञान से कहीं बड़ी होती है।

सप्तर्षि कहां हैं, ध्रुवतारा कैसे पहचाना जाए, कृत्तिका नक्षत्र कैसा दिखता है—इन सब की कहानियां सर इतने दिलचस्प अंदाज़ में सुनाते हैं कि आम तौर पर रात में आसमान की तरफ सिर उठाकर न देखने वाले बच्चे अब तारों की जगहें बिल्कुल सही-सही पहचानने लगे हैं।

आसमान से जुड़े इस रिश्ते के बारे में सर कहते हैं, "आसमान की तरफ देखने का मतलब सिर्फ नक्षत्रों के नाम रटना नहीं है। बल्कि यह समझना है कि इस बेइंतहा फैली हुई दुनिया में हमारी जगह क्या है। जब कोई बच्चा टेलिस्कोप से आसमान के करिश्मे देखता है, तो उसके चेहरे की खुशी और उसे होने वाला एहसास बहुत बड़ा होता है।"

तजुर्बे की एक शानदार विरासत

अगर इस बात की गहराई में जाएं कि यह पहल इतनी कामयाब क्यों हो रही है, तो लोखंडवाला सर की ज़बरदस्त शख्सियत उभर कर सामने आती है। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में पढ़ाई की है। आगे 18 सालों तक उन्होंने इंजीनियरिंग के छात्रों को पढ़ाया है। फिलहाल वह कई बड़ी कंपनियों के सीईओ के 'मेंटॉर' के तौर पर काम करते हैं। लेकिन इतना सब होने के बावजूद, सोसायटी के किसी पांचवीं क्लास के बच्चे द्वारा पूछे गए एक मासूम से सवाल का भी वह उतनी ही गंभीरता और प्यार से जवाब देते हैं।

आज के बदलते लाइफस्टाइल पर अपनी राय रखते हुए वह कहते हैं, "हम कहते हैं कि आज की पीढ़ी स्क्रीन में खोती जा रही है, लेकिन क्या हमने उन्हें उसके बराबर का कोई दिलचस्प और खुद को शामिल करने वाला विकल्प दिया है? विज्ञान के ये खेल बच्चों को मोबाइल से दूर ले जाकर सीधे तौर पर कुदरत और विज्ञान से जोड़ने का काम करते हैं।"

इस पहल का बच्चों पर तो पॉज़िटिव असर होता ही है, साथ ही पूरी सोसायटी के माहौल पर भी एक पॉज़िटिव असर दिखने लगता है। शुरुआत में जो माता-पिता सिर्फ यह देखने आते थे कि उनके बच्चे क्या कर रहे हैं, अब वे खुद भी इन प्रयोगों में दिलचस्पी लेने लगे हैं।

जैसे सोसायटी के दूसरे कार्यक्रमों में भीड़ जुटती है, वैसे ही अब इस 'साइंस चबूतरे' पर भी भीड़ जुटने लगी है। बच्चे अब छुट्टियों में इस बात पर चर्चा नहीं करते कि किस मॉल में जाना है, बल्कि इस बात पर चर्चा करते हुए नज़र आते हैं कि सर के साथ कौन सा नया प्रयोग करना है।

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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एक उम्मीद से भरी तस्वीर

आज हम देखते हैं कि शहरों की भागदौड़ में इंसानों के बीच की बातचीत खत्म होती जा रही है। कई लोगों को यह तक नहीं मालूम होता कि उनके पड़ोस में कौन रहता है। ऐसे वक्त में, प्रो. मुजतबा लोखंडवाला जैसे एक बेहद पढ़े-लिखे और नए प्रयोग करने वाले इंसान की तरफ से शुरू की गई यह पहल समाज के लिए एक 'रोल मॉडल' बन जाती है।

जब हमारे आस-पास अंधविश्वास और ढोंगी बाबाओं का ज़ोर बढ़ा हुआ है, ऐसे में बच्चों को एक 'साइंटिफिक नज़रिया' देना बहुत, बहुत ज़रूरी है। इस मायने में भी उनके इस काम की खूब तारीफ की जानी चाहिए।

जब स्कूलों से मिलने वाली औपचारिक तालीम को इस तरह के अनौपचारिक, आज़ाद और प्रयोग वाले माहौल का साथ मिलता है, तभी असल मायनों में रिसर्चर और विचारक पैदा होते हैं। इस सोसायटी के 'विज्ञान के बाग' में आज जानने की इच्छा के जो बीज बोए जा रहे हैं, वे यकीनन कल बड़े होकर एक घने पेड़ में बदल जाएंगे।