क्या डिजिटल युग में भारतीय मुस्लिम सह-अस्तित्व की भावना को फिर जगा सकते हैं?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 20-05-2026
Can Indian Muslims rekindle the spirit of coexistence in the digital age?
Can Indian Muslims rekindle the spirit of coexistence in the digital age?

 

मीर अल्ताफ

कुछ महीने पहले कश्मीर में छात्रों के साथ बातचीत के दौरान एक शिक्षक ने एक सीधा सा सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि आज आपके व्यक्तित्व को सबसे ज्यादा क्या प्रभावित करता है? इसके जो जवाब मिले वे आज की पूरी पीढ़ी की उलझनों को दिखाते हैं। कुछ ने धर्म का नाम लिया तो कुछ ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, राजनीतिक मुद्दों, कोरियन म्यूजिक, ऑनलाइन बहसों या वैश्विक पॉप संस्कृति की बात की। इसी बीच एक छात्र ने बहुत शांति से कहा कि अपने समुदाय से बाहर के लोगों के बारे में उसकी ज़्यादातर समझ अब इंटरनेट पर दिखने वाले छोटे वीडियो और कमेंट सेक्शन से तय होती है।

यह जवाब हमारे दौर की एक बहुत बड़ी सच्चाई को सामने रखता है। आज लोग डिजिटल रूप से एक दूसरे से जितना ज़्यादा जुड़े हैं, भावनात्मक और सामाजिक रूप से उतने ही दूर होते जा रहे हैं। आगामी 21मई को जब दुनिया सांस्कृतिक विविधता, संवाद और विकास के लिए विश्व दिवस मनाएगी, तब इस विषय पर बहुत गहराई से सोचने की ज़रूरत होगी।

आज समाजों के सामने असली चुनौती सिर्फ सांस्कृतिक विविधताओं को बचाकर रखने की नहीं है, बल्कि इंसानों के बीच की उस क्षमता को बचाने की है जिससे वे इन विविधताओं के बावजूद एक दूसरे से सार्थक संवाद कर सकें।

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तकनीक ने हमारे सामाजिक मेलजोल के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस तरह बनाए गए हैं जो लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच सकें। इंटरनेट की दुनिया में समझदारी की तुलना में गुस्सा और आक्रोश बहुत तेज़ी से फैलता है।

गंभीर और सलीके से होने वाली बातचीत अक्सर भावुक और भड़काने वाले नैरेटिव के सामने टिक नहीं पाती। अब विभिन्न समुदाय असल जिंदगी के अनुभवों के बजाय रूढ़ियों, कांट-छांट कर बनाए गए वीडियो और एल्गोरिदम से तय होने वाली धारणाओं के जरिए एक दूसरे को देख रहे हैं।

यह बदलाव पूरी दुनिया के समाजों को बदल रहा है। कई लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक पहचान अब सिर्फ भावनाओं और दिखावे का खेल बनकर रह गई है। सार्वजनिक विमर्श अब विचार से नहीं बल्कि तुरंत दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं से तय होता है क्योंकि डिजिटल दुनिया में गुस्सा ही सबसे ज्यादा दिखता है। इंटरनेट के एल्गोरिदम भी तर्कों के बजाय अड़ियल रुख को बढ़ावा देते हैं। वे जटिलताओं को समझने के बजाय उकसावे को तरजीह देते हैं।

भारत अपनी अनूठी विविधता के कारण इस चुनौती का बहुत गंभीरता से सामना कर रहा है। सदियों से भारत का सामाजिक ताना-बाना विभिन्न समुदायों, भाषाओं, परंपराओं और धर्मों के बीच लगातार होने वाले आपसी मेलजोल से मजबूत हुआ है।

यहाँ विविधता कभी केवल किताबों या सिद्धांतों में नहीं थी। यह हमारे पड़ोस, स्कूलों, बाजारों, शायरी, खान-पान और साझा सांस्कृतिक स्थलों में साफ दिखती थी। भारतीय बहुलतावाद इसलिए बचा रहा क्योंकि रोज़मर्रा की जिंदगी ने लोगों को साथ रहना सिखाया।

लेकिन डिजिटल युग अब समुदायों के आपसी रिश्तों को बदल रहा है। टीवी डिबेट्स में संवाद के बजाय टकराव को बढ़ावा दिया जाता है। सोशल मीडिया का माहौल लोगों को सोचने के बजाय तुरंत फैसला सुनाने के लिए उकसाता है।

आज के युवा जानकारी तो बहुत ज्यादा हासिल कर रहे हैं, लेकिन सामाजिक और वैचारिक सीमाओं से परे जाकर मिलने-जुलने के मौके लगातार कम हो रहे हैं। एक ऐसी पीढ़ी जो ऑनलाइन हर वक्त बात करती है, वह अपनी सोच और कल्पना में सामाजिक रूप से अकेली हो सकती है।

यह हकीकत भारतीय मुसलमानों के लिए भी एक बहुत बड़ा सबक है। एक ऐसे समय में जब डिजिटल संस्कृति अक्सर समुदायों को केवल प्रतिक्रिया देने, बचाव की मुद्रा में आने और खुद को अलग-थलग करने की तरफ धकेलती है, तब भारतीय मुसलमानों के सामने एक बड़ा बौद्धिक रास्ता चुनने की चुनौती है।

भविष्य का निर्माण केवल लगातार शिकायतें करने, ऑनलाइन गुस्सा जाहिर करने या बंद सामाजिक दायरों में सिमट जाने से नहीं हो सकता। न ही कोई पहचान तब तक सार्थक रूप से बची रह सकती है जब तक वह व्यापक नागरिक भागीदारी से न जुड़े।

भारतीय इस्लाम की ऐतिहासिक विरासत हमेशा से समाज से जुड़ने की रही है, न कि खुद को अलग करने की। अलीगढ़ की विद्वत्तापूर्ण परंपराओं से लेकर पूरे उपमहाद्वीप में सूफी संतों के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रभाव तक, भारतीय मुसलमानों ने न केवल धार्मिक जीवन में बल्कि भाषा, संगीत, साहित्य, वास्तुकला, शिक्षा और सार्वजनिक नैतिकता में भी बहुत बड़ा योगदान दिया है।

उर्दू शायरी खुद किसी संकीर्ण अलगाव के बजाय एक साझी तहज़ीब की सबसे मजबूत अभिव्यक्ति बनकर उभरी। यहाँ तक कि भारत की कला और खान-पान की परंपराएं भी किसी बंद बंदिशों के बजाय सदियों के सांस्कृतिक मेलजोल से ही विकसित हुईं।

आज के समय में यह ऐतिहासिक अनुभव बहुत मायने रखता है। भारतीय मुस्लिम आज लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व को नए सिरे से मजबूत करने में एक खास भूमिका निभा सकते हैं। इसका कारण यह है कि उनके जीवन का अनुभव हमेशा से एक साथ कई पहचानों को जीने का रहा है, जिसमें धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पहचान शामिल हैं। कई मायनों में भारत का मुस्लिम सामाजिक अनुभव पहले से ही इस बात को समझता है कि मिलजुल कर रहना कोई कमजोरी नहीं बल्कि एक परिपक्वता है।

हालांकि इस विरासत को बचाए रखने के लिए बौद्धिक आत्मविश्वास की बहुत ज़रूरत है। डिजिटल दुनिया में लगातार व्यस्त रहने वाली पीढ़ी को अपनी पहचान को सिर्फ दूसरों की प्रतिक्रिया तक सीमित करने से बचना होगा। यह आत्मविश्वास केवल ऑनलाइन प्रतीकों को दिखाने से नहीं आएगा।

इसके लिए शिक्षा, संस्थानों का निर्माण, शोध, व्यापार, नागरिक भागीदारी और नैतिक सार्वजनिक नेतृत्व की आवश्यकता होगी। इसलिए अब बातचीत का रुख असुरक्षा की भाषा से हटकर समाज में योगदान देने वाली भाषा की तरफ मुड़ना चाहिए।

यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि डिजिटल बहसें अक्सर समुदायों को मानसिक और भावनात्मक रूप से थका देती हैं। इंटरनेट पर लगातार गुस्से और नफरत को देखने से धीरे-धीरे या तो इंसान में आक्रोश भर जाता है या फिर वह समाज से कट जाता है।

ये दोनों ही स्थितियां समाज में एक स्वस्थ आत्मविश्वास पैदा नहीं कर सकतीं। समुदाय तब मजबूत होते हैं जब वे अच्छे संस्थान बनाते हैं, ज्ञान पैदा करते हैं, सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेते हैं और केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय अपने रचनात्मक कार्यों से देश की चर्चाओं को एक नई दिशा देते हैं।

पूरे भारत में इस शांत बदलाव के कई उदाहरण पहले से ही मौजूद हैं। उच्च शिक्षा में मुस्लिम महिलाओं की बढ़ती संख्या, नए स्टार्टअप शुरू करने वाले युवा उद्यमी, सिविल सर्विसेज और शिक्षा के क्षेत्र में नाम कमाने वाले छात्र, विभिन्न धर्मों के बीच आपसी तालमेल की स्थानीय कोशिशें और सांस्कृतिक सहयोग जैसी खबरें भले ही मुख्यधारा की सुर्खियों में न आएं, लेकिन ये सामाजिक आत्मविश्वास का असली चेहरा हैं।

इसी तरह भारतीय मुसलमानों की एक नई पीढ़ी का आना भी बहुत महत्वपूर्ण है जो तकनीक, मीडिया और बिजनेस के क्षेत्र में अपनी शर्तों पर आगे बढ़ रही है। स्वतंत्र पत्रकारिता और डिजिटल शिक्षा मंचों से लेकर सामाजिक पहलों और रचनात्मक कलाओं तक, बहुत से युवा मुस्लिम अब अलग-थलग रहने के बजाय मुख्यधारा में अपनी भागीदारी तलाश रहे हैं। यह बदलाव अधिक ध्यान देने योग्य है क्योंकि यह एक बेहतर और स्वस्थ सार्वजनिक संस्कृति की उम्मीद जगाता है।

रचनात्मक क्षेत्र में भी मुस्लिम कंटेंट क्रिएटर्स, स्टैंड-अप कॉमेडियन, फिल्म मेकर्स, पॉडकास्टर्स, संगीतकार और लेखक अपनी पहचान को किसी संकीर्ण दायरे में समेटे बिना मुख्यधारा के डिजिटल स्पेस में अपनी जगह बना रहे हैं। ज़ाकिर खान जैसे कलाकारों की लोकप्रियता और ज़ोया अख्तर या रीमा कागती जैसे फिल्म निर्माताओं का काम यह दिखाता है कि एक नई पीढ़ी वैचारिक अलगाव के बजाय हास्य, कहानियों, सिनेमा, संगीत और साझें अनुभवों के जरिए एक बड़े दर्शक वर्ग से जुड़ने का प्रयास कर रही है।

इस पूरे परिदृश्य में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका सबसे अहम हो जाती है। स्कूलों, विश्वविद्यालयों, मदरसों और सामाजिक संगठनों को युवाओं को केवल नौकरी के लिए तैयार नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व के संस्कार भी देने चाहिए। बिना नफरत के असहमत होना, बिना किसी डर के अपनी बात रखना और बिना किसी दुश्मनी के अपनी पहचान को बनाए रखना, ये ऐसे नागरिक गुण हैं जिन्हें समाज को बहुत सचेत होकर अपने बच्चों को सिखाना होगा।

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यही कारण है कि साझी सांस्कृतिक जगहों को बचाना बहुत जरूरी है। चाहे वे साहित्य उत्सव हों, विश्वविद्यालय हों, पड़ोस का मेलजोल हो, खेलकूद हो, स्थानीय सामाजिक पहल हो या फिर सूफी दरगाहें हों जो आज भी सामाजिक दूरियों को भुलाकर लोगों को अपनी ओर खींचती हैं, सह-अस्तित्व हमेशा असल जिंदगी के मेलजोल से ही जिंदा रहता है। लोकतंत्र तब कमजोर होने लगता है जब समुदाय एक दूसरे को इंसान के रूप में देखना बंद कर देते हैं और केवल वैचारिक आंकड़ों या अजनबियों की तरह देखने लगते हैं।

भारत में विविधता का भविष्य केवल संवैधानिक सिद्धांतों या सरकारी संस्थाओं पर निर्भर नहीं करेगा। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि यहाँ के नागरिक खुद को इंटरनेट के एल्गोरिदम से पैदा होने वाली नफरत का कैदी बनने से कितना रोक पाते हैं।

मीडिया संस्थानों को भी हर वक्त गुस्सा भड़काने के बजाय खबरों की गहराई और बारीकियों को जगह देनी होगी। शिक्षण संस्थानों को तार्किक सोच और संवाद को बढ़ावा देना होगा। सार्वजनिक विमर्श में बिना किसी को नीचा दिखाए असहमति के लिए जगह बनानी होगी। सबसे जरूरी बात यह है कि समुदायों को खुद पीछे हटने के बजाय आगे बढ़कर समाज से जुड़ने का आत्मविश्वास फिर से हासिल करना होगा।

भारतीय मुसलमानों के लिए यह समय केवल एक चुनौती नहीं है बल्कि एक बहुत बड़ा अवसर भी है। यह अवसर एक ऐसी लोकतांत्रिक संस्कृति को आकार देने में मदद करने का है जिसकी जड़ें गरिमा, भागीदारी और सह-अस्तित्व पर टिकी हों, न कि केवल संदेह और प्रतिक्रिया पर।

एक ऐसे युग में जहाँ डिजिटल प्लेटफॉर्म गुस्से को बढ़ावा देते हैं, समाजों को ऐसे लोगों और समुदायों की सख्त ज़रूरत है जो संतुलन, संयम और संवाद की रक्षा कर सकें। यह जिम्मेदारी हर एक नागरिक की है। लेकिन शायद सह-अस्तित्व का एक लंबा ऐतिहासिक अनुभव रखने वाले समुदाय इसके मूल्य को तब और भी गहराई से समझते हैं जब यह धीरे-धीरे कम होने लगता है। यही अंततः भारत के बहुलवादी लोकतंत्र के भविष्य के लिए भारतीय मुसलमानों का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण योगदान साबित हो सकता है।

(लेखक कश्मीर में शिक्षण कार्य से जुड़े हैं.)