
हरजिंदर
मध्य यूरोप का छोटा सा देश आस्ट्रिया अपनी शांत फितरत और ठंडे माहौल के लिए जाना जाता है। हालांकि आल्पस पर्वत के पूर्वी मैदान पर बसे इस देश की शांति में बहुत कुछ ऐसा भी खदबदाता रहता है जो अक्सर दुनिया के अखबारोें में खबर नहीं बन पाता।
दुनिया के तमाम देशों की तरह ही आस्ट्रिया भी जमाने की हवाओं से दूर नहीं है। जो सब जगह हो रहा है वह वहां भी हो रहा है। पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से वहां से भी वहां के राजनीतिक विमर्श से इस्लामफोबिया की खबरें आती रहती हैं।

आस्ट्रिया में मुसलमानों संख्या साढ़े सात लाख के आस-पास है। यानी कुल आबादी का 8.3 फीसदी के लगभग। यानी वे वहां ऐसे अल्पसंख्यक हैं जो राजनीतिक फैसलों को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर सकते। लेकिन उन्हें लेकर जो चल रहा है वह चिंता में डालने वाला है।
पिछले दिनों आस्ट्रिया की संसद ने एक कानून पास किया जिसके बाद अब वहां लड़कियां स्कूलों में स्कार्फ नहीं पहन सकेंगी। जाहिर है इसका निशाना मुस्लिम लड़कियां हीं थीं जो स्कार्फ को अपनी धार्मिक परंपरा का हिस्सा मानती हैं।
कानून पास होने के बाद आस्ट्रिया में एक महत्वपूर्ण सर्वे हुआ। इस सर्वे में सिर्फ आस्ट्रिया की मुस्लिम महिलाओं से ही बात की गई। पाया गया कि इनमें से 93 फीसदी महिलाएं इस कानून का विरोध करती हैं। जार्जटाउन यूनिवर्सिटी के ब्रिज इनीश्यिेटिव द्वारा किए गए इस सर्वे में सिर्फ पांच फीसदी महिलाओं ने ही इसका विरोध किया। दो फीसदी महिलाओं ने अपनी राय नहीं बताई।
इस सर्वे ने लोकतंत्र के एक पुराने विमर्श की याद दिला दी। यह विमर्श कहता है कि अगर किसी वर्ग या समुदाय की कोई परंपरा या आदत आपराधिक नतीजों वाली नहीं है तो बदलाव का बेहतर रास्ता यही है बदलाव करते समय उस समुदाय को साथ लेकर चला जाए। आस्ट्रिया में यही नहीं हुआ। जब यह कानून बना तो बहुमत दूसरी तरफ देख रहा था और वह समुदाय दूसरी तरफ।
याद रहे कि ऐसा ही एक कानून बहुत पहले फ्रांस ने बनाया था। वहां भी स्कार्फ और धार्मिक चिन्ह पहनने पर रोक लगाई गई थी। नतीजा यह हुआ था कि बहुत से मुस्लिम परिवारों ने अपनी बच्चियों को बिना स्कार्फ के स्कूल भेजने के बजाए उन्हें स्कूल न भेजने का ही फैसला किया। जिस कानून के बारे में कहा जा रहा था कि यह महिलाओं की तरक्की का रास्ता खोलेगा, उसने महिलाओं को शिक्षा से वंचित करने का काम किया।

वैसे हम यहां जिस कानून की बात कर रहे हैं वैसा ही एक कानून आस्ट्रिया में 2019 में भी बना था। तब अदालत ने इस कानून का रास्ता रोक दिया था। इस बार क्या होगा कहा नहीं जा सकता। लेकिन जिस तरह का इस्लामफोबिया वहां दिख रहा है ऐसे कानून को बहुत दिन तक रोका भी नहीं जा सकता।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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