शम्सुल आलम
कभी जिस बांग्लादेश में साक्षरता दर 20प्रतिशत से भी कम थी, आज वही देश शिक्षा के विस्तार की मिसाल पेश करता है। गांवों से लेकर शहरों तक स्कूल और कॉलेजों की संख्या बढ़ी है। विश्वविद्यालयों के दरवाजे पहले से ज्यादा खुले हैं। लाखों युवा अब उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं। लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे एक बेचैन करने वाला सवाल भी खड़ा है। क्या बांग्लादेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था सचमुच युवाओं को भविष्य के लिए तैयार कर पा रही है।

ढाका के निजी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले हजारों छात्र हर साल डिग्री लेकर निकलते हैं। लेकिन नौकरी के बाजार में पहुंचते ही उन्हें पहली ठोकर लगती है। कंपनियां कहती हैं कि डिग्री है, लेकिन कौशल नहीं। अंग्रेजी कमजोर है। समस्या सुलझाने की क्षमता सीमित है। तकनीकी समझ अधूरी है। यही वह खाई है जिसने अब शिक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
बांग्लादेश में निजी विश्वविद्यालयों का विस्तार 1992के बाद तेजी से हुआ। उस समय सरकारी विश्वविद्यालयों में सीटें कम थीं। लाखों छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का सपना अधूरा रह जाता था। इसी जरूरत ने निजी विश्वविद्यालयों का रास्ता खोला। आज देश में 110से ज्यादा निजी विश्वविद्यालय हैं। इनमें चार लाख से अधिक छात्र पढ़ रहे हैं।
इस बदलाव ने शिक्षा को आम लोगों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई। मध्यम वर्ग के परिवारों को विकल्प मिला। छात्राओं की भागीदारी बढ़ी। डिजिटल शिक्षा का दायरा भी फैला। लेकिन संख्या बढ़ने के साथ गुणवत्ता का संकट भी गहराने लगा।
ढाका के शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि कई विश्वविद्यालय केवल डिग्री बांटने वाले संस्थान बनकर रह गए हैं। कहीं स्थायी परिसर नहीं है। कहीं प्रयोगशाला अधूरी है। कई जगह योग्य शिक्षकों की कमी है। पुस्तकालय नाममात्र के हैं। रिसर्च का माहौल लगभग गायब है। शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान निर्माण होना चाहिए था, लेकिन कई संस्थानों में यह सिर्फ परीक्षा और सर्टिफिकेट तक सीमित होकर रह गया है।
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। कुछ निजी विश्वविद्यालयों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। नॉर्थ साउथ यूनिवर्सिटी, बीआरएसी यूनिवर्सिटी और ईस्ट वेस्ट यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के छात्र विदेशी कंपनियों, टेक सेक्टर और शोध संस्थानों में काम कर रहे हैं। बांग्लादेश के आईटी और फ्रीलांसिंग सेक्टर में भी इन संस्थानों के युवाओं की मजबूत मौजूदगी दिखती है।
लेकिन समस्या यह है कि ऐसे संस्थान अभी अपवाद हैं। बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय आज भी बदलती दुनिया की जरूरतों से पीछे चल रहे हैं।विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्टें भी इसी ओर इशारा करती हैं। रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेश के विश्वविद्यालयों से निकलने वाले बड़ी संख्या में स्नातक रोजगार के लिए तैयार नहीं हैं। नियोक्ताओं का कहना है कि युवाओं में संचार कौशल कमजोर है। विश्लेषण करने की क्षमता सीमित है। टीम वर्क और नेतृत्व की समझ भी कम है।

यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि दुनिया तेजी से बदल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और डिजिटल अर्थव्यवस्था आने वाले समय की दिशा तय कर रहे हैं। नौकरियों का स्वरूप बदल रहा है। अब सिर्फ किताबों का ज्ञान काफी नहीं है। कंपनियां ऐसे लोगों को चाहती हैं जो नई तकनीक समझ सकें, समस्या हल कर सकें और बदलते माहौल में खुद को ढाल सकें।
लेकिन बांग्लादेश के कई विश्वविद्यालय अब भी पुराने पाठ्यक्रमों में उलझे हुए हैं। कई जगह वर्षों से सिलेबस नहीं बदला। छात्र वही विषय पढ़ रहे हैं जिनकी बाजार में मांग लगातार कम हो रही है।सबसे बड़ी कमजोरी रटने वाली शिक्षा पद्धति मानी जा रही है। छात्र परीक्षा पास करने के लिए पढ़ते हैं। अच्छे अंक लाने की होड़ लगी रहती है। लेकिन रचनात्मक सोच, शोध क्षमता और व्यवहारिक समझ पर कम ध्यान दिया जाता है। यही कारण है कि डिग्री मिलने के बाद भी कई युवा आत्मविश्वास की कमी महसूस करते हैं।
सोशल मीडिया पर भी यह नाराजगी साफ दिखाई देती है। फेसबुक और लिंक्डइन पर छात्र अक्सर लिखते हैं कि विश्वविद्यालय उन्हें नौकरी के लिए तैयार नहीं कर पा रहे। कुछ छात्र कहते हैं कि चार साल की पढ़ाई के बाद भी उन्हें अलग से कोचिंग करनी पड़ती है। कई युवा मानसिक दबाव और भविष्य की चिंता से जूझ रहे हैं।
रिसर्च के मामले में भी बांग्लादेश की स्थिति कमजोर मानी जाती है। दुनिया के बड़े विश्वविद्यालय अपनी पहचान शोध और नवाचार से बनाते हैं। लेकिन बांग्लादेश में रिसर्च पर खर्च सीमित है। आधुनिक लैब की कमी है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी बहुत कम है। इसका असर वैश्विक रैंकिंग में साफ दिखता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बांग्लादेश को भविष्य की अर्थव्यवस्था में मजबूत जगह बनानी है तो उसे शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव करने होंगे। सिर्फ विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। शिक्षा को रोजगार, तकनीक और शोध से जोड़ना होगा।

इसके लिए सबसे पहले पाठ्यक्रम में बदलाव जरूरी माना जा रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा साइंस, साइबर सुरक्षा और डिजिटल मार्केटिंग जैसे विषयों को मुख्यधारा में लाना होगा। छात्रों को सिर्फ किताबों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें वास्तविक परियोजनाओं से जोड़ना होगा।
विश्वविद्यालय और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल भी जरूरी है। विकसित देशों में कंपनियां और विश्वविद्यालय मिलकर काम करते हैं। छात्र पढ़ाई के दौरान ही उद्योग का अनुभव हासिल करते हैं। लेकिन बांग्लादेश में इंटर्नशिप अक्सर सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाती है।
शिक्षकों की स्थिति भी सुधार की मांग करती है। कई निजी विश्वविद्यालय कम वेतन पर अंशकालिक शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। रिसर्च के अवसर सीमित हैं। ऐसे में गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है।विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि हर छात्र को पारंपरिक विश्वविद्यालय शिक्षा की ओर धकेलना सही नहीं होगा। तकनीकी शिक्षा, पॉलिटेक्निक संस्थान और कौशल आधारित प्रशिक्षण को ज्यादा महत्व देना होगा। आने वाले समय में वही युवा आगे बढ़ेंगे जिनके पास व्यवहारिक कौशल होगा।

बांग्लादेश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। यही आबादी देश को नई ऊंचाई तक ले जा सकती है। लेकिन इसके लिए शिक्षा को सिर्फ डिग्री तक सीमित रखने की सोच बदलनी होगी।आज का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने छात्र विश्वविद्यालय पहुंच रहे हैं। असली सवाल यह है कि विश्वविद्यालय से निकलने के बाद वे दुनिया का सामना करने के लिए कितने तैयार हैंI
यदि बांग्लादेश अपनी युवा पीढ़ी को ज्ञान, कौशल और नवाचार से जोड़ सका, तो वह दक्षिण एशिया की नई ताकत बन सकता है। लेकिन अगर शिक्षा व्यवस्था पुराने ढर्रे पर ही चलती रही, तो डिग्रियों की भीड़ बढ़ेगी और बेरोजगारी का संकट और गहरा होगा।
( शम्सुल आलमबांग्लादेश में वरिष्ठ नौकरशाह हैं)