हरजिंदर
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु सभी जगह इस बार जब विधानसभा चुनाव हुए तो एक बात हर जगह सुनाई दी- मुस्लिम वोट। किसी भी समुदाय ने किस जगह कैसे वोट दिया इसका पूरा सच न तो हमें कभी पता पड़ता है और न ही इसी जानने का कोई तरीका ही है। यह जरूर है कि राजनीति में इन बातों का इस्तेमाल खूब होता है।भारत की यह बात हम अच्छी तरह समझते हैं लेकिन बाकी दुनिया में क्या हो रहा है?
इन दिनों ंिब्रटेन में मुस्लिम वोटों को लेकर खासी चर्चा है। ऐसा इसलिए कि वहां के मुसलमानोें में वोट देने का अपना तरीका अब बदल दिया है। आमतौर पर धारणा यह रही है कि वहां के मुसलमान अपने वोट लेबर पार्टी को देते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि ब्रिटेन के 90 फीसदी से ज्यादा मुसलमान लेबर पार्टी को ही वोट देते रहे हैं।

इस आंकड़े में कितनी सच्चाई है यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन मुस्लिम मतदाताओं का लेबर पार्टी के प्रति झुकाव कोई छुपी बात नहीं रही है। वैसे एक दूसरी तरह से देखें तो यह बात सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं की ही नहीं है। ज्यादातर भारतीय या अन्य एशियाई देशों के मतदाता लेबर पार्टी को ही वोट देते रहे हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि वे सब उसी वर्ग के हैं जिसकी बात लेबर पार्टी करती रही है।
लेकिन ये बात अब बदल गई है। ब्रिटेन के मुसलमानों में यह अहसास धीरे-धीरे घर करने लगा है कि लेबर पार्टी यह मान कर चलती है कि उनके वोट तो उसे मिल ही जाएंगे। इसके लिए वह कोई कोशिश नहीं करती और न ही इस समुदाय के मसलों को भी बहुत ज्यादा उठाती है।
जिस तरह दुनिया भर में इस्लामफोबिया को फैलाया जा रहा है ब्रिटेन भी उससे अछूता नहीं है। लेबर पार्टी को लगता है कि अगर वह उनके मसलों को लगातार उठाती रही तो कहीं बाकी वोट उससे न छिटक जाएं। नतीजा यह हुआ है कि ब्रिटेन के मुसलमानों और लेबर पार्टी में दूरी लगातार बढ़ रही है।
ताजा जो सर्वे हुए हैं वे बताते हैं कि इस ब्रिटिश समुदाय के लोग अब ग्रीन पार्टी या फिर आजाद उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने लगे हैं। हालांकि ऐसे सर्वे जमीनी हकीकत केा कितना बता पाते हैं यह नहीं कहा जा सकता लेकिन बदलाव हो रहा है यह सभी कह रहे हैं। और तो और खुद इस समुदाय के लोग भी।
उसके बाद जो हो रहा है वह परेशान करने वाला है। इसे लेकर हौव्वा खड़ा किया जा रहा है। उनकी देशभक्ति पर संदेह किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि उनका रवैया लोकतंत्र के लिए खतरा है। कुछ लोग इसे सांप्रदायिकता भी कह रहे हैं।
हमारे देश में यह कहा जाता है कि सारे मुसलमान एक ही तरह से वोट करते हैं। ब्रिटेन में इसके लिए शब्द इस्तेमाल हो रहा है ‘फैमिली वोटिंग‘। यानी पूरे परिवार के लोग एक उम्मीदवार को वोट देते हैं। हालांकि भारत की ही तरह वहां भी इसके कोई प्रमाण नहीं हैं।
हाल ही में ब्रिटिश मतदाताओं के व्यवहार पर गार्जियन अखबार के संवाददाता ताज अली ने एक डाक्यूमेंटरी बनाई है। इसमें वह इस नतीजे पर पहंुचते हैं- ब्रिटेन के मुसलमान अपने वोटों के साथ जो कर रहे हैं, वह न तो सांप्रदायिकता है और न ही कोई खतरा, यह वही है जिसे साधारण भाषा में लोकतंत्र कहा जाता है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)