सब्र करने वालों के लिए अल्लाह का बड़ा इनाम : खुत्बा-ए-हज में इमाम हुज़ैफ़ी का संदेश

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 26-05-2026
Allah's Great Reward for the Patient: Imam Hudhaifi's Message in the Hajj Sermon
Allah's Great Reward for the Patient: Imam Hudhaifi's Message in the Hajj Sermon

 

आवाज द वाॅयस / मक्का

हज 2026 के सबसे अहम दिन यौम-ए-अरफा पर को मस्जिद-ए-नमिरा में दिए गए खुत्बा-ए-हज में मस्जिद-ए-नबवी के इमाम शेख अब्दुर्रहमान अल-हुज़ैफ़ी ने सब्र, तक़वा और तौहीद का पैगाम देते हुए कहा कि “सब्र करने वालों के लिए अल्लाह ने असीम अज्र का वादा किया है।” उन्होंने दुनिया भर से आए लाखों हाजियों को संबोधित करते हुए कहा कि इंसान को सिर्फ अल्लाह की इबादत करनी चाहिए और उसी से डरना चाहिए।

मस्जिद-ए-नमिरा में लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में दिए गए इस ऐतिहासिक खुत्बे के दौरान पूरा मैदान-ए-अरफा “लब्बैक अल्लाहुम्मा लब्बैक” की सदाओं से गूंज उठा। इमाम अल-हुज़ैफ़ी ने कहा कि हज केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि इंसान की आत्मिक शुद्धि, तौबा और अल्लाह से करीब होने का सबसे बड़ा जरिया है।

उन्होंने कहा, “हाजी दूर-दराज़ देशों और कठिन रास्तों से यहां इसलिए पहुंचे हैं ताकि वे अपने रब को राज़ी करें और उसकी रहमत तथा मग़फिरत हासिल कर सकें।” उन्होंने कुरआन की आयतों का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह तआला सब्र करने वालों को बेहिसाब इनाम देता है और जो लोग उसकी राह में सच्चे दिल से आगे बढ़ते हैं, उनके लिए जन्नत की खुशखबरी है।

इमाम ने अपने खुत्बे में तौहीद की अहमियत पर विशेष जोर देते हुए कहा कि आख़िरत की तैयारी का सबसे बड़ा तरीका यही है कि इंसान केवल अल्लाह की इबादत करे और उसके साथ किसी को शरीक न ठहराए। उन्होंने कहा, “इंसान को चाहिए कि वह अपने दिल और कर्म दोनों में अल्लाह की बंदगी को सर्वोच्च स्थान दे।”

यौम-ए-अरफा इस्लामी कैलेंडर के सबसे मुकद्दस दिनों में से एक माना जाता है। इसी दिन पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने 632 ईस्वी में अपने आख़िरी हज, यानी हज्जतुल विदा के दौरान मैदान-ए-अरफा में ऐतिहासिक खुत्बा दिया था। इस खुत्बे में इंसाफ, बराबरी, इंसानी जान-माल की हिफाज़त और सामाजिक न्याय जैसे सिद्धांतों पर जोर दिया गया था। यही वजह है कि हर साल यौम-ए-अरफा पर दुनिया भर के मुसलमान भावनात्मक रूप से इस ऐतिहासिक क्षण से खुद को जोड़ते हैं।

इस बार भी सुबह से ही मैदान-ए-अरफा में लाखों हाजी इबादत, तिलावत, दुआ और इस्तिगफार में मशगूल दिखाई दिए। अनुमान है कि सूर्योदय से लेकर दोपहर तक करीब 16 लाख से अधिक हाजियों की मौजूदगी मैदान-ए-अरफा में दर्ज की गई। हर तरफ लोग हाथ उठाकर अपने गुनाहों की माफी मांगते और दुनिया में अमन व भाईचारे की दुआ करते नजर आए।

जबल-ए-रहमा और उसके आसपास के इलाके में सुबह-सुबह से ही भारी भीड़ जमा हो गई थी। इस पहाड़ी को इस्लामी इतिहास में विशेष महत्व प्राप्त है। माना जाता है कि यहीं पर हज़रत आदम और हज़रत हव्वा की मुलाकात हुई थी। हाजी यहां पहुंचकर विशेष दुआएं करते हैं और अपनी जिंदगी में नई शुरुआत की कामना करते हैं।

हाजियों को वादी-ए-मिना से मैदान-ए-अरफा तक पहुंचाने की प्रक्रिया रात से ही शुरू हो गई थी। मशाएर ट्रेन, विशेष बसों और अन्य यातायात साधनों के जरिए लाखों लोगों को चरणबद्ध तरीके से सुरक्षित अरफा पहुंचाया गया। सऊदी प्रशासन ने इस पूरी व्यवस्था को अत्यंत व्यवस्थित और तकनीकी रूप से मजबूत बनाया ताकि किसी प्रकार की अफरातफरी या भीड़भाड़ की स्थिति पैदा न हो।

मस्जिद-ए-नमिरा, जबल-ए-रहमा और अन्य प्रमुख स्थलों के आने-जाने के रास्तों को अलग-अलग कर दिया गया था ताकि हाजियों की आवाजाही सुचारू बनी रहे। ट्रैफिक पुलिस, सुरक्षा एजेंसियों और स्काउट टीमों की तैनाती हर प्रमुख मार्ग पर की गई थी। जगह-जगह स्वयंसेवक हाजियों को दिशा-निर्देश देते और उनकी मदद करते नजर आए।

इस वर्ष भीषण गर्मी को देखते हुए सऊदी प्रशासन ने आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए कई विशेष इंतजाम किए। जबल-ए-रहमा के आसपास जमीनी एयर कंडीशनिंग यूनिट्स लगाए गए, जिनसे पूरे क्षेत्र का तापमान काफी हद तक नियंत्रित रहा। तेज धूप और गर्म हवाओं के बावजूद इन व्यवस्थाओं ने हाजियों को बड़ी राहत पहुंचाई।

इसके अलावा पानी की निरंतर आपूर्ति, चिकित्सा सुविधाएं, एंबुलेंस सेवाएं और मोबाइल हेल्थ यूनिट्स भी मैदान-ए-अरफा में तैनात रहीं। हिलाल-ए-अहमर (रेड क्रीसेंट) की टीमें किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सक्रिय दिखाई दीं।

सूर्यास्त के बाद हाजी काफिलों की शक्ल में मैदान-ए-मुज़दलिफा की ओर रवाना होंगे, जहां वे मग़रिब और इशा की नमाज़ एक साथ अदा करेंगे। वहीं वे शैतान को कंकरी मारने की रस्म यानी “रमी” के लिए कंकड़ियां भी इकट्ठा करेंगे। इसके बाद फज्र की नमाज़ के साथ वे वापस मिना की ओर लौटेंगे और हज की अगली रस्में पूरी करेंगे।

यौम-ए-अरफा का यह दृश्य केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि दुनिया भर के मुसलमानों की एकता, आध्यात्मिकता और भाईचारे का जीवंत प्रतीक बन गया। लाखों लोगों का एक साथ अल्लाह के सामने झुकना, एक जैसी पोशाक में इबादत करना और इंसानियत के लिए दुआ करना इस्लाम के सार्वभौमिक संदेश को मजबूत करता है।

इस वर्ष का खुत्बा-ए-हज विशेष रूप से सब्र, तक़वा, इंसानी बराबरी और अल्लाह की इबादत पर केंद्रित रहा। इमाम अल-हुज़ैफ़ी के शब्दों ने लाखों हाजियों के दिलों को छू लिया और उन्हें यह संदेश दिया कि कठिनाइयों में सब्र और सच्चे दिल से इबादत ही इंसान को अल्लाह के करीब ले जाती है।