मंसूरूद्दीन फरीदी
हज यात्रा को इस्लाम धर्म के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक माना जाता है। सदियों पुराने इतिहास में मक्का मुकर्रमा हमेशा से दुनिया भर के मुसलमानों की आस्था, इबादत और रूहानी सुकून का केंद्र रहा है। हर मुसलमान के जीवन का सबसे बड़ा सपना मक्का और मदीना की सरजमीं पर कदम रखना और हज के रूहानी सफर का गवाह बनना होता है। लेकिन, इस पवित्र यात्रा का इतिहास केवल इबादत और दुआओं तक ही सीमित नहीं रहा है।
समय-समय पर इस रूहानी सफर को कई बड़े हादसों, प्राकृतिक आपदाओं, महामारियों और राजनीतिक उथल-पुथल का सामना भी करना पड़ा है, जिसके कारण मक्का और मदीना पूरी दुनिया की सुर्खियों में रहे। कभी मीना में भीषण आगजनी और भगदड़ की दर्दनाक घटनाओं ने हाजियों को गहरे गम में डुबो दिया, तो कभी घातक महामारियों ने इस यात्रा को एक कठिन परीक्षा में बदल दिया।
इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में युद्ध, गृहयुद्ध, खूनी क्रांतियां और चरमपंथी हमलों ने भी हज यात्रा को बुरी तरह प्रभावित किया। ऐतिहासिक दस्तावेजों और शोध के अनुसार, इस्लाम के इतिहास में लगभग 40ऐसे मौके आए हैं जब या तो हज यात्रा पूरी तरह से स्थगित (Cancel) करनी पड़ी या फिर हाजियों की संख्या बेहद सीमित कर दी गई।
सऊदी अरब के प्रतिष्ठित 'किंग अब्दुलअजीज फाउंडेशन फॉर रिसर्च एंड आर्काइव्स' (King Abdulaziz Foundation for Research and Archives) ने इन ऐतिहासिक घटनाओं की एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है, जो इस पवित्र यात्रा के उतार-चढ़ाव भरे इतिहास पर रोशनी डालती है। आइए जानते हैं इतिहास के उन प्रमुख वर्षों और घटनाओं के बारे में जब हज यात्रा पूरी तरह बाधित या प्रभावित हुई।

1. सन 865ईस्वी (251हिजरी): अराफात की पहाड़ियों पर कत्लेआम
हज के इतिहास में सबसे पहला बड़ा व्यवधान नौवीं शताब्दी में देखने को मिला। इस्माइल बिन यूसुफ अल-अलवी, जिन्हें 'अल-सफाक' के नाम से भी जाना जाता था, ने अब्बासी खिलाफत के खिलाफ एक हिंसक विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। अल-सफाक की सेना ने हज के दौरान मक्का के करीब स्थित जबल-ए-अराफात (عرفات) पर हमला कर दिया। वहां इबादत में लीन हजारों बेगुनाह हाजियों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। इस खूनी नरसंहार और दहशत के माहौल के कारण उस साल हज यात्रा को आधिकारिक तौर पर रद्द करना पड़ा था।
2. सन 930ईस्वी (317हिजरी): कर्मातियों का हमला और हजर-ए-अस्वद की चोरी
यह हज के पूरे इतिहास का सबसे क्रूर, खूनी और काला अध्याय माना जाता है। 'कर्माती' (Qarmatians) नाम के एक कट्टरपंथी और हिंसक संप्रदाय ने, जिसका मानना था कि हज की रस्म एक अंधविश्वास और बुतपरस्ती (मूर्तिकला) की तरह है, मक्का पर एक सोची-समझी साजिश के तहत हमला किया। इस गिरोह का नेतृत्व अबू ताहिर अल-जन्नाबी कर रहा था।
कर्मातियों ने मक्का की पवित्र धरती पर कदम रखते ही कत्लेआम शुरू कर दिया। ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार, उन्होंने लगभग 30,000हाजियों की बेरहमी से हत्या कर दी। सबसे शर्मनाक बात यह थी कि वे हाजियों को मारते समय कुरान की आयतों का मजाक उड़ाते हुए पढ़ रहे थे।
मृतकों को बिना गुस्ल (स्नान), बिना कफन और बिना जनाजे की नमाज के वहीं मक्का की गलियों में दफन कर दिया गया। कर्मातियों ने हद पार करते हुए लगभग 3,000शवों को पवित्र जमजम के कुएं (Zamzam Well) में फेंक दिया, जिससे उसका पानी पूरी तरह दूषित हो गया और कुएं को भारी नुकसान पहुंचाया।
इसके बाद वे खाना काबा के सबसे पवित्र पत्थर 'हजर-ए-अस्वद' (Black Stone) को उखाड़ कर अपने साथ सऊदी अरब के पूर्वी प्रांत 'हजर' (वर्तमान कतीफ) ले गए। यह पवित्र पत्थर लगभग 22वर्षों तक उनके कब्जे में रहा। इस भीषण और दिल दहला देने वाले हादसे के बाद मक्का में ऐसी दहशत फैली कि अगले 10वर्षों तक हज यात्रा पूरी तरह ठप रही।

3. सन 1099ईस्वी (492हिजरी): आपसी कलह और ईसाइयों का आक्रमण
मुस्लिम इतिहास के मध्यकाल में जब इस्लामी साम्राज्य काफी विशाल हो चुका था, तब आंतरिक राजनीतिक गुटबाजी, आपसी युद्ध और सत्ता के संघर्ष चरम पर थे। इस आंतरिक बदअमनी और असुरक्षित रास्तों के कारण मुस्लिम देशों से हाजियों का मक्का पहुंचना असंभव हो गया। यह वह दौर था जब यरूशलेम (बेतुल मुकद्दस) पर ईसाइयों (क्रूसेडर्स) के कब्जे से ठीक पांच साल पहले तक रास्ते पूरी तरह बंद रहे और लोग हज पर नहीं जा सके।
4. सन 1256ईस्वी (654हिजरी): हिजाज के बाहर के लोगों के लिए पाबंदी
तेरहवीं शताब्दी के मध्य में अरब क्षेत्र (हिजाज) में राजनीतिक अस्थिरता और युद्ध का माहौल इतना गहरा गया था कि लगातार चार वर्षों तक हिजाज (मक्का-मदीना का क्षेत्र) के बाहर के किसी भी देश या प्रांत के नागरिक को हज यात्रा पर आने की अनुमति नहीं मिल सकी। केवल स्थानीय लोग ही अत्यंत सीमित संख्या में हज की रस्म अदायगी कर पाए।
5. सन 1799ईस्वी (1213हिजरी): फ्रांसीसी क्रांति और नेपोलियन का डर
अठारहवीं सदी के अंत में जब यूरोप में फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) की आग भड़की, तो उसका असर मध्य पूर्व के व्यापारिक और धार्मिक रास्तों पर भी पड़ा। नेपोलियन बोनापार्ट के अभियानों और युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय समुद्री और जमीनी रास्ते बेहद असुरक्षित हो गए थे। डाकुओं और सेनाओं के डर से हाजियों के काफिले मक्का के लिए रवाना नहीं हो सके, जिससे कई देशों के लिए हज का सफर अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
6. सन 1831ईस्वी (1246हिजरी): भारत से फैली हैजा महामारी
आधुनिक इतिहास में महामारियों ने हज यात्रा को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। साल 1831में भारत से फैले हैजा (Cholera) नामक घातक संक्रामक रोग ने मक्का में दस्तक दी। उचित चिकित्सा व्यवस्था न होने के कारण इस महामारी ने विकराल रूप ले लिया और वहां मौजूद कुल हाजियों में से लगभग तीन-चौथाई (75%) लोगों की मौत हो गई। इस त्रासदी के बाद हज के नियमों में बड़े बदलाव किए गए।
7. सन 1837से 1892ईस्वी: महामारियों का काला दौर
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लगभग 55वर्षों के दौरान कई ऐसे वर्ष आए जब लगातार अलग-अलग प्रकार की महामारियों और संक्रामक रोगों ने मक्का और मदीना को अपनी चपेट में लिया। इस दौरान हर दिन हजारों हाजियों की मौत होने लगी, जिससे मक्का की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई और कई देशों ने अपने नागरिकों को हज पर भेजने से मना कर दिया।
8. सन 1871ईस्वी: मदीना में हैजा का कहर
साल 1871में हैजा की महामारी मक्का से फैलते हुए पवित्र शहर मदीना मुनव्वरा तक पहुंच गई। हज के मुख्य दिनों में जब हाजी अराफात के मैदान में एकत्र हुए, तो वहां मौतों का आंकड़ा अचानक बढ़ गया। इसके बाद जब काफिले मीना (Mina) पहुंचे, तो यह बीमारी अपने चरम पर पहुंच गई। मीना के मैदान लाशों से पट गए थे, जिसके कारण यात्रा को बीच में ही रोकना पड़ा।
9. सन 2020ईस्वी (1441हिजरी): कोरोना वायरस (कोविड-19) का संकट
इस सदी की सबसे बड़ी वैश्विक महामारी 'कोरोना वायरस' (Covid-19) के कारण साल 2020में सऊदी अरब सरकार को एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला लेना पड़ा। संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए इतिहास में पहली बार अंतरराष्ट्रीय हाजियों के सऊदी अरब आने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया।
उस वर्ष केवल सऊदी अरब में रहने वाले कुछ हजार स्थानीय नागरिकों और प्रवासियों को ही सख्त सोशल डिस्टेंसिंग और सैनिटाइजेशन के नियमों के तहत हज करने की इजाजत दी गई थी।
संकट के बाद हमेशा लौटी रौनक
मक्का और मदीना का इतिहास इस बात का गवाह है कि हज जैसे महान आध्यात्मिक और रूहानी सफर को हर दौर में युद्ध, महामारी, राजनीतिक संकट और अराजकता का सामना करना पड़ा। इंसानी इतिहास के ये काले पन्ने दर्शाते हैं कि मजहबी अकीदत पर जब-जब संकट आया, तब-तब इंसान की आस्था की परीक्षा हुई।
लेकिन, इस्लाम के इतिहास की सबसे खूबसूरत बात यह रही है कि हर कठिन और स्याह दौर के बाद परिस्थितियां सुधरीं, और हज यात्रा एक बार फिर पूरी शान, शौकत और सुरक्षा के साथ शुरू हुई। आज आधुनिक तकनीक और सऊदी सरकार के बेहतरीन प्रबंधन के कारण दुनिया भर से लाखों मुसलमान बिना किसी डर के हर साल इस मुकद्दस सफर को पूरा कर रहे हैं।