जहाँ इंसान आज भी अपने हाथों से लिखता है वक्त : जयपुर का कोटा कैलेंडर

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 20-01-2026
Where people still write time with their own hands: The Kota Calendar of Jaipur.
Where people still write time with their own hands: The Kota Calendar of Jaipur.

 

फरहान इसराइली/जयपुर
 
पुराने जयपुर की तंग गलियों और रामगंज बाजार की हमेशा चहल-पहल से भरी सड़कों के बीच एक ऐसी दुकान आज भी मौजूद है, जहाँ वक्त को मशीनों या डिजिटल स्क्रीन पर नहीं, बल्कि इंसान के हाथों से लिखा जाता है। दुकान नंबर 130 पर स्थित यह जगह ‘कुरान घर’ और ‘नईम बुक डिपो’ के नाम से जानी जाती है और करीब 80-100 वर्षों से अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। यही वह स्थान है जहाँ राजस्थान का प्रसिद्ध कोटा कैलेंडर तैयार होता है, एक ऐसा कैलेंडर जो केवल तारीखें बताने का साधन नहीं, बल्कि समय, आस्था, परंपरा और भरोसे की जीवंत मिसाल है।
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इस दुकान की रूह हैं 75 वर्षीय हाजी अजीमुद्दीन साहब, जो पिछले लगभग 15 वर्षों से इस कैलेंडर को अपने हाथों से तैयार कर रहे हैं। गुलाबी और सफेद रंग में छपने वाला यह सादा-सा दिखने वाला कैलेंडर आज भी लोगों के दिलों में खास जगह बनाए हुए है, क्योंकि इसमें दी गई चांद की तारीखों पर लोगों का अटूट भरोसा है।
 
ddfकोटा कैलेंडर की कहानी दरअसल कोटा शहर से शुरू होती है। इसके जनक काज़ी सलाउद्दीन साहब थे, जिनका उद्देश्य आम लोगों तक इस्लामी चांद की सटीक तारीखें पहुँचाना था।
 
उस दौर में न तो आधुनिक तकनीक उपलब्ध थी और न ही बड़े संसाधन। कैलेंडर पूरी तरह हाथों से लिखा जाता था और सीमित संख्या में, लगभग 100–150 लोगों तक ही पहुँच पाता था।
 
समय बदला, लेकिन आर्थिक परेशानियाँ बढ़ती चली गईं और नियमित छपाई मुश्किल होती गई। करीब 15 साल पहले काज़ी सलाउद्दीन साहब ने इस कैलेंडर की जिम्मेदारी जयपुर के रामगंज बाजार स्थित नईम बुक डिपो को सौंप दी।
 
यहीं हाजी अजीमुद्दीन को कैलेंडर तैयार करने की बारीकियाँ सिखाई गईं और यहीं से कोटा कैलेंडर ने एक नए दौर में कदम रखा।
 
शुरुआत बेहद साधारण थी। एक साल में केवल 10–12 कैलेंडर ही तैयार हो पाते थे, लेकिन धीरे-धीरे इसकी सटीकता और विश्वसनीयता की चर्चा फैलने लगी। लोग इसे
 
अपने धार्मिक और रोजमर्रा के कामों के लिए भरोसेमंद मानने लगे। आर्थिक सहयोग बढ़ा, व्यवस्था सुधरी और छपाई का दायरा भी बढ़ता चला गया।
 
आज स्थिति यह है कि हर साल करीब 30 हजार कोटा कैलेंडर छपते हैं, जिन्हें राजस्थान के लगभग हर जिले में भेजा जाता है। यही नहीं, यह कैलेंडर अब जयपुर और कोटा की सीमाओं से बाहर निकलकर मध्यप्रदेश के रतलाम और इंदौर जैसे शहरों तक पहुँच चुका है।
 
विदेशों में रहने वाले जयपुर और राजस्थान से जुड़े लोग इसे अपने साथ हांगकांग, अमेरिका और अन्य देशों तक ले जाते हैं, जिससे कोटा कैलेंडर धीरे-धीरे एक वैश्विक पहचान भी बना रहा है।
 
कोटा कैलेंडर को खास बनाने वाली सबसे बड़ी बात इसमें दी जाने वाली जानकारी है।
 
इसमें एक साथ तीन तरह की तारीखें दर्ज होती हैं हिंदी पंचांग की तारीख, अंग्रेज़ी ग्रेगोरियन तारीख और इस्लामी चांद की तारीख। इसके अलावा इसमें उर्स, धार्मिक पर्व, महत्वपूर्ण इस्लामी तिथियाँ, चांद की स्थिति कि महीना 29 दिन का होगा या 30 दिन का, और चंद्र गणना को आम लोगों की भाषा में समझाया जाता है।
 
जगह-जगह लिखे गए छोटे-छोटे नसीहत भरे संदेश इस कैलेंडर को एक साधारण तारीख-पत्र से कहीं अधिक अर्थपूर्ण बना देते हैं। यही वजह है कि लोग पूरे साल इसी कैलेंडर पर भरोसा करते हैं और इसे अपने घरों और दुकानों में सहेजकर रखते हैं।
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हाजी अजीमुद्दीन बताते हैं कि कोटा कैलेंडर तैयार करना आसान काम नहीं है। इसकी तैयारी साल शुरू होने से करीब छह महीने पहले शुरू हो जाती है। सबसे पहले पूरा लेआउट कागज पर हाथों से लिखा जाता है। इसके बाद हर तारीख, वार और तिथि को बेहद सावधानी से सेट किया जाता है।
 
चांद की तारीख तय करना सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा होता है, क्योंकि हर महीने यह तय करना पड़ता है कि चांद 29 का होगा या 30 का। इसके लिए गणना के साथ-साथ वर्षों का अनुभव भी काम आता है। पूरा कैलेंडर तैयार होने के बाद इसे कंप्यूटर पर डिज़ाइन के लिए दिया जाता है, जहाँ से प्रूफ निकलता है।
 
इसके बाद हर पेज को कई बार जांचा जाता है, ताकि किसी भी तरह की गलती न रह जाए। हाजी अजीमुद्दीन कहते हैं कि लोग पूरे साल इसी कैलेंडर पर निर्भर रहते हैं, इसलिए एक छोटी-सी गलती भी बड़ी परेशानी बन सकती है।
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उनका मानना है कि चांद की तारीखें सिर्फ गणित से नहीं, बल्कि अनुभव और समझ से तय होती हैं। अल्लाह के करम से अब तक कोई बड़ी गलती नहीं हुई और यही वजह है कि लोगों का भरोसा आज भी कायम है।
 
करीब 72–75 साल की उम्र में भी हाजी अजीमुद्दीन हर दिन दुकान पर बैठते हैं और कैलेंडर से जुड़ा हर काम खुद देखते हैं। उनके लिए यह केवल रोज़ी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी और इबादत जैसा काम है।
नईम बुक डिपो सिर्फ एक दुकान नहीं, बल्कि एक विरासत है।
 
इसकी शुरुआत हाजी अजीमुद्दीन के वालिद हाफिज अलीमुद्दीन साहब ने अपने बड़े बेटे के नाम पर की थी। दुकान पर ‘कुरान घर’ लिखा है, क्योंकि यहाँ कुरान शरीफ और इस्लामी साहित्य से जुड़ा हर जरूरी काम होता है। यहाँ कुरान शरीफ 15 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध हैं। इसके अलावा हाजी अजीमुद्दीन ने खुद अपने हाथों से कई किताबें लिखी हैं। खासतौर पर बच्चों के लिए वे रोज नई किताबें तैयार करते हैं, जिनकी आज भी अच्छी मांग रहती है।
 
पिछले 40-42 वर्षों से हाजी अजीमुद्दीन इस दुकान को संभाल रहे हैं। अब उनके बेटे मौइनुद्दीन और पोते फ़ज़लुद्दीन भी इस काम में उनका हाथ बंटा रहे हैं, ताकि यह परंपरा आगे भी चलती रहे। समय के साथ कोटा कैलेंडर की कीमत जरूर बदली है शुरुआत में यह करीब पाँच रुपये का था, 15 साल पहले 8–10 रुपये में मिलने लगा और आज इसकी कीमत 40 रुपये है,लेकिन लोगों का भरोसा जरा भी कम नहीं हुआ।
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डिजिटल दौर और मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच कोटा कैलेंडर यह साबित करता है कि कुछ परंपराएँ वक्त के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि और मजबूत हो जाती हैं। यह कैलेंडर सिर्फ तारीखों का हिसाब नहीं, बल्कि उस मेहनत, ज्ञान और विश्वास की कहानी है, जो पीढ़ियों से आगे बढ़ती आ रही है और जो यह याद दिलाती है कि जयपुर की उस छोटी-सी दुकान में आज भी इंसान अपने हाथों से वक्त लिखता है।