देस-परदेस : अनायास नहीं है ट्रंप की ग्रीनलैंड में दिलचस्पी

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 13-01-2026
Around the World: Trump's interest in Greenland is not accidental.
Around the World: Trump's interest in Greenland is not accidental.

 

fप्रमोद जोशी

वेनेजुएला में सैनिक हस्तक्षेप के बाद डॉनल्ड ट्रंप ने कहा है कि अपने देश के हित में हमें नेटो सहयोगी डेनमार्क से ग्रीनलैंड को भी हासिल करना होगा. उनके इस सुझाव या धमकी से यूरोपीय नेता नाराज़ और किंचित भयभीत भी हैं.

सवाल है कि वे इसे कैसे हासिल करेंगे? समझाकर, खरीद कर या फौजी कार्रवाई की धमकी देकर? यूरोप के देशों को यूक्रेन की विश्वसनीय सुरक्षा के लिए अमेरिका की ज़रूरत है, पर ग्रीनलैंड की संप्रभुता का उल्लंघन भी उन्हें स्वीकार नहीं.

इस पृष्ठभूमि में, यूरोपीय नेताओं ने मंगलवार 6जनवरी को पेरिस में वरिष्ठ अमेरिकी वार्ताकारों के साथ मुलाकात की, जिसमें यूक्रेन में शांति समझौते से जुड़े मसलों पर विचार किया.

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यूरोपीय चिंताएँ

इससे एक दिन पहले इन्हीं देशों में से कुछ ने एक संयुक्त बयान जारी किया था, जिसमें डेनमार्क के साथ एकजुटता व्यक्त की गई थी. हालाँकि उस बयान में वाशिंगटन की स्पष्ट आलोचना नहीं थी, पर कुछ चिंताएँ प्रकट हो रही थीं.

यूरोप और अमेरिका की एकता के बाहरी दिखावे के बावजूद ऐसा लग रहा है कि साम्राज्यवादी युग में ट्रंप की अचानक वापसी को लेकर चिंताएँ हैं. वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन मानने वाले यूरोप के लोग अमेरिकी राष्ट्रपति की सैन्य कार्रवाई से भयभीत हैं.

अमेरिकी दूतों के साथ यूक्रेन की बैठक के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से ग्रीनलैंड और वेनेज़ुएला के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने जवाब देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि ये मसले आज के मामलों से जुड़े नहीं हैं.

बहरहाल बाद में उन्होंने फ्रांसीसी टेलीविजन पर कहा, ‘मैं ऐसे परिदृश्य की कल्पना नहीं कर सकता जिसमें अमेरिका को डेनिश संप्रभुता का उल्लंघन करना पड़े.

अस्पष्ट बातें

ऐसा लगता है कि यूरोपीय देशों के नेता सार्वजनिक रूप से अपने विचार व्यक्त करने से बच रहे हैं. थिंक टैंक, यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के निदेशक मार्क ल्योनार्ड के अनुसार, यूरोपीय नेताओं की सार्वजनिक और निजी प्रतिक्रियाओं के बीच भारी अंतर है.

उन्होंने कहा, ‘निजी तौर पर, वे इस बात से घबरा रहे हैं कि आगे क्या होगा, खासकर ग्रीनलैंड में, लेकिन वेनेजुएला के बारे में वे सार्वजनिक रूप से ट्रंप की  आलोचना करना नहीं चाहते.

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सीधे रास्ते से आएँ

उधर डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने कहा है कि ग्रीनलैंड और डेनमार्क पर कोई गलत कदम नेटो को ख़त्म कर देगा. इसमें ‘द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से प्रदान की गई सुरक्षा की समाप्ति भी शामिल होगी.

कुछ दिन पहले, फ्रेडरिक्सन ने 1951के समझौते का हवाला देते हुए कहा था,  दोनों देशों के बीच पहले से ही रक्षा समझौता है, जो अमेरिका को ग्रीनलैंड तक व्यापक पहुँच प्रदान करता है. ऐसे में अमेरिकी हमले की बात का मतलब होगा वैश्विक-व्यवस्था का अंत.

ट्रंप अनुरोध क्यों नहीं कर रहे?

डेनमार्क में आमतौर पर माना जा रहा है कि ट्रंप दबाव बढ़ा रहे हैं, लेकिन नेटो सहयोगी के खिलाफ बल का प्रयोग नहीं करेंगे. पिछले कुछ समय से यूरोप के देश अमेरिका की बातों को स्वीकार कर रहे हैं. हाल में टैरिफ के मामले में ऐसा ही हुआ है.

डेनिश रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिकी सेना सही तरीके से अनुरोध करेगी, तो जवाब में ‘अमेरिका को हमेशा हाँ मिलेगी.’ अमेरिका बिना पूछे कार्रवाई करना चाहता है, तब उसे डेनमार्क को बस यह सूचित करना होगा कि वह कोई बेस, हवाई अड्डा या बंदरगाह बना रहा है.

डेनमार्क की संसद के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी जेन्स एडसेर सोरेनसेन ने कहा, ऐसा कोई आधिकारिक अमेरिकी अनुरोध नहीं है. इस बात से डेनमार्क के लोग परेशान हैं. वे पूछ रहे हैं कि आप रक्षा समझौते का उपयोग क्यों नहीं करते?

पहले यह समझने की कोशिश करें कि ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर क्या कहा है. वे अमेरिका के हितों की रक्षा के लिए इसे हासिल करने की वकालत कर रहे हैं. उनका मुख्य आधार राष्ट्रीय सुरक्षा है, खासकर आर्कटिक क्षेत्र में सामरिक महत्व के कारण.

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रूस और चीन का खतरा

ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है, क्योंकि रूस और चीन की नौसेनाएँ वहाँ सक्रिय हैं. उन्होंने तट के पास मँडरा रहे चीनी और रूसी पोतों का हवाला दिया है. इस क्षेत्र में अमेरिकी प्रभुत्व बनाए रखने के लिए ग्रीनलैंड का महत्व है.

सामरिक दृष्टि से यह अमेरिका, कनाडा, यूरोपीय संघ और रूस के बीच है. जो कोई ग्रीनलैंड को नियंत्रित करेगा, वह आर्कटिक क्षेत्र को भी नियंत्रित कर लेगा. रूस तेजी से आर्कटिक सीमाओं का सैन्यीकरण कर रहा है और अपने उत्तरी समुद्र तट पर कई अड्डे बना रहा है.

ट्रंप का कहना है कि अमेरिका को इस विशाल बर्फीले द्वीप पर कब्ज़ा कर लेना चाहिए, एक अधिकारी का कहना है कि राष्ट्रपति इसे खरीदना चाहते हैं और दूसरे का सुझाव है कि अमेरिका आसानी से इसे ले सकता है.

एक समझौते के तहत, अमेरिका की पहले से ही ग्रीनलैंड में फौजी उपस्थिति है उसका ठुले एयर बेस द्वीप के सुदूर कोने में है. अमेरिका और डेनमार्क के बीच 1951का डिफेंस पैक्ट ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना को व्यापक अधिकार देता भी है. इस समझौते को 2004में अपडेट किया गया था और इसमें इस इलाके की अर्ध स्वायत्त सरकार की भूमिका भी शामिल हो गई है.

इस संशोधन के अनुसार, अमेरिका को द्वीप पर अपने सैन्य अभियानों में ‘कोई भी महत्वपूर्ण बदलाव’ करने से पहले डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ परामर्श करना होगा.

हाल में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड को ‘ले सकता है’ या खरीद सकता है, और वाइट हाउस ने कहा कि सैन्य विकल्प हमेशा खुले हैं. अमेरिका की यह दावा 2019से चला आ रहा है, लेकिन ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद हाल में यह बात फिर से कही जा रही है.

ग्रीनलैंड क्या है?

ग्रीनलैंड आर्कटिक महासागर और उत्तरी अटलांटिक महासागर के बीच कनाडा के उत्तर-पूर्व और आइसलैंड के उत्तर-पश्चिम में, मुख्य रूप से आर्कटिक सर्कल के ऊपर फैला हुआ है. इसकी एकमात्र ज़मीनी सीमा कनाडा के साथ है.

बर्फ से ढकी विशाल भूमि, आर्कटिक वातावरण और समृद्ध इनुइट संस्कृति के कारण यह वैश्विक स्तर पर खास महत्व रखता है. इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 21.6लाख वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से करीब 81प्रतिशत हिस्सा बर्फ की मोटी चादर से ढका हुआ है.

यहाँ तकरीबन 57हजार की छोटी सी आबादी है. हालाँकि यह डेनमार्क के अधिकार क्षेत्र में है, पर यहाँ की व्यवस्था स्वायत्त है. यहाँ के लोग इसे स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता चाहते हैं.

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डेनमार्क का अधिकार

यह अमेरिका का हिस्सा कभी नहीं रहा. भौगोलिक दृष्टि से उत्तरी अमेरिका महाद्वीप का यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से यह डेनमार्क साम्राज्य का स्वायत्त क्षेत्र है. वहाँ के लोग और डेनमार्क सरकार इसे बेचने या सौंपने के खिलाफ हैं.

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डे स्थापित किए थे और युद्ध के बाद इसे खरीदने की पेशकश भी की थी, लेकिन डेनमार्क ने इनकार कर दिया.

ग्रीनलैंड के डेनिश इतिहास की जड़ें 10वीं शताब्दी में हैं, जब एरिक द रेड ने नॉर्स बस्तियां स्थापित कीं, जो नॉर्वे के अधीन थीं. नॉर्स लोग स्कैंडिनेविया (आधुनिक डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन) के मूल निवासी थे जो वाइकिंग युग (8वीं-11वीं सदी) के दौरान अपने समुद्री अभियानों, व्यापार और बस्तियों के लिए जाने जाते थे.

ईसाइयों का आगमन

वे ओल्ड नॉर्स भाषा बोलते थे और ओडिन व थोर जैसे देवताओं की मूर्तिपूजक पौराणिक कथाओं का पालन करते थे, और बाद में ईसाई बन गए. ये लोग ही आधुनिक स्कैंडिनेवियाई लोगों के पूर्वज हैं.

ये बस्तियाँ 15वीं शताब्दी की शुरुआत तक गायब हो गईं, संभवतः जलवायु परिवर्तन और इनुइट लोगों से संघर्ष के कारण. इनुइट आर्कटिक क्षेत्र के मूल निवासी हैं.

1721में, डेनमार्क-नॉर्वे ने हंस एगेडे नामक एक नॉर्वेजियन पादरी के नेतृत्व में ग्रीनलैंड में एक मिशनरी अभियान भेजा, जिसका उद्देश्य नॉर्स वंशजों के बीच ईसाई धर्म को पुनर्स्थापित करना था. नॉर्स वंशज न मिलने पर, मिशनरियों ने इनुइट निवासियों को बपतिस्मा किया और तट पर व्यापारिक कॉलोनियां स्थापित कीं.

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द्वितीय विश्वयुद्ध

1940में नाजी जर्मनी के डेनमार्क पर आक्रमण के बाद, ग्रीनलैंड के डेनमार्क से संबंध कमजोर हो गए, और अमेरिका के साथ अनौपचारिक संबंध बने, पर यह कभी अमेरिकी क्षेत्र नहीं बना. युद्ध के बाद, डेनमार्क को इसका फिर से नियंत्रण प्राप्त हो गया.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, अमेरिका ने कुछ ठिकानों और प्रारंभिक चेतावनी रेडार साइटों की एक शृंखला को जारी रखा. जैसे ही शीत युद्ध ख़त्म हुआ, उसने एक को छोड़कर सभी को बंद कर दिया.

ग्रीनलैंडर्स के पास जनमत संग्रह कराने का अधिकार है और डेनिश अधिकारियों ने कहा है कि यह द्वीप के निवासियों पर निर्भर है कि वे अपना भविष्य तय करें. पिछले साल एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 85प्रतिशत निवासियों ने अमेरिकी अधिग्रहण का विरोध किया था.

प्राकृतिक संपदा!

ग्रीनलैंड की सामरिक स्थिति ही ट्रंप की दिलचस्पी का एकमात्र कारण नहीं है. इस विशाल द्वीप का एक और आकर्षण है: महत्वपूर्ण खनिज. बर्फ के नीचे तमाम खनिज छिपे हैं.

यह इलाका दुनिया के किसी भी दूसरे भौगोलिक क्षेत्र की तुलना में तेल, हाइड्रोकार्बन संसाधनों, रेअर अर्थ, रेअर मैग्नेट, खनिज और आधार धातुओं से समृद्ध है. उस लिहाज से यहाँ खनन नहीं हुआ है.

एक अनुमान है कि यहाँ करीब चार ट्रिलियन डॉलर के तेल और दुर्लभ खनिज भंडार हैं. दुनिया का लगभग 13फीसदी तेल और 30फीसदी गैस आर्कटिक में है, जिसका दोहन नहीं हुआ है.

आर्कटिक के पिघलने से ग्रीनलैंड के आसपास के समुद्र में भी बदलाव आ रहा है. यहाँ नए समुद्री मार्ग खोलने के मौके तैयार होंगे. हाल के वर्षों में आर्कटिक से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में 30प्रतिशत की वृद्धि हुई है। स्वेज के रास्ते की तुलना में, आर्कटिक के उत्तरी मार्ग से यात्रा सस्ती पड़ेगी.

अब ट्रंप का ‘मुनरो सिद्धांत’ ग्रीनलैंड को अमेरिकी महाद्वीप का हिस्सा मानता है और वह उसे यूरोप से अलग करने का इच्छुक है. ग्रीनलैंड की पूर्ण स्वतंत्रता और डेनमार्क से उसकी अलहदगी भी ट्रंप का एजेंडा है.

सीआईए वहाँ के स्वतंत्रता आंदोलन को हवा दे रही है. ग्रीनलैंड में जासूसी और गुप्त प्रभाव अभियान चलाने की रिपोर्टों पर डेनिश सरकार पिछले साल अमेरिकी राजनयिकों को तीन बार तलब कर चुकी है. यानी कि बात गंभीर है.

( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)


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