तेहरान का अंधेरा: तानाशाही के दमन और विदेशी साम्राज्यवाद के बीच पिसता ईरान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 18-01-2026
Tehran's Darkness: Iran caught between the repression of dictatorship and foreign imperialism.
Tehran's Darkness: Iran caught between the repression of dictatorship and foreign imperialism.

 

अब्दुल्लाह मंसूर

तेहरान की सड़कों पर आज जो सन्नाटा पसरा है, वह शांति का नहीं, बल्कि शमशान का सन्नाटा है। पिछले 48घंटों से पूरा ईरान 'डिजिटल अंधेरे' में डूबा हुआ है क्योंकि सरकार ने इंटरनेट का स्विच इसलिए ऑफ कर दिया है ताकि दुनिया को यह न दिखे कि अंधेरे की आड़ में अपनी ही जनता पर क्या कहर बरपाया जा रहा है। एक आम ईरानी नागरिक, जो अपनी रोजी-रोटी के लिए एक ईमेल तक चेक करने को मोहताज हो गया है। जनवरी 2026 में ईरान जिस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, वह पिछले 50वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती है।

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500से अधिक लाशें, 10,000 से ज्यादा गिरफ्तारियां और अस्पतालों के फर्श पर पड़े शव यह गवाही दे रहे हैं कि यह अब केवल विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक गृहयुद्ध की आहट है। हमें इस संकट की परतों को बहुत बारीकी से देखने की जरूरत है। ईरान आज दो पाटों के बीच पिस रहा है।

एक तरफ उसकी अपनी सरकार है, जिसने वैधता खो दी है और जिसका चरित्र दमनकारी हो चुका है, तो दूसरी तरफ वे विदेशी ताकतें अमेरिका और इजरायल हैं, जो 'लोकतंत्र' के नाम पर अपने भू-राजनीतिक हितों की रोटियां सेकने के लिए तैयार खड़ी हैं।

ईरान की वर्तमान थियोक्रेटिक सरकार किसी भी तरह से जनता की सच्ची प्रतिनिधि नहीं मानी जा सकती, लेकिन विडंबना यह है कि अमेरिका और इजरायल के हमले का डर ही वह एकमात्र गोंद है जिसने इस सरकार को अभी तक जोड़े रखा है। बहुत से ईरानी नागरिक, जो मुल्ला सरकार की नीतियों से नफरत करते हैं, वे भी इस समय अनमने ढंग से सरकार के साथ इसलिए खड़े हैं क्योंकि वे नहीं चाहते कि उनका देश इराक, लीबिया या सीरिया की तरह बर्बाद हो जाए।

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भूख का विद्रोह और 'अधिकतम दबाव' की क्रूर राजनीति

हमें यह समझना होगा कि 2026का यह विद्रोह 2022के विद्रोह से बुनियादी रूप से अलग है। 2022में जब महसा अमीनी की मौत के बाद प्रदर्शन हुए थे, तो मुद्दा 'हिजाब' और सांस्कृतिक आजादी था, जिसमें मुख्य रूप से अभिजात वर्ग और बुद्धिजीवी शामिल थे। लेकिन आज जो लोग सड़कों पर हैं, यह उनका 'पेट की भूख' का विद्रोह है और यह पूरी तरह से एक आर्थिक बगावत है।

पिछले 6महीनों में ईरानी मुद्रा यानी रियाल डॉलर के मुकाबले 60%गिर चुकी है और खाने-पीने की चीजें 70%महंगी हो गई हैं। तेल और गैस के अकूत भंडार पर बैठा एक देश आज दाने-दाने को मोहताज कैसे हो गया, इसका जवाब तेहरान के कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार में तो है ही, लेकिन उससे कहीं ज्यादा वाशिंगटन की "अधिकतम दबाव" की नीति में छिपा है। अमेरिका ने ईरान पर जो प्रतिबंध लगाए हैं, वे किसी 'आर्थिक नरसंहार' से कम नहीं हैं।

अमेरिका ने ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले तेल निर्यात को शून्य करने की कोशिश की है, जिससे आम जनता की आय के स्रोत सूख गए हैं। इसके अलावा, अमेरिका ने ईरान को वैश्विक बैंकिंग सिस्टम से बाहर कर दिया है, जिसका मतलब है कि अगर ईरानी व्यापारी कुछ बेचना भी चाहें, तो वे पैसा देश में नहीं ला सकते। इन बैंकिंग प्रतिबंधों के कारण ईरान जीवन रक्षक दवाएं और अनाज तक आयात नहीं कर पा रहा है।

इन्हीं प्रतिबंधों का यह परिणाम है कि तेहरान के बाजार के व्यापारी, जो कभी 1979की क्रांति की रीढ़ थे, का धंधा पूरी तरह चौपट हो गया है। आज जब डॉलर के मुकाबले रियाल रद्दी का कागज बन गया है और मध्यम वर्ग गरीबी रेखा के नीचे चला गया है, तो यह अमेरिकी रणनीति की 'क्रूर सफलता' है।

राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन द्वारा $7 की मदद को जनता ने भीख समझकर ठुकरा दिया है, क्योंकि जब किसी राष्ट्र की आर्थिक हत्या की जा रही हो, तो ऐसे मरहम काम नहीं आते। ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शनों को एक पुरानी अमेरिकी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है जिसमें पहले कड़े प्रतिबंध लगाकर जनता को भूखा मारा जाता है, फिर सरकार के खिलाफ भड़काया जाता है और अंत में अराजकता फैलाकर सत्ता परिवर्तन कराया जाता है।

1953 में अमेरिका ने ईरान की चुनी हुई मोसद्देक सरकार को गिराकर तानाशाह शाह को गद्दी पर बैठाया था और 1980के दशक में उन्होंने सद्दाम हुसैन को ईरान के खिलाफ हथियार दिए थे। आज वे एक तरफ ईरान में मानवाधिकारों की बात करते हैं, लेकिन गाज़ा में हो रही हिंसा का समर्थन करते हैं। यह दोहरा रवैया साफ करता है कि अमेरिका या इजरायल ईरानी जनता को लोकतंत्र देने नहीं आ रहे, बल्कि वे ईरान को टुकड़ों में बांटना चाहते हैं, इसलिए जनता को ऐसी ताकतों का मोहरा बनने से बचना चाहिए।

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साम्राज्यवाद का पुराना खेल

यह गुस्सा पूरी तरह से आंतरिक नहीं है, बल्कि हमें यह समझने की जरूरत है कि अमेरिका और इजरायल इस आग को हवा क्यों दे रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने खुलेआम ईरान को "बचाने" और सैन्य हस्तक्षेप की धमकी दी है, जिसे कूटनीति की भाषा में 'गनबोट डिप्लोमेसी' कहा जाता है।

ट्रम्प वही खेल ईरान में खेलना चाहते हैं जो अमेरिका ने लैटिन अमेरिका में दशकों तक खेला है। इतिहास गवाह है कि दक्षिण अमेरिका में, चाहे वह चिली में पिनोशे को लाना हो या हाल ही में वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन की कोशिश हो, अमेरिका ने हमेशा 'लोकतंत्र' का बहाना बनाकर वहां की संप्रभुता को कुचला है ताकि उन देशों के संसाधनों पर कब्जा किया जा सके।

इजरायली पीएम नेतन्याहू ने ट्रंप को अभी हमला रोकने की सलाह दी है ताकि 'बेस्ट केस सिनेरियो' तैयार हो सके और मोसाद ईरान के अंदर अपने 'एजेंट्स' और नेटवर्क को पूरी तरह सेट करने का इंतज़ार कर रहा है। वे चाहते हैं कि जब हवाई हमला हो, तो ज़मीन पर भी उनके लोग मौजूद हों जो तख्तापलट को अंजाम दे सकें। पश्चिमी ताकतों का असली मकसद ईरान में सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उसे सीरिया की तरह टुकड़ों में बांटना है। उनकी योजना यह है कि उत्तर में कुर्द और अज़ेरी, दक्षिण में बलोच और पूर्व में अन्य गुटों का कब्ज़ा हो, जिससे केंद्र सरकार इतनी कमज़ोर हो जाए कि वह पूरे देश को चला न सके।

आज जब पश्चिमी नेता ईरानी जनता के लिए 'मगरमच्छ के आंसू' बहा रहे हैं, तो हमें उनकी असलियत याद रखनी चाहिए क्योंकि यही नेता गाजा में हुए जनसंहार पर तालियां बजा रहे थे। क्या ईरानी खून गाजा के खून से अलग है? नहीं, फर्क सिर्फ इतना है कि गाजा में इजरायल को जमीन चाहिए थी और ईरान में अमेरिका को एक कठपुतली सरकार चाहिए।

अमेरिका और इजरायल अब रजा पहलवी को एक 'वैकल्पिक नेता' के रूप में पेश कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी अगर पुराने शाही झंडे लहरा रहे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि वे राजशाही से प्यार करते हैं, बल्कि इसका मतलब है कि वे वर्तमान दमनकारी शासन से इतनी नफरत करते हैं कि उन्हें कोई भी दूसरा विकल्प बेहतर लग रहा है।  ट्रम्प और नेतन्याहू की फोन पर बातचीत और रजा पहलवी का यह कहना कि वे "शहरों पर कब्जा" करने आ रहे हैं, यह सब एक सोची-समझी 'प्रति-क्रांति' का हिस्सा है।

जमीन पर हालात बदतर हैं और सरकार प्रदर्शनकारियों को "सशस्त्र आतंकवादी" कह रही है। मस्जिदों और इमामबाड़ों को जलाया जा रहा है, जबकि एक सच्चा मुसलमान अपनी इबादतगाह को आग नहीं लगा सकता। यह या तो विदेशी एजेंटों का काम है जो अराजकता फैलाना चाहते हैं, या फिर यह जनता का वह अंधा गुस्सा है जो अब धार्मिक प्रतिष्ठानों को ही अपनी भुखमरी का जिम्मेदार मान रहा है।

सबसे दुखद पहलू यह है कि इस संघर्ष में 109 सुरक्षाकर्मी भी मारे गए हैं। एक तरफ भूखी जनता है, दूसरी तरफ गरीब सिपाही है और दोनों एक-दूसरे को मार रहे हैं। 2025के युद्ध और इजरायली घुसपैठ ने ईरान को पहले ही कमजोर कर दिया है और अब यह गृहयुद्ध देश के टुकड़े कर सकता है।

ईरान आज दो पाटों के बीच फंसा है; एक तरफ उसका अपना घरेलू शासन है जो भ्रष्ट है और जिसने अपनी वैधता खो दी है, तो दूसरी तरफ पश्चिमी साम्राज्यवाद है जो गिद्ध की तरह नोचने को तैयार है। ईरानी अवाम बदलाव चाहती है, लेकिन वह बदलाव विदेशी टैंकों पर बैठकर नहीं आ सकता।

अगर अमेरिका या इजरायल के हस्तक्षेप से सत्ता बदली, तो ईरान दूसरा लीबिया या सीरिया बन जाएगा। 2026का यह साल तय करेगा कि क्या ईरान अपनी संप्रभुता बचा पाएगा या फिर वह 'गनबोट डिप्लोमेसी' का अगला शिकार बनकर इतिहास के पन्नों में एक और बर्बाद सभ्यता के रूप में दर्ज हो जाएगा। सच्चाई यह है कि अगर ईरान तीन चीजें मान ले इसराइल को चुनौती देना बंद करे, अपना परमाणु कार्यक्रम रोके और अपने तेल-गैस पर अमेरिकी नियंत्रण स्वीकार कर ले तो सारे मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप रातों-रात गायब हो जाएंगे।

( अब्दुल्लाह मंसूर, लेखक और पसमांदा बुद्धिजीवी हैं। वहपसमांदा दृष्टिकोण' से लिखते हैं।)