अजमल शाह
लश्कर-ए-तैयबा के उप-प्रमुख सैफुल्लाह कसूरी के हालिया बयान ने पाकिस्तानी सेना के उस नकाब को उतार दिया है, जिसमें वह खुद को एक पेशेवर फौज बताती थी। कसूरी ने एक वीडियो में दावा किया है कि पाकिस्तानी सेना उसे अपने मरे हुए सैनिकों के जनाजे (अंतिम संस्कार) की नमाज़ पढ़ाने के लिए बुलाती है। यह सिर्फ एक आतंकी का दावा नहीं है, बल्कि इस बात का सबूत है कि पाकिस्तानी सेना के अंदर कितनी कट्टरपंथ फैल चुका है। इससे भारत की वह बात सच साबित होती है कि वर्दी वाले पाकिस्तानी सैनिकों और आतंकियों में कोई फर्क नहीं है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो भारत को दुश्मन मानते हैं।

इस बदलाव को समझने के लिए हमें इतिहास देखना होगा। पाकिस्तानी सेना दशकों पहले ही एक सामान्य सेना रहना छोड़ चुकी थी, खासकर जनरल जिया-उल-हक के समय में। उन्होंने सेना का नारा बदलकर "ईमान, तकवा और जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह" (अल्लाह की राह में जिहाद) कर दिया था।
यही कारण है कि पाकिस्तानी सेना हमेशा उन आतंकियों को पालती है जिन्होंने मासूम भारतीयों का खून बहाया है। अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले और भारत के 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भी यह देखा गया था। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना की एम्बुलेंस और जवान मारे गए आतंकियों के शवों को ले जाते देखे गए थे। जब किसी देश की सेना आतंकियों को मदद और सम्मान देती है, तो वह एक पेशेवर सेना नहीं बल्कि हथियारों से लैस एक गुंडा गिरोह बन जाती है। कसूरी का सैनिकों की नमाज़ पढ़ाना यह दिखाता है कि आम पाकिस्तानी सैनिक आतंकियों को अपना गुरु मानते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि सेना में केवल कुछ लोग ही खराब हैं, लेकिन यह सच नहीं है। पूरी संस्था ही ऐसी हो चुकी है। हमने देखा है कि सेना के बड़े अधिकारी ही अपनी सरकार को गिराने और कट्टरपंथी शासन लाने की साजिशों में पकड़े गए हैं। पाकिस्तान के अपने नौसेना और वायुसेना ठिकानों पर जो हमले हुए, वे भी सेना के अंदर मौजूद मददगारों के बिना मुमकिन नहीं थे। पाकिस्तानी सेना ने जिस कट्टरपंथ के सांप को भारत को डसने के लिए पाला था, अब वही सांप उन्हें खुद डस रहा है।
भारत के लिए अब समय आ गया है कि वह अपना नजरिया बदले। दुनिया कहती है कि पाकिस्तान से बातचीत करो, लेकिन वहां ऐसी कोई ताकत नहीं है जिससे शांति की बात की जा सके। रावलपिंडी (सेना मुख्यालय) में बैठे लोग कभी शांति नहीं चाहेंगे, क्योंकि अगर शांति हो गई तो पाकिस्तान की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर सेना का कब्जा खत्म हो जाएगा। वे अपना फायदा बनाए रखने के लिए तनाव को बढ़ाए रखना चाहते हैं।

अंत में, लश्कर के नेता के खुलासे ने पाकिस्तानी सेना का असली चरित्र सामने ला दिया है। वे भले ही आधुनिक सेना की वर्दी पहनते हों, लेकिन उनकी सोच मध्यकालीन कट्टरपंथियों जैसी है। भारत को अब हमेशा चौकन्ना रहना होगा और अपनी सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाने होंगे। पाकिस्तानी सेना सिर्फ एक दुश्मन फौज नहीं है, बल्कि एक कट्टरपंथी आंदोलन का हिस्सा है। जब तक दुनिया इस बात को नहीं समझती, तब तक हिंसा का खतरा बना रहेगा।
(लेखक एक वकील हैं, जो जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख उच्च न्यायालय, श्रीनगर में प्रैक्टिस करते हैं।)