हरजिंदर
पिछले कुछ समय से एक शब्द अक्सर ही सुनाई देता रहा है- मुस्लिम आउटरीच। यानी मुसलमानों तक पहंुच बनाना। दूसरे शब्दों में कहें तो मुसलमानों के प्रति हमदर्दी दिखाना और उन्हें अपने समर्थन में लाना।यह काम राजनीतिक मकसद से किया जाता है। लोग इसका मतलब भी समझते हैं और इसके पीछे की नीयत भी इसलिए एक हद के बाद ऐसी कोशिशें सिरे चढ़ती नहीं दिखाई देतीं।
भारत से बाहर अगर अमेरिका मेें चले तो पिछले दिनों ऐसा ही एक शब्द टैक्सस में सुनाई दिया- आउटरीच। यहां जो हो रहा है वह मुस्लिम आउटरीच नहीं है बल्कि मामला उसका उलटा है।
तमाम पश्चिमी देशों की तरह ही अमेरिका भी जिस एक समस्या से बहुत ज्यादा जूझ रहा है वह है - इस्लामफोबिया। सोशल मीडिया ने इसे बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। जिसकी वजह से समुदायों में आपसी अविश्वास और संदेह तो बन ही रहा है, कई ऐसी अप्रिय घटनाएं भी हो चुकी हैं जिनमें लोगो की जान भी गई है।

द इस्लामिक एसोसिएशन आॅफ नार्द टैक्सस ने इसके लिए एक आउटरीच कार्यक्रम तैयार किया। जिसके तहत वहां कुछ खास दिन मस्जिदों को सबके लिए खोल दिया जाता है। गैर-मुस्लिम लोग जब वहां आते हैं तो उन्हें मस्जिद के बारे में बताया जाता है। वहां घुमाया जाता है। उन्हें यह समझ देनें की कोशिश की जाती है कि समुदाय के लोग वहां किस तरह इबाबत करते हैं। लोगों की सवालों के जवाब भी दिए जाते हैं और उनके संदेहों को खत्म करने की कोशिश भी होती है।
यहां अभी तक ज्यादातर आस-पास रहने वाले स्थानीय लोग ही आ रहे हैं। वैसे मकसद भी उन्हीं लोगों को यहां लाने का था। उम्मीद है कि जब ये लोग वहां सब देखें-समझेंगे और लोगों से मिलेंगे तो उनके बहुत से पूर्वाग्रह भी खत्म होंगे।
Muslim lady threatens school board in Texas. If there was ever a time to pull your kids from Texas public schools it’s now guys. Don’t lose your children. pic.twitter.com/hD2B0M85P0
— Kelly for Texas (@KellyIsRightTX) July 25, 2026
यह कार्यक्रम इतना कामयाब रहा है कि अब वहां इस आउटरीच के लिए एक संगठन ही बना दिया गया है, जिसका नाम है- गेनपीस। मकसद इसके नाम से ही स्पष्ट है।वैसे टैक्सस के लिए यह नई सोच हो सकती है भारत के लिए इसमें ज्यादा कुछ नया नहीं है।
हमारे यहां यह बात बहुत बार और कई लोगों द्वारा कही गई है कि आपसी मेल-मिलाप ही सांप्रदायिक सोच को खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका है। यह भी पाया गया है कि जहां ऐसा मेल-मिलाप कम होता है वहां तनाव के खतरे ज्यादा होते हैं। इसी मकसद से होली मिलन और ईद मिलन जैसे कार्यक्रमों की परंपरा आज भी कईं जगह निभाई जाती है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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