
हरजिंदर
चैथाई सदी पहले 11 सितंबर को अमेरिका में जो आतंकवादी वारदात हुई थीं उसका असर किसी न किसी तरह से अभी तक लोगों के दिल और दिमाग पर है।वारदात के 25 साल पूरे होने पर अमेरिका में तरह-तरह के लोगों ने अपने अनुभवों का पिटारा इन दिन मीडिया के सामने खोला है। इसे लेकर अभी तक हम जितना समझ सकते थे ये अनुभव हमें उससे कहीं ज्यादा बताते हैं।
हम यह समझते रहे हैं कि इस दौरान वह नफरत बढ़ी जिसे हम इस्लामफोबिया कहते हैं- यानी इस्लाम को खौफ जगाकर मुसलमानों के खिलाफ नफरत को बढ़ाना। हमें यह पता है कि वारदात के तुरंत बाद से ही सभी अल्पसंख्यकों और खासकर मुसलमानों को शक की नजर से देखा जाने लगा।
मुसलमानों को हर जगह घूरती हुई निगाहों का सामना करना पड़ा। पड़ोसी जो तब तक घुलमिलकर रहते थे वे दूरी बनाने लगे। सार्वजनिक जगहों पर उन पर फब्तियां कसी जाने लगीं। उन पर हमले भी हुए।

एक तरफ अमेरिका वाॅर आॅन टेरर यानी आतंकवाद के खिलाफ जंग की बात कर रहा था दूसरी तरफ देश की एक आबादी एक नई जद्दोजहद में फंस गई थी। वाॅर आॅन टेरर का जो हुआ वह हम जानते हैं, लेकिन अमेरिका के मुसलमानों पर जो गुजरी वह किसी न किसी तरह से अभी तक जारी है।
एक पूरी पीढ़ी इसी खौफ में बड़ी हो गई। और उसने इस शक-शुबहे और घूरती निगाहों के माहौल में जीना सीख लिया। यही वह बात है जो 25 साल पूरे होने पर हमें लोगों के अनुभवों से पता पड़ी है।
अमेरिकी पत्रकार रोज़ीना अली बताती हैं कि इस्लामफोबिया हर रोज उस तरह नहीं दिखाई देता जैसा कि वह चुनाव के दिनों में दिखता है। तब यह अचानक ही बढ़ जाता है। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे चुनावों के दौरान हमारे यहां सांप्रदायिकता और जातिवाद सतह पर आने लगते हैं।
अमेरिका में कुछ दलों को लगता है कि इस्लामफोबिया जगाकर ज्यादा वोट बटोरे जा सकते हैं। लेकिन वहां की राजनीति में ऐसी ताकतें सिरे से ही नहीं हैं कि जिन्हें यह लगता हो कि इस्लामफोबिया का विरोध करके या उसे गलत बता कर वोट हासिल किए जा सकते हैं।
यही वजह है कि राजनीति जिस नफरत को बढ़ा रही है समाज में भी वह धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। नफरत ही नहीं मुसलमानों के खिलाफ होने वाली वारदात भी बढ़ रही हैं।
वारदात के बाद अचानक बढ़ी नफरत का एक और पक्ष भी लोगों के अनुभवों से सामने आया है। यह पक्ष अमेरिका में रह रहे मुसलमानों से जुड़ा नहीं है।
Islamophobia in America is reaching alarming levels.
— Zehra calligraphy (@zehraavadh) May 19, 2026
A mosque shooting in San Diego resulted in 3 people dead, while 2 suspects were neutralized. The attack targeted an Islamic center that includes both a mosque and a school — and children were present at the time.
Places of… pic.twitter.com/FdQkyCCxlA
उन आतंकी वारदात के लिए ओसामा बिन लादेन और उसके संगठन अल कायदा को जिम्मेदार माना गया था। लादेन की जो तस्वीर तब दुनिया को दिखाई गई उसमें वह पगड़ी बांधे दिखाई देता है।
अमेरिका में रहने वाले मुसलमान आमतौर पर पगड़ी नहीं बांधते। लेकिन वहां रहने वाले सिख पगड़ी बांधते हैं, इसलिए पहला निशाना वही बने। नफरत को अपने दिमाग में पाल बैठे बहुत से अमेरिकी सिखों और लादेन की पगड़ी में फर्क नहीं कर सके।
नतीजा यह रहा कि 11 सितंबर 2001 की उन वारदात के बाद नफरत का सबसे पहला शिकार एक सिख ही बना। ऐरीज़ोना में बलबीर सिंह सोढी पर हमला कर उसकी हत्या कर दी गई। बात यहीं नहीं रुकी।
छिटपुट वारदात की खबरें आती रहीं। फिर 2012 में विस्कांसिन के ओक क्रीक गुरुद्वारे में एक बंदूकधारी ने हमला बोला। अंधाधंुध गोलीबारी करके उसने वहां छह लोगों की हत्या कर दी और चार घायल हो गए।
ठीक यहीं पर डाॅक्टर नविंदरदीप सिंह की कहानी पर ध्यान देना भी जरूरी है। वे उन डाॅक्टरों की टीम में थे जो वल्र्ड ट्रेड सेंटर की वारदात में घायल लोगों का इलाज कर रहे थे। इस इलाज के दौरान ही उन पर तरह-तरह की फब्तियां कसी गईं। उन्हें वहां से चले जाने के लिए कहा गया। पर वे डटे रहे।

कुछ सिख संगठनों ने कोशिश की कि सोशल मीडिया से और अन्य तरीकों से लोगों को यह समझाया जाए कि सिखों की पगड़ी बाकी सबसे कैसे अलग होती है लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ना था।
नफरत करने वालों की यही फितरत होती है कि जो बेफकूफी उनकी दिमाग में घुस चुकी होती है उसके अलावा वे कुछ और नहीं समझते। कुछ और समझने को तैयार नहीं होते।