लखनऊ
जेंडर को केवल जैविक तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह एक भाषाई और सांस्कृतिक अवधारणा भी है, जो भाषा और साहित्यिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से निर्मित होती है। यह विचार डॉ. सोम्या शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग, एफ्लो, ने मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) के लखनऊ कैंपस में आयोजित विस्तारित व्याख्यान के दौरान व्यक्त किए।
‘जेंडर की समझ : आख्यान, भाषा और साहित्यिक प्रतिनिधित्व’ विषय पर आयोजित व्याख्यान की शुरुआत कैंपस प्रभारी प्रोफेसर हुमा याकूब के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने कहा कि विस्तारित व्याख्यान कैंपस की महत्वपूर्ण अकादमिक गतिविधियों में शामिल हैं। कार्यक्रम का संचालन डॉ. नुज़हत अख्तर ने किया, जबकि डॉ. आमना अम्बरीन ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कैंपस के छात्र मोहम्मद सुलेमान ने कुरआन की तिलावत और उसका अनुवाद पेश किया।
अपने व्याख्यान में डॉ. सोम्या शर्मा ने कहा कि आख्यान और कहानियां हमारे मन में जेंडर से जुड़े किरदारों और धारणाओं को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि जेंडर स्टडीज समाज में लंबे समय से कायम रूढ़िवादी धारणाओं को समझने और उन पर नए सिरे से विचार करने में मदद कर सकती हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि जेंडर कोई स्थिर स्थिति नहीं, बल्कि एक गतिशील और लगातार विकसित होने वाली प्रक्रिया है। रोजमर्रा की जिंदगी में इसका प्रदर्शन व्यक्ति के व्यवहार, बातचीत, पहनावे, हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज के माध्यम से होता है।
डॉ. शर्मा ने भाषा के महत्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भाषा केवल शब्दों और औपचारिक व्याकरण के नियमों का समूह नहीं है, बल्कि इसमें संदर्भगत अर्थ, प्रैगमैटिक्स (व्यवहारिक भाषा-विज्ञान), आख्यान और आपसी संवाद भी शामिल होते हैं।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे। व्याख्यान के बाद प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने विभिन्न विषयों पर सवाल पूछे और डॉ. सोम्या शर्मा ने उनके जवाब दिए।