Colour My Grave Purple : असम के अतीत को समेटती एक अनोखी किताब

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 19-05-2026
Colour My Grave Purple: A Unique Book Encompassing Assam's Past
Colour My Grave Purple: A Unique Book Encompassing Assam's Past

 

आवाज द वाॅयस/नई दिल्ली

पूर्वोत्तर भारत का इतिहास हमेशा से रहस्यों, विविधताओं और संघर्षों से भरा रहा है। इसी समृद्ध और अशांत अतीत को पन्नों पर उतारने का एक बेहद अनूठा प्रयास किया गया है। लेखिका शहनाब शाहीन की नई किताब 'कलर माई ग्रेव पर्पल' (Colour My Grave Purple) इन दिनों साहित्य जगत में काफी चर्चा बटोर रही है।

dddयह किताब असम के ऐतिहासिक काल्पनिक साहित्य का एक ऐसा संग्रह है जो पाठकों को इस सीमावर्ती राज्य के रंगीन अतीत की एक लंबी और जीवंत यात्रा पर ले जाता है। पूरी एक सदी के कालखंड को अपने भीतर समेटे हुए यह रचना 1850 के दशक से लेकर 2000 के दशक तक के असम को बखूबी बयां करती है।

इस किताब की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल राजा-महाराजाओं या युद्धों की सूखी तारीखें नहीं बताती। यह असम के आम लोगों, वहाँ की अनूठी संस्कृति, प्रकृति और बदलते सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने से जुड़ी कहानियों को सामने लाती है।

इन कहानियों के माध्यम से पाठकों को कई ऐसे दिलचस्प किरदारों और शक्तियों से मिलने का मौका मिलता है जिनके बारे में मुख्यधारा के साहित्य में बहुत कम लिखा गया है। किताब के पन्नों में तंत्र-मंत्र के जानकारों और नशे में धुत हाथियों से लेकर एक ब्रिटिश-नागा रानी और चीनी लाल सेना तक का अनोखा संगम देखने को मिलता है।

प्रसिद्ध लेखिका और प्रकाशक नमिता गोखले ने भी इस रचना की खुलकर तारीफ की है। उन्होंने कहा है कि बेहद कुशलता से कही गई ये कहानियाँ असम के बदलते सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिदृश्य को पूरी तीव्रता, जुनून और सच्चाई के साथ जीवंत कर देती हैं।

ddवास्तविक तथ्यों और कल्पना का बेहतरीन ताना-बाना

लेखिका शहनाब शाहीन ने इस किताब में वास्तविक ऐतिहासिक वृत्तांतों से लिए गए तथ्यों के साथ एक बहुत ही मनमोहक काल्पनिक कथा बुनी है। ये कहानियाँ पाठकों को रहस्यमयी और अब तक अनछुए असम के बेहद सुदूर कोनों की एक रोमांचक सैर पर ले जाती हैं।

इन कहानियों में असम का सामना केवल अपनी आंतरिक समस्याओं से नहीं होता बल्कि वैश्विक ताकतों से भी होता है। इतिहास के अलग-अलग दौर में असम का सामना ब्रिटेन, जापान और चीन जैसी महाशक्तियों से हुआ। लेखिका ने इन ऐतिहासिक मुलाकातों को उन जीवंत मानवीय अनुभवों के ज़रिए दिखाया है जो बहुत सहजता से प्राकृतिक और अलौकिक यानी सुपरनैचुरल के बीच की महीन रेखा को पार कर जाते हैं।

यह किताब एक राज्य के रूप में असम की अपनी पहचान को भी गहराई से समझने का प्रयास करती है। इसमें सामाजिक अशांति, समाज की वर्जनाओं, विभिन्न प्रजातियों के बीच होने वाले संघर्षों और पुराने सांस्कृतिक आंदोलनों के अवशेषों को एक बहुत ही विस्तृत और उतार-चढ़ाव भरे कैनवस पर बुना गया है।

'कलर माई ग्रेव पर्पल' वास्तव में इस सीमावर्ती क्षेत्र के निर्माण की पूरी प्रक्रिया को खोजने का एक ईमानदार प्रयास है। यह आधुनिक असम से शुरू होकर पाठकों को उस अतीत के समय तक पीछे ले जाती है जो अब केवल लोगों की यादों और स्मृतियों में ही जिंदा रह गया है। यह उन गहराइयों की एक महत्वपूर्ण पड़ताल है जो लंबे समय से हमारी रोज़मर्रा की सतही जान-पहचान के पीछे छिपी हुई थीं।

कौन हैं लेखिका शहनाब शाहीन

इस शानदार और गंभीर किताब को लिखने वाली शहनाब शाहीन का अपना जीवन और अनुभव भी काफी विविधता भरा रहा है। शहनाब भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य असम की वादियों में ही पली-बढ़ी हैं, इसलिए इस क्षेत्र की मिट्टी, हवा और इतिहास से उनका जुड़ाव बहुत गहरा और स्वाभाविक है। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा देश और विदेश के प्रतिष्ठित संस्थानों से पूरी की है। शहनाब ने दिल्ली विश्वविद्यालय और इटली के टोरिनो विश्वविद्यालय से इतिहास और अंतर्राष्ट्रीय विकास जैसे विषयों की पढ़ाई की है।

अंतर्राष्ट्रीय मानवीय सहायता के क्षेत्र में कदम रखने से पहले उन्होंने कुछ समय के लिए भारत सरकार के साथ एक सिविल सेवक यानी सरकारी अधिकारी के रूप में भी अपनी सेवाएं दी थीं। वर्तमान में वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विस्थापित लोगों के कल्याण के लिए काम कर रही हैं।

युद्धों और आपसी संघर्षों के कारण जो लोग अपने घरों से बेघर हो जाते हैं, उनके सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए कार्यक्रम और नीतियां लागू करने में शहनाब को महारत हासिल है। अपनी इसी विशेषज्ञता के कारण वह आजकल लेबनान में रहती हैं और वहीं से अपना काम संभालती हैं। लेबनान में उनके घर में उनकी एक पालतू बिल्ली भी उनके साथ रहती है जिसका नाम उन्होंने पेनेलोप रखा है।

शहनाब शाहीन की इस पहली ही कृति ने साहित्य प्रेमियों और समीक्षकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इतिहास की गहरी समझ और मानवीय संवेदनाओं को शब्दों में पिरोने की उनकी कला को देखते हुए उन्हें एक ऐसी लेखिका के रूप में देखा जा रहा है जिनसे भविष्य में बहुत बेहतरीन साहित्‍य की उम्मीदें की जा सकती हैं।

सांस्कृतिक रूप से समृद्ध उत्तर-पूर्व के बारे में उनका गहन अवलोकन उनकी हर कहानी में साफ झलकता है। उन्होंने असम के अशांत इतिहास को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा बल्कि उसे आम इंसानों की जीती-जागती भावनाओं की पृष्ठभूमि के साथ मिलाकर पेश किया है। यही कारण है कि यह किताब इतिहास में रुचि रखने वालों के साथ-साथ आम पाठकों को भी खुद से जोड़े रखती है।