-मंजीत ठाकुर
सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य का वह ‘विद्रोही’ हस्ताक्षर है, जिसे समझने की कोशिशें आज भी जारी हैं। जाहिद खान द्वारा संपादित और अनूदित पुस्तक ‘मंटो साब - दोस्तों की नजर में’ मंटो को किसी अकादमिक आलोचक की नजर से नहीं, बल्कि उन लोगों की नजर से देखती है जिन्होंने मंटो के साथ जाम छलकाए, ठहाके लगाए और उनकी तल्खियों को बेहद करीब से महसूस किया।
दुर्लभ और उम्दा लेखकों के संस्मरण
इस पुस्तक में उन साहित्यकारों और मित्रों के संस्मरणों का संकलन है, जिन्होंने मंटो के जीवन के अलग-अलग पहलुओं को उकेरा है। कृश्नचंदर, इस्मत चुगताई, बलवन्त गार्गी, अली सरदार जाफरी, और अहमद नदीम कासमी जैसे दिग्गज रचनाकारों के लेखों को एक साथ पढ़ना ऐसा है जैसे मंटो के व्यक्तित्व के उन अंधेरे और उजले कोनों को एक साथ देखना, जहाँ आम आदमी की नजर नहीं पहुँच पाती।
मंटो के बारे में कृश्नचंदर लिखते हैं, “मंटो ने जिंदगी के निरीक्षण में अपने-आप को एक मोमी शमा की तरह पिघलाया है. वो उर्दू का अकेला शंकर है, जिसने जिंदगी के जहर को खुद घोलकर पिया है और फिर उसके जायके को उसके रंग को खोल-खोल के बयान किया है.” वह आगे लिखते हैं, “जहर खाने से अगर शंकर का गला नीला हो गया था तो मंटो ने भी अपनी सेहत गंवा ली है. उसकी जिंदगी इंजेक्शन की मोहताज होकर रह गई है.”
दूसरी तरफ इस्मत चुगताई लिखती हैं, “यह मुझे कभी मालूम न हो सका कि मंटो पीकर बहकता है या बहक कर पीता है. मैंने उसकी चाल में लड़खडाहट या जुबान में हकलाहट न पाई. हां, बस इतना मालूम होता था कि जब ज्यादा पिए हुए हो, तो यह यकीन दिलाने की कोशिश करता था कि वह बिल्कुल नशे में नहीं है और जान को आ जाता था.”
जहाँ इस्मत चुगताई का संस्मरण मंटो के पारिवारिक और जिद्दी स्वभाव को बेबाकी से सामने लाता है, वहीं बलवन्त गार्गी का लेख मंटो के उस मानवीय पक्ष को उजागर करता है जो दुनिया की नजरों में एक ‘अश्लील लेखक’ था। शोरिश काश्मीरी और मुहम्मद तुफैल के लेख मंटो के उस दौर को जीवंत करते हैं, जब वह आर्थिक तंगी और मानसिक अवसाद से जूझ रहे थे। यह संकलन मंटो को एक फरिश्ता या शैतान के रूप में नहीं, बल्कि मांस-मज्जा के एक ऐसे इंसान के रूप में प्रस्तुत करता है जो अपनी सच्चाइयों के साथ अकेला था।
मशूहर लेखक अली सरदार जाफरी अपने संस्मरण में मंटो के बारे में लिखते हैं, “वो ऐसा बदजुबान था, जिस पर मीठा बातें करने वालों, पाकीजा बयानों को ईर्ष्या आ सकती है. बदजुबान बहुत हुए हैं, जिन्हें हमारा गंदा और घिनौना समाज रेगिस्तान की कंटीली झाड़ियों के तरह पैदा करता है लेकिन मंटो को जो सलीका आता था, वह किसी को नसीब नहीं.”
अनुवाद की चुनौती और भाषा का द्वंद्व
जाहिद खान ने इन लेखों का चयन और संपादन बहुत ही सजगता से किया है, लेकिन यहाँ पुस्तक की भाषा एक दोधारी तलवार की तरह है। संपादक ने मूल उर्दू लेखों का अनुवाद करते समय हिंदी में भी बहुत अधिक उर्दू शब्दों का प्रयोग किया है। निस्संदेह, मंटो की रूह उर्दू के लहजे में ही बसती है, और जाहिद ने उसी ‘तमीज’ और ‘अंदाज’ को बनाए रखने का प्रयास किया है।
तथापि, एक सामान्य हिंदी पाठक के लिए, जो उर्दू के शब्दों (जैसे—तदबीर, तज़किरा, रकाबत, इस्तराब, बे-साख़्ता) से परिचित नहीं है, यह पुस्तक कभी-कभी बोझिल हो सकती है। यह आलोचना का विषय है कि एक अनुवादक का धर्म मूल भाव को बनाए रखना तो होता ही है, साथ ही उसे सुगम बनाना भी होता है।
जाहिद खान ने ‘मंटो के मिजाज’ को जिंदा रखने के चक्कर में भाषा का जो ‘संस्कृति-संकर’ (हाइब्रिडाइजेशन) किया है, वह विद्वानों के लिए तो आनंददायक हो सकता है, लेकिन यह मंटो जैसे लेखक तक व्यापक पाठकों की पहुँच को सीमित भी कर सकता है। ऐसा लगता है कि कहीं-कहीं अनुवाद ने हिंदी का चोला तो पहना है, लेकिन सांसें अभी भी उर्दू की ले रहा है।
पूरे किताब में मुझे ऐसा लगा कि मूल उर्दू लेखों को अनुवाद करने की बजाय उसका देवनागरी में लिप्यंतरण कर दिया गया है. अनुवाद तो असल में किसी भी लेख के पुनर्लेखन सरीखा होता है, पर यहां जाहिद खान थोड़े बौद्धिक दुविधा में फंस गए-से लगते हैं. ऐसे में ऐसे में हिंदी के सामान्य पाठकों के लिए किताब बोझिल भी हो सकती है. मगर, जाहिद खान ने अपने सिद्धहस्त कौशल से संपादन का काम बिल्कुल बारीश नश्तर की तरह किया है. लेखों का चयन उम्दा है और शायद दुर्लभ भी.
मंटो की पुनर्रचना
किताब की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें मंटो के प्रति किसी प्रकार का ‘शुद्धिकरण’ नहीं किया गया है। लेखक अपने संस्मरणों में मंटो की शराबखोरी, उनकी बदमिजाजी, उनकी गरीबी और उनके द्वारा समाज के मुँह पर तमाचे की तरह मारे गए उपन्यासों/कहानियों पर उतनी ही ईमानदारी से बात करते हैं, जितनी ईमानदारी से मंटो खुद अपनी कहानियों में करते थे।
‘मंटो साब - दोस्तों की नजर में’ उन लोगों के लिए एक अनिवार्य दस्तावेज है जो मंटो को केवल ‘ठंडा गोश्त’ या ‘टोबा टेक सिंह’ के लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में जानना चाहते हैं।
जाहिद खान का यह प्रयास प्रशंसनीय है कि उन्होंने इतने सारे बिखरे हुए संस्मरणों को एक जगह सहेजा। भले ही भाषा का भारीपन और उर्दू का अतिरेक इसे थोड़ा कठिन बनाता हो, लेकिन मंटो को पढ़ने के लिए यह एक ‘मजबूरी’ है, जिसे पाठक खुशी-खुशी स्वीकार करेंगे।
यह किताब हमें उस मंटो से मिलवाती है, जो खुद को दोस्तों की महफिल में ‘साब’ तो कहला लेता था, लेकिन अपनी रूह में हमेशा एक ‘अजनबी’ ही रहा।यदि आप मंटो की तल्खी और उनके दोस्तों की मोहब्बतों को एक साथ महसूस करना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपकी अलमारी की शोभा अवश्य बढ़ानी चाहिए।
पुस्तक समीक्षा: मंटो साब - दोस्तों की नजर में
अनुवाद एवं संपादन: जाहिद खान
प्रकाशन- सेतु प्रकाशन
कीमत- 325 रुपए