रूढ़ियों को तोड़कर कथक और अभिनय में पहचान बना रहीं फरहान फातिमा

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 17-09-2026
 Breaking stereotypes, Farhan Fatima is making a name for herself in Kathak and acting.
Breaking stereotypes, Farhan Fatima is making a name for herself in Kathak and acting.

 

मधुकुर पांडेय/ लखनऊ

"ज़िंदगी में सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता, आपकी मेहनत ही आपको मुकम्मल मुकाम तक पहुँचाती है। आपकी सफलता में सारी दुनिया आपके साथ होती है, लेकिन संघर्ष के समय में जो आपका साथ दे, वही आपका सच्चा हितैषी है।"

यह कहना है उत्तर प्रदेश की पहली मुस्लिम महिला कथक नृत्यांगना और अभिनेत्री 32वर्षीय फरहान फातिमा का। लखनऊ के विकास नगर से शुरू हुआ उनका सफर आज दिल्ली और बॉम्बे की ग्लैमर इंडस्ट्री तक फैल चुका है, लेकिन इस मुकाम को हासिल करने के पीछे संघर्ष, अनुशासन और पारिवारिक विरोध की एक लंबी दास्तान जुड़ी है।

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जब सपनों के आड़े आई रूढ़ियाँ, वालिद बने ढाल

एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाली फरहान के लिए कथक और रंगमंच की दुनिया में कदम रखना आसान नहीं था। जब उन्होंने इस राह को चुना, तो खानदान के तमाम लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ा। रिश्तेदारों ने एक लड़की के अकेले दिल्ली और मुंबई जाकर काम करने पर कड़ी आपत्ति जताई। ऐसे में उनके वालिद (पिता), उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व डीएसपी अजहर अहमद अपनी बेटी के सबसे बड़े संबल बने। उन्होंने समाज के दवाब के आगे झुकने के बजाय अपनी बेटी के सपनों को परवान चढ़ने की छूट दी। फरहान याद करते हुए बताती हैं, "मेरे अब्बा ने हमेशा मेरे मन की बात सुनी और मुझसे कहा कि मर्यादा में रहकर तुम्हें जो समझ आए, वह करो।" पिता की यही सीख आज भी उनकी जिंदगी का मूलमंत्र है।

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संस्कारों और कला का अनूठा संतुलन

कक्षा और मंच की दुनिया में काम करते हुए फरहान ने हमेशा इस बात का पूरा ख्याल रखा कि उनके किसी भी काम से उनके परिवार का सिर शर्म से नहीं, बल्कि फख्र से ऊंचा हो। यही वजह रही कि वर्षों के संघर्ष के बावजूद उन्होंने कई ऐसे लुभावने रोल्स ठुकरा दिए, जिन्हें करने के बाद वह अपने परिवार से नजरें न मिला पातीं।

उन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं है। उनका मानना है कि कथक और अभिनय उनका शौक है, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं कि परिवार के सम्मान और मर्यादा से कोई समझौता किया जाए। फरहान कहती हैं, "कला और संस्कृति हमें संस्कार सिखाती है, और संस्कार हमारे परिवारों को मजबूत करते हैं। इसमें जरा भी समझौते की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।"

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भातखंडे से लेकर बॉलीवुड के फलक तक

फरहान ने महज 12 वर्ष की उम्र में कथक का विधिवत प्रशिक्षण शुरू कर दिया था। लखनऊ के प्रतिष्ठित भातखंडे संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना वीणा सिंह के मार्गदर्शन में उन्होंने 'कथक विशारद' की डिग्री हासिल की।

कथक कला केंद्र के निदेशक और प्रसिद्ध गुरु सुरेंद्र सैकिया के नेतृत्व में उन्होंने महज़ 13वर्ष की उम्र में बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट के मंच पर अपनी पहली स्टेज प्रस्तुति दी थी। कथक के साथ-साथ उन्होंने सेमी-क्लासिकल संगीत के भी कई कार्यक्रम किए।

उनकी कलात्मक प्रतिभा को देखकर लखनऊ रंगमंच के दिग्गजों ने उन्हें अभिनय के क्षेत्र में हाथ आजमाने की सलाह दी। लखनऊ दूरदर्शन पर प्रसारित उनकी पहली टेलीफ़िल्म 'कसाईवाड़ा' बेहद चर्चित रही और दर्शकों ने उनकी अदायगी को खूब सराहा। रंगमंच से अभिनय का जो सिलसिला तब शुरू हुआ, वह आज भी जारी है।

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मुंबई की चकाचौंध में संघर्ष और सफलता

अभिनय के फलक पर मुकम्मल पहचान बनाने के लिए फरहान ने 2013में मुंबई का रुख किया। महानगर की चकाचौंध और मायानगरी के संघर्ष ने उनकी कड़ी परीक्षा ली। करीब तीन साल के कड़े संघर्ष के बाद उन्हें 2016-17में निर्देशक आनंद राय की फ़िल्म 'नखरेवाली' में काम करने का मौका मिला।

इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। फिल्म निर्देशक कमल चंद्र के निर्देशन में आई 'हमारे बारह' सहित वह अब तक करीब एक दर्जन फिल्मों में अपनी अदाकारी का जादू बिखेर चुकी हैं। वेब सीरीज़ 'ठुकरा के मेरा प्यार' में उनके अभिनय की खासी सराहना हुई।

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टेलीविजन के छोटे परदे पर भी फरहान ने कई लोकप्रिय धारावाहिकों में दमदार भूमिकाएं निभाई हैं। स्टार प्लस के चर्चित शो 'यह रिश्ता क्या कहलाता है' के अलावा 'तोड़कर दिल मेरा', ज़ी टीवी के 'भैया क्या चल रहा है', सोनी सब के 'बालवीर' और 'आरके लक्ष्मण की दुनिया', तथा सहारा वन के 'आखिर बहू भी तो बेटी है' जैसे धारावाहिकों में उनके किरदारों ने दर्शकों के दिलों में गहरी जगह बनाई है।आज फरहान फातिमा उन तमाम युवतियों के लिए एक मिसाल हैं जो सपनों की उड़ान भरना चाहती हैं, बशर्ते इरादों में सच्चाई और संस्कारों की आंचल में मजबूती हो।