कमोडोर डीएस सोढ़ी, एनएम (रिटायर्ड)
14 अगस्त 1947 को दो राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर भारत का विभाजन हुआ। इस बंटवारे ने ऐसे जख्म दिए जो आज तक नहीं भरे। हिंसा में लगभग 10 लाख लोगों ने जान गंवाई। बंटवारे के तुरंत बाद जम्मू और कश्मीर के महाराजा ने स्वतंत्र रहने का फैसला किया। उन्हें डर था कि मुस्लिम बहुल राज्य भारत के साथ और अल्पसंख्यक सिख तथा हिंदू पाकिस्तान में सुरक्षित नहीं रहेंगे।
हालात को समझते हुए पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जे के लिए "ऑपरेशन गुलमर्ग" की योजना बनाई। इसमें पाकिस्तानी सेना की शह पर पश्तून कबाइलियों (कबालियों) का इस्तेमाल किया गया। कबाइलियों के हमले से पहले पाकिस्तान ने कश्मीर की रसद रोक दी। नमक, चीनी और ईंधन की आपूर्ति बंद कर दी गई। इससे लोगों में अशांति फैल गई।
इसके बाद 22 अक्टूबर 1947 को लगभग 4,000 कबाइलियों के लश्कर ने मुज़फ़्फ़राबाद पर हमला कर दिया। उड़ी में ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह का साहसिक प्रतिरोध कबाली मुज़फ़्फ़राबाद से बारामूला होते हुए श्रीनगर हवाई अड्डे की ओर बढ़ रहे थे। इस मोड़ पर महाराजा की सेना के चीफ ऑफ स्टाफ ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने 200 सैनिकों के साथ मोर्चा संभाला।
शरण खोवान दे बाग मुज़फ़्फ़राबाद में उन्होंने दुश्मनों को रोका। सेना की संख्या कम होने के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। पीछे हटते समय ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने उड़ी का पुल उड़ा दिया। इससे कबाइलियों की रफ्तार थम गई। 27 अक्टूबर को बोनियार के पास लड़ते हुए ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह शहीद हो गए। उनके इस साहस से महाराजा को विचार करने का समय मिल गया।
महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 की शाम भारत के साथ विलय पत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर कर दिए।बारामूला की तबाही और भारतीय सेना की लैंडिंगकबाइलियों ने श्रीनगर हवाई अड्डे पर कब्जा करने के लिए पांच दिन की योजना बनाई थी। उड़ी में रास्ता रुकने के बाद वे बारामूला पहुंचे।
यहां कबाइलियों ने बहुत बड़ी सामरिक भूल की। वे सीधे श्रीनगर बढ़ने के बजाय बारामूला और आसपास के इलाकों में दो दिन रुके रहे। इस दौरान उन्होंने आम लोगों पर अत्याचार किए। लूटपाट, आगजनी और हत्याएं की गईं। अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाया गया। दूसरी तरफ विलय पत्र पर दस्तखत होते ही 27 अक्टूबर की सुबह 1st सिख रेजिमेंट श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरी। भारतीय सेना ने हवाई अड्डे का नियंत्रण अपने हाथ में लिया।
ख्वाजा बाग बारामूला, पत्तन, बड़गाम और शालतेंग में भारतीय सैनिकों ने कबाइलियों से डटकर मुकाबला किया। ख्वाजा बाग में कर्नल डीके राय और बड़गाम में मेजर सोमनाथ शर्मा शहीद हुए। भारतीय सेना ने कबाइलियों को पीछे धकेला और उड़ी तक खदेड़ दिया। पीछे हटते समय कबाइलियों ने बारामूला के मोहम्मद मकबूल शेरवानी की हत्या कर दी।
मकबूल शेरवानी ने सिखों को सुरक्षित रास्ता बताकर कबाइलियों से बचाया था। सिख समुदाय का सर्वोच्च बलिदान और साहसिक मोर्चेबंदीसितंबर 1947 में जब पाकिस्तान की नीयत साफ होने लगी थी, तब अकाली कोर सिंह ने पंजाब से मुज़फ़्फ़राबाद के सिखों को सावधान रहने का संदेश भेजा था।
इसके बाद संत गुरबख्श सिंह दन्ना, जत्थेदार कपूर सिंह और ज्ञानी उजागर सिंह ने गांवों का दौरा किया। सिखों को आने वाले खतरे से आगाह किया गया। गुरुद्वारा अमीरा कदल श्रीनगर में शिरोमणि खालसा दल की बैठक बुलाई गई। हमले के समय लोक निर्माण विभाग के श्री वांचू और गांव खदनियार के सरदार साधु सिंह मुज़फ़्फ़राबाद में थे।
हमला होते ही वे बारामूला पहुंचे और सिखों को सूचना दी। गढ़ी हट्टियां से भागे सरदार काला सिंह रैना ने सरदार तारा सिंह मुसाफिर, सरदार मोहन सिंह बाली और सरदार नंद सिंह कानलीबाग से मुलाकात की। इन लोगों ने डिप्टी कमिश्नर चौधरी फैज उल्लाह से बात की। उन्होंने बताया कि कबाली श्रीनगर की तरफ बढ़ रहे हैं और सिखों को जंगलों में जाने की सलाह दी। सिख परिवार सिंहपोरा, दर्दपुरा और इछामा के जंगलों में चले गए।
सिखों ने कबाइलियों का हर मोर्चे पर मुकाबला किया। इस वजह से कबाइलियों की श्रीनगर तक पहुंचने की रफ्तार धीमी पड़ गई। इस लड़ाई में कई सिख पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने शहादत दी।सद्भाव और आत्मसम्मान की अमर गाथाएंकनासापोरा में मारे गए सिखों के शवों को एक स्थानीय मुस्लिम सुल्तान डार ने एक मकान में रखा।
उन्होंने घर में अग्नि देकर शहीदों का सम्मानजनक अंतिम संस्कार किया। चंदोसा गांव में कलीक शेख और मोहम्मद शेख ने सरदारनी घोनी कौर को सिख शहीदों का अंतिम संस्कार करने में मदद की।1 नवंबर 1947 को कबाइलियों ने अतना गांव पर हमला किया। वहां आगजनी शुरू कर दी। इस दौरान माता गंगा कौर हाथ में तलवार लेकर मैदान में आ गईं।
उन्होंने सिखों का हौसला बढ़ाया और वीरता से लड़ीं। गोली लगने से वे शहीद हो गईं।झेलम नदी के दूसरी तरफ कमराज इलाके में भी सिखों की अच्छी आबादी थी। लोग घर छोड़कर सतर्णा गांव के गुरुद्वारे में एकत्र हुए। वामपुरा के सरदार हरनाम सिंह रेंजर ने अरदास की और सबने श्रीनगर की ओर रुख किया। सोपोर के पास बुलगम चूरा की दलदली जमीन (नमब्ली) में छिपे सिखों को कबाइलियों ने धोखा दिया।
कबाइलियों ने सिखों वाले धार्मिक नारे लगाए। झांसे में आकर बाहर निकले लगभग 450 से 500 सिखों को मार दिया गया। कुछ सिख किसी तरह श्रीनगर पहुंचे और कुछ वापस अपने गांव लौटे। कर्नाह से चोगल आए सिखों को स्थानीय कश्मीरी पंडितों ने सोपोर न जाने की सलाह दी।
सरदार सीतल सिंह रैना की पत्नी सरदारनी सलिंदर कौर उस दौर को याद करती हैं। उन्होंने बताया कि सोपोर में सिखों ने अपनी बेटियों और महिलाओं की मर्यादा बचाने के लिए आत्मघाती कदम उठाए। कई महिलाओं ने झेलम नदी में छलांग लगा दी। सलिंदर कौर खुद घायल हो गईं लेकिन बचकर अपने गांव पाटुसा पहुंच गईं। वहां एक स्थानीय मुस्लिम गुलाम मोहम्मद मीर ने उन्हें खाना और पनाह दी।
मांडना गांव में सुल्तान तांतरे, गफ्फार तांतरे और रज्जाक गोरिया जैसे मुस्लिमों ने कबाइलियों से सिखों को न मारने की विनती की। खुशीपुरा गांव में सिखों के शव बिखरे पड़े थे। सरदार गंगा सिंह की बहू सरदारनी माखन कौर ने शवों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए एक व्यक्ति से बात की।
उसने शादी की शर्त रखी जिसे माखन कौर ने स्वीकार कर लिया। लेकिन जब चिता जली, तो माखन कौर अपने बच्चे के साथ चिता में कूद गईं। उन्होंने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राण दे दिए।न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के हवाले से बीएम बामजई ने अपनी पुस्तक "हिस्ट्री ऑफ कश्मीर" में लिखा है कि बारामूला में करीब 3,000 स्थानीय नागरिक मारे गए थे।
इनमें चार यूरोपीय नागरिक और एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश सैन्य अधिकारी अपनी गर्भवती पत्नी के साथ शामिल थे।स्मारक के निर्माण की मांगइस ऐतिहासिक विवरण से स्पष्ट है कि जब रियासती सेना का अग्रिम बचाव टूट गया था, तब सिख समुदाय ने नागरिक सुरक्षा की पहली मजबूत पंक्ति बनाई।
सिखों के कड़े प्रतिरोध ने कबाइलियों को श्रीनगर पहुंचने से रोके रखा। इस दौरान कश्मीरी भाईचारे (कश्मीरियत) की मिसाल भी देखने को मिली। स्थानीय लोगों ने एक-दूसरे का साथ दिया।बारामूला, कमराज, कर्नाह और बड़गाम के सिखों ने इस हमले का सबसे बड़ा नुकसान झेला।
चश्मदीदों और स्थानीय दस्तावेजों में सिख समुदाय के इस योगदान का उल्लेख है। सरकार से अपील की गई है कि इन गुमनाम सिख शहीदों की याद में एक समर्पित स्मारक बनाया जाए। यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को कश्मीर की रक्षा और नागरिक साहस की गाथा याद दिलाता रहेगा।
(डीएस सोढ़ी हेडक्वार्टर इंटीग्रेटेड स्टाफ़ (IT) के पूर्व डिप्टी असिस्टेंट चीफ़, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)