राजेन्द्र शर्मा
गीतकार राजेन्द्र ‘राजन’ को याद करना दरअसल एक ऐसे समय को याद करना है, जब गीत केवल गाए नहीं जाते थे, जिए जाते थे। कुछ आवाज़ें समय के साथ धीमी नहीं पड़तीं। वे स्मृति की तहों में उतर जाती हैं और फिर किसी अनायास क्षण में लौटकर हमारे भीतर वही पुराना उजाला भर देती हैं। रविवार की शाम सहारनपुर के आवास विकास स्थित हरि मंदिर सभागार में ऐसा ही कुछ हुआ। गीतकार राजेन्द्र ‘राजन’ की आवाज़ में उनके गीतों की रिकॉर्डिंग जैसे ही सभागार में गूंजी, लगा कि समय ने कुछ पल के लिए पीछे लौटने का निर्णय कर लिया है। आंखों के सामने वह चेहरा नहीं था, लेकिन आवाज़ थी। देह अनुपस्थित थी, लेकिन शब्द उपस्थित थे। व्यक्ति चला गया था, मगर उसका गीत अपने पूरे जीवन के साथ सामने खड़ा था।
अमर गीत-शिल्पी राजेन्द्र ‘राजन’ की 73वीं जयंती और उनकी प्राणवल्लभा, कवयित्री विभा मिश्रा की स्मृति में नवांकुर नाट्य संस्था द्वारा आयोजित यह शाम महज एक स्मृति समारोह नहीं थी। यह उन रिश्तों की पुनर्प्रतिष्ठा थी जो मनुष्य और मनुष्य के बीच कविता बनाती है, कविता और समाज के बीच संवेदना का पुल बनाती है और स्मृति को इतिहास में बदल देती है। सभागार में बैठे लोगों की आंखें नम थीं। शायद इसलिए नहीं कि कोई पुराना परिचित याद आ गया था, बल्कि इसलिए कि राजन की आवाज़ में उन्हें अपने जीवन का कोई भूला हुआ कोना सुनाई दे रहा था।
कविता का सबसे बड़ा धर्म मनुष्य को बचाए रखना है
कार्यक्रम में महापौर डॉ. अजय कुमार सिंह ने राजेन्द्र ‘राजन’ और विभा मिश्रा को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए कहा—“कवि सृजन करता है और यह सृजन ही सृष्टि की सुंदरतम अभिव्यक्ति है।” यह कथन इस पूरे आयोजन का जैसे केंद्रीय स्वर बन गया। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब शब्द बहुत हैं, लेकिन संवेदना कम होती जा रही है। संवाद के साधन बढ़े हैं, लेकिन संवाद घटा है। मनुष्य पहले से अधिक जुड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन भीतर से अकेला होता जा रहा है। हिंसा, असहमति और विद्वेष के बीच कविता का प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह मनुष्य के भीतर बचे हुए मनुष्य को पुकारती है।
डॉ. अजय कुमार सिंह ने इसी संदर्भ में कहा कि संसार हिंसा, विद्रोह और विनाश की अनेक स्थितियों से घिरा हुआ है और ऐसे समय में समाज को कवि की सुकोमल संवेदना की पहले से अधिक आवश्यकता है। कवि का दायित्व है कि वह संसार को दया, करुणा, विनम्रता और कृतज्ञता सौंपे। राजेन्द्र ‘राजन’ की स्मृति इसीलिए महज अतीत का स्मरण नहीं है। वह इस प्रश्न से भी हमारा सामना कराती है कि आज का कवि अपने समय के साथ क्या कर रहा है?
भीड़ में शामिल होने के लिए नहीं, दिशा दिखाने के लिए है कवि
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पद्मश्री योगगुरु स्वामी भारत भूषण ने राजेन्द्र ‘राजन’ से जुड़े अपने आत्मीय संस्मरण सुनाए। मोक्षायतन में होने वाले उनके काव्य-पाठ की स्मृतियां साझा करते हुए उन्होंने राजन के व्यक्तित्व की उस आत्मीयता को याद किया जो उनके गीतों की तरह ही सहज और स्पंदित थी। लेकिन स्वामी भारत भूषण की बात केवल राजन तक सीमित नहीं रही। उन्होंने जैसे पूरे रचनाकार समुदाय से कहा— “भीड़ का हिस्सा न बनें, बल्कि भीड़ को मार्गदर्शन करने वाला सूर्य बनें।” उनका वाक्य आज के साहित्यिक समय में दूर तक जाने वाला वाक्य है। कवि यदि केवल भीड़ का हिस्सा हो जाए तो कविता की रोशनी बुझने लगती है। कवि का काम तालियों के पीछे चलना नहीं, बल्कि कभी-कभी उस अंधेरे की ओर देखना भी है, जहां जाने से दूसरे डरते हैं। उसे लोकप्रियता से अधिक सत्य का पक्ष चुनना होता है। उसे अपने समय से असहमति रखने का साहस भी रखना होता है। सूर्य इसलिए सूर्य है कि वह अपना धर्म नहीं छोड़ता। कवि भी तभी कवि है, जब वह अपने रचनात्मक धर्म को बचाए रखे।
जब कविताओं ने राजन को अलग-अलग रंगों में याद किया
इस शाम का सबसे सुंदर हिस्सा था काव्य-पाठ। किसी को याद करने के बहुत से तरीके हो सकते हैं—फूल, दीप, तस्वीर, मौन, संस्मरण। लेकिन किसी कवि को याद करने का सबसे स्वाभाविक तरीका शायद कविता ही है। नगर के कवियों ने जब अपनी-अपनी कविताएं पढ़नी शुरू कीं तो राजेन्द्र ‘राजन’ एक स्मृति नहीं रहे। वे अनेक आवाज़ों में बंटकर फिर से उपस्थित हो गए। इस वर्ष के राजेन्द्र राजन स्मृति गौरव सम्मान से नवाज गये वीरेश कुमार त्यागी की पंक्तियों में मर्यादा के टूटने की पीड़ा थी—
“मृगतृष्णा में लाँघ गये जो देहरी निज मर्यादा की,
आँखों से गिरकर वे आँसू दुनिया में बदनाम हुए।”
इन पंक्तियों में केवल एक व्यक्ति का दुख नहीं, बल्कि उस मनुष्य की त्रासदी है जो अपनी ही मर्यादाओं से दूर जाकर अंततः अपने भीतर से गिर जाता है।
सुमेधा नीरज ने जीवन की दुविधाओं से बाहर निकलने का साहस दिया—
“किस दुविधा में पड़ी हुई हो,
सोचो, समझो, देखो-भालो,
अपने हाथों से अपनी तकदीर बदल डालो।”
यह कविता जैसे कहती है कि नियति हमेशा ऊपर से नहीं लिखी जाती; कई बार मनुष्य अपने हाथों में कलम लेकर अपनी तकदीर की इबारत बदल सकता है।
विजेन्द्रपाल शर्मा ने बच्चों की सहज दुनिया से जीवन का एक बड़ा पाठ सीखा—
“लड़ना, अच्छा करना,
बच्चों से सीखें…
इक खाई को भरना।”
कितनी छोटी पंक्तियां, लेकिन कितनी बड़ी बात—टूटे हुए समय में खाई पाटना शायद कविता का भी एक धर्म है।
डॉ. राजीव उपाध्याय ‘यायावर’ ने तो सहारनपुर को ही कविता का पात्र बना दिया—
“मैं सहारनपुर कहलाता हूँ!
जिजीविषा है मेरे भीतर,
गिरता हूँ, उठ भी जाता हूँ।”
इन पंक्तियों में शहर केवल भूगोल नहीं रह जाता। वह एक जीवित मनुष्य बन जाता है—गिरता है, उठता है, संघर्ष करता है और फिर चल पड़ता है।
डॉ. अनीता देवी ने राजेन्द्र ‘राजन’ को गीतों का ‘राजकुँवर’ कहा—
“गीतों के उस राजकुँवर को ऐसे याद मैं करती हूँ!
गा लेती हूँ गीत उन्हीं के जब भावों से भरती हूँ।”
किसी गीतकार के लिए इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या होगी कि उसके जाने के बाद भी कोई उसके गीत गाकर उसे अपने भीतर जीवित महसूस करे।
डॉ. रामेश्वर प्रसाद सारस्वत की पंक्तियों में शोक की वह सादगी थी जिसमें आंसू किसी अलंकार के मोहताज नहीं होते—
“अब तक हमको विश्वास नहीं,
नयनों का तारा चला गया!
जिस पर हमको विश्वास बहुत,
वह राजन प्यारा चला गया।”
और साधना कृष्ण ने सृजन के स्त्री-पक्ष को अपनी पंक्तियों में स्वर दिया—
“सृजन यही करती, माता बन पालन करती!
प्रेयसी बन प्रियतम बन शासन करती।”
इन तमाम कविताओं ने मिलकर एक ऐसा भावलोक रचा जिसमें राजेन्द्र ‘राजन’ एक ही व्यक्ति नहीं रहे। वे स्मृति में अलग-अलग चेहरों, अलग-अलग संबंधों और अलग-अलग संवेदनाओं में दिखाई देने लगे।
सहारनपुर की सांस्कृतिक स्मृति का एक पन्ना फिर खुला
समारोह का एक महत्वपूर्ण पक्ष वह भी था जब सहारनपुर की उस सांस्कृतिक विरासत को याद किया गया जिसने कभी इस शहर को राष्ट्रीय सांस्कृतिक मानचित्र पर अलग पहचान दी थी। पिछली सदी में कविता, साहित्य और रंगमंच की अनेक ऐसी विभूतियां सहारनपुर में सक्रिय रहीं जिनके कारण शहर केवल व्यापार और उद्योग का शहर नहीं रहा, बल्कि रचनात्मकता का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बना।
गीतकार राजेन्द्र ‘राजन’, कवि सुरेश सपन, बाल साहित्य के प्रणेता कृष्ण शलभ, कवि योगेश छिब्बर, कवयित्री इन्द्रा गौड़, कवयित्री विभा मिश्रा, रंगकर्मी विजेश जोशी, शीतल त्यागी, राम कुमार तेजान, शिवपाल, चित्रा भार्गव और विजय पाल सिंह जैसी विभूतियों का स्मरण करते हुए यह महसूस हुआ कि शहरों की पहचान केवल उनकी इमारतों, बाजारों और सड़कों से नहीं बनती। उनकी असली पहचान उन लोगों से बनती है जो अपने शब्दों, रंगों, स्वरों और अभिनय से शहर की आत्मा को आवाज़ देते हैं।
इन्हीं दिवंगत विभूतियों के नाम पर ‘गौरव सम्मान’ प्रदान किए गए। कवि वीरेश त्यागी, कवि विनोद भृंग, डॉ. संदीप मिश्रा, डॉ. हरिओम गुप्ता, साधना शर्मा, सुमेधा नीरज, संजय गुप्ता, निर्मला सनावर, दिनेश तेजान, प्रवेश धवन, राजीव सिंघल, विपिन शर्मा और अंजली शर्मा को सम्मानित किया गया।
यह सम्मान वस्तुतः केवल व्यक्तियों का सम्मान नहीं था। यह उस परंपरा का सम्मान था जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक शब्दों की मशाल पहुंचाती है।
एक मित्र आया तो स्मृतियों में रंगमंच भी उतर आया
राजेन्द्र ‘राजन’ के आत्मीय मित्र और उत्तराखंड के ख्यात रंगकर्मी वी.के. डोभाल की उपस्थिति ने समारोह को एक और भावनात्मक आयाम दिया। मित्र का होना कई बार किसी स्मृति की सबसे विश्वसनीय गवाही होता है। मित्र उस व्यक्ति को जानते हैं जिसे दुनिया मंच पर देखती है, और उस व्यक्ति को भी जो मंच से उतरने के बाद अपने सबसे सहज रूप में होता है। वी.के. डोभाल को भी इस अवसर पर सम्मानित किया गया। आवाज़ बची रहे तो मृत्यु पूरी नहीं होती कार्यक्रम के आरंभ से पहले जब राजेन्द्र ‘राजन’ की आवाज़ में उनके गीतों की रिकॉर्डिंग सुनाई गई, तब शायद समारोह का सबसे बड़ा सत्य सामने आया।
मृत्यु देह को समाप्त करती है, आवाज़ को नहीं। आवाज़ स्मृति में रहती है। शब्दों में रहती है। गीतों में रहती है। मित्रों की बातचीत में रहती है। किसी पुराने कागज पर लिखी पंक्ति में रहती है। और सबसे अधिक—उन लोगों के भीतर रहती है जिन्हें कभी उस आवाज़ ने छुआ था।
राजन की आवाज़ सुनते हुए कई आंखें नम हुईं। लोगों ने उन्हें केवल एक लोकप्रिय गीतकार के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे रचनाकार के रूप में याद किया जिसकी संवेदना अपने समय और समाज से गहरे जुड़ी थी। प्रेम, करुणा, मानवीय संबंधों और जीवन के छोटे-बड़े अनुभवों को सहजता से गीत में ढाल देना उनकी रचनात्मक शक्ति थी।
स्मृति तभी सार्थक है जब वह भविष्य को रोशन करे
राजेन्द्र ‘राजन’ की स्मृति में हुई यह शाम अंततः एक बड़े प्रश्न पर जाकर ठहरती है—हम अपने रचनाकारों को कैसे याद करते हैं? क्या केवल उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाकर?क्या केवल उनकी जयंती मनाकर? या फिर उनके शब्दों को अपने समय की धड़कनों से जोड़कर? शायद तीसरा रास्ता ही किसी रचनाकार के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
राजेन्द्र ‘राजन’ को याद करने का अर्थ उनके गीतों को फिर से सुनना भर नहीं है। इसका अर्थ उस मानवीय संवेदना को बचाए रखना भी है जिसने उन गीतों को जन्म दिया था। इसीलिए यह समारोह केवल अतीत की ओर मुड़कर देखने वाली शाम नहीं था। यह भविष्य की ओर जलता हुआ एक छोटा-सा दीप भी था। सहारनपुर के साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास की यह शाम जैसे कह रही थी—
रचनाकार चला जाता है, रचना नहीं।
आवाज़ थम जाती है, अनुगूंज नहीं।
देह मिट जाती है, स्मृति नहीं।
और यदि शब्दों में मनुष्य बचा हुआ है,
तो कवि कभी पूरी तरह नहीं मरता।
राजेन्द्र ‘राजन’ की स्मृति में आयोजित यह काव्यांजलि इसी अमर विश्वास की शाम थी। कार्यक्रम में रविन्द्र मिगलानी, योगेश दहिया, बिजेन्द्र त्रिपाठी, कुलदीप धमिजा, प्रशान्त गुप्ता, पं. शिव गौड़, डॉ. दिनेश कुमार शर्मा, विपिन शर्मा, गीता चौहान, करुणा प्रकाश, शरद भार्गव, योगेश पवार, धुरेंद्र सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। आयोजन का संयोजन राजेन्द्र ‘राजन’ के सुपुत्र प्रशान्त ‘राजन’ और पुत्रवधू अलका शर्मा ने किया। और जब शाम रात में तब्दील होने लगी , सभागार धीरे-धीरे खाली होने लगा, तब भी शायद वहां कुछ बचा हुआ था—राजन की आवाज़ की एक हल्की-सी अनुगूंज, कुछ कविताओं की पंक्तियां और यह विश्वास कि शब्द यदि सचमुच मनुष्य के पक्ष में खड़े हों, तो समय उन्हें कभी विस्मृत नहीं कर सकता।