पटना
भारतीय नृत्य कला मंदिर में राजकमल प्रकाशन द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय ‘किताब उत्सव’ के दूसरे दिन पुस्तकप्रेमियों की उत्साहजनक भागीदारी देखने को मिली। इस दौरान आयोजित कार्यक्रम में जावेद अनवर और डॉ. रफरक शकील अंसारी की किताब ‘साम्प्रदायिकता और जातिवाद के विषाणु’, मंजीत ठाकुर की ‘बहे सो गंगा : डार्क जोन में बदलता उत्तर भारत’, विश्वनाथ त्रिपाठी के अपने अनेक शिष्यों के साथ संवाद पर आधारित पुस्तक ‘संगत : विश्वनाथ त्रिपाठी’, ज्योति चावला के कहानी-संग्रह ‘चाबी, घर और अँधेरा’ तथा कविता के कहानी-संग्रह ‘वो रेन लिली खिलने के दिन थे’ का लोकार्पण हुआ।
वहीं प्रेमकुमार मणि की विचारोत्तेजक कृति ‘भारत : एक विचार परम्परा’, हृषीकेश सुलभ के नवीनतम उपन्यास ‘जूठी गली’ और पुष्यमित्र की नई किताब ‘गांधी का सैंतालीस’ पर बातचीत हुई। साथ ही ‘डिजिटल दौर में अख़बार की ज़रूरत’ और ‘समकालीन कहानी : सवाल और सरोकार’ जैसे विषयों पर भी चर्चा की गई। जबकि राजकमल प्रकाशन द्वारा मनाए जा रहे ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री वर्ष’ पर केंद्रित एक विशेष सत्र आयोजित हुआ और विश्वनाथ त्रिपाठी पर केंद्रित पुस्तक से पाठ-प्रस्तुति भी की गई।
भाषा में छिपे जाति और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों पर गंभीर विमर्श
सुबह 11 बजे से आयोजित कार्यक्रम के पहले सत्र में ‘साम्प्रदायिकता और जातिवाद के विषाणु’ का लोकार्पण हुआ। इस दौरान वरिष्ठ पत्रकार एवं सम्पादक अजय कुमार, पूर्व-राज्यसभा सांसद अली अनवर, विचारक-लेखक प्रेमकुमार मणि, प्रोफ़ेसर राजेंद्र प्रसाद सिंह और डॉ. हिलाल अहमद उपस्थित रहे। वहीं संचालन अजय सिंह ने किया।
इस मौके पर जावेद अनवर ने कहा कि यह पुस्तक कोरोना काल में चार वर्षों की मेहनत का परिणाम है, जिसमें भारतीय भाषाओं के मुहावरों और लोकोक्तियों में मौजूद जाति और संप्रदाय आधारित पूर्वाग्रहों का विश्लेषण किया गया है। उन्होंने कहा कि इस तरह की भाषाई संरचनाओं ने समाज में विभाजन को बढ़ाया है।
प्रेमकुमार मणि ने कहा कि भाषा और साहित्य में जातिगत तिरस्कार गहराई से मौजूद है और यह हमारी रोज़मर्रा की भाषा में भी शामिल हो चुका है। उन्होंने इसे महत्वपूर्ण हस्तक्षेप बताया। अजय कुमार ने कहा कि भाषा और कहावतों के जरिए जातिवादी सोच समाज में गहराई से स्थापित हुई है और समय के साथ और मजबूत हुई है।
डॉ. हिलाल अहमद ने भाषाओं के सामाजिक संदर्भों को समझने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि समतामूलक समाज के लिए भाषा को नए दृष्टिकोण से देखना होगा। प्रो. राजेंद्र प्रसाद सिंह ने भाषाई लोकतंत्र के लिए भाषा में भेदभाव, विशेषकर लिंगभेद, समाप्त करने की आवश्यकता बताई। अंत में अली अनवर ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
डिजिटल दौर में भी कायम है अख़बारों की विश्वसनीयता
दूसरे सत्र में ‘डिजिटल दौर में अख़बार की ज़रूरत’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई जिसमें शहर के प्रमुख समाचार पत्रों के सम्पादक―अजय कुमार, अश्विनी कुमार सिंह और रजनीश उपाध्याय बतौर वक्ता शामिल हुए। परिचर्चा में सूत्रधार की भूमिका कुमार रजत ने निभाई। चर्चा की शुरुआत करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि मोबाइल के इस दौर में, जहाँ पल-पल की खबरें तुरंत उपलब्ध हैं, अख़बार की आवश्यकता क्यों बनी हुई है।
अजय कुमार ने कहा कि तकनीक समय के साथ बदलती रही है और टेलिविज़न के आगमन के समय भी पत्रकारिता के सामने ऐसी ही चुनौतियाँ थीं। उनके अनुसार असली चुनौती मोबाइल नहीं, बल्कि अख़बार के भीतर की भाषा और शैली को समयानुकूल बनाए रखने की है। आगे उन्होंने कहा कि समय के साथ अख़बारों में कंटेंट और प्रस्तुति दोनों स्तरों पर बदलाव हुए हैं। उन्होंने ज़ोर दिया कि बदलती दुनिया में अख़बार तभी प्रासंगिक बने रहेंगे जब वे समाज के साथ संवाद बनाए रखें और जनसरोकार के मुद्दों को प्राथमिकता दें।
अश्विनी कुमार सिंह ने कहा कि समय के साथ बदलाव के बावजूद अख़बार एक परम्परा के रूप में कायम हैं और पाठकों की संख्या में कमी नहीं आई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि खबरों के सत्यापन और संवेदनशील प्रस्तुति के कारण अख़बारों पर लोगों का भरोसा बना हुआ है। उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों के आने के बाद भी अख़बार अपनी विश्वसनीयता और जिम्मेदारी के कारण प्रासंगिक बने हुए हैं।
रजनीश उपाध्याय ने कहा कि आज भी अख़बार सूचना का सबसे भरोसेमंद स्रोत हैं और सख़्त संपादकीय मानकों के कारण उनकी विश्वसनीयता बनी हुई है। तकनीक ने जीवन को प्रभावित और आंशिक रूप से नियंत्रित किया है, लेकिन इसके बावजूद अख़बार की अहमियत कायम है। उन्होंने कहा कि अख़बार केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि एक संपूर्ण अनुभव हैं, और अपनी विश्वसनीयता तथा पाठकों की रुचि के अनुरूप वे आगे भी अपनी जगह बनाए रखेंगे। उन्होंने यह भी जोड़ा कि विज्ञापन के लिए भी अख़बार आज भी एक प्रभावी माध्यम हैं।
‘भारत’ को विचार और परम्परा के रूप में समझने की कोशिश
तीसरे सत्र में प्रेमकुमार मणि की विचारोत्तेजक कृति ‘भारत : एक विचार परम्परा’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। इस दौरान लेखक के साथ मंच पर इम्तियाज अहमद और बद्रीनारायण उपस्थित रहे, वहीं संचालन धर्मेंद्र सुशांत ने किया। चर्चा की शुरुआत में उन्होंने भारत को परिभाषित करने की आवश्यकता पर प्रश्न उठाया। प्रेमकुमार मणि ने कहा कि भले ही भारत का भूगोल समय-समय पर बदलता रहा हो, उसकी विचार परम्परा निरन्तर बनी रही है। उन्होंने इतिहास को एक जीवंत प्रक्रिया बताते हुए उसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पुनः देखने की जरूरत पर जोर दिया। ऐतिहासिक नायकों पर चर्चा करते हुए प्रेमकुमार मणि ने कहा कि अशोक जैसे व्यक्तित्वों पर भी आलोचनात्मक दृष्टि से विचार होना चाहिए, जबकि चंद्रगुप्त मौर्य जैसे शासकों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।
बद्रीनारायण ने इस विचार को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भारत केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक विचार और मूल्य है। उनके अनुसार भारत को समझना दरअसल अपने मूल्यों की खोज और आत्मविश्लेषण की प्रक्रिया है, जहाँ विविधता के भीतर भी एक प्रकार की पूर्णता मौजूद है। इतिहास की व्याख्या पर बद्रीनारायण ने कहा कि आज के समय में इतिहास को समग्र दृष्टि से देखने की जरूरत है, खासकर जब उसे तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किए जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
इम्तियाज़ अहमद ने कहा कि भारत को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि यहाँ के लोग स्वयं को कैसे देखते हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ बदलाव को स्वीकार करते हुए अपनी मूल पहचान को बनाए रखना ही भारतीय परम्परा की विशेषता है। चीन, जापान और भारत के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि बदलते दौर में भी इन समाजों ने अपनी सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि इतिहास के कई आयाम होते हैं और उसे समझने के लिए अतीत और वर्तमान के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इतिहास के विकास में हिंसा की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, जिसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिणाम होते हैं।
सूखती नदियों और जल संकट पर सवाल उठाती है―‘बहे सो गंगा’ पुस्तक
चौथे सत्र में मंजीत ठाकुर की पुस्तक ‘बहे सो गंगा : डार्क ज़ोन में बदलता उत्तर भारत’ का लोकार्पण हुआ। इस दौरान गिरींद्रनाथ झा की लेखक से बातचीत हुई। मंजीत ठाकुर ने कहा कि यह पुस्तक हमारे समय की गहरी चिंता को व्यक्त करती है, जहाँ उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा ‘डार्क ज़ोन’ में बदलता जा रहा है। उन्होंने बताया कि देश-दुनिया की कई बड़ी नदियाँ सूख रही हैं और एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में गंगा के जलस्तर में लगभग 36 प्रतिशत की कमी आई है। उनके अनुसार गंगा के सूखने के कारणों की पड़ताल ही इस पुस्तक का केंद्र है। उन्होंने यह भी कहा कि नदियाँ हमारी चिंताओं के दायरे से बाहर होती जा रही हैं, जबकि हमारा अस्तित्व उनसे जुड़ा है। हमारी रोज़मर्रा की आदतों ने नदियों के शोषण को बढ़ाया है, और बढ़ती आबादी के साथ यह संकट और गंभीर होता जा रहा है। वहीं गिरींद्रनाथ झा ने कहा कि आज के समय में यह किताब बेहद ज़रूरी है क्योंकि एक ओर हम गंगा को माँ मानकर पूजते हैं, वहीं उसके वास्तविक हालात और विभिन्न आयामों को समझना भी उतना ही ज़रूरी है।
‘जूठी गली’ के बहाने स्थानीयता और भाषा पर चर्चा
पाँचवें सत्र में हृषीकेश सुलभ के नए उपन्यास ‘जूठी गली’ पर चर्चा हुई। इस दौरान योगेश प्रताप शेखर ने लेखक से संवाद किया, वहीं अंजलि शर्मा ने उपन्यास से अंशपाठ किया। बातचीत के दौरान योगेश प्रताप शेखर ने स्थानीयता और आंचलिकता के अंतर पर सवाल उठाया, जिस पर हृषिकेश सुलभ ने कहा कि स्थानीयता किसी एक भूगोल तक सीमित नहीं, बल्कि हर स्थान अपने आप में एक लोक और भाषा का प्रतिनिधित्व करता है। समाज और समय पर उन्होंने कहा कि दोनों लगातार बदलते हैं और मनुष्य इसकी केंद्रीय इकाई है। भाषा पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि रचना का यथार्थ ही उसकी भाषा को आकार देता है। स्थानीयता में राजनीति और इतिहास के संबंध पर उन्होंने कहा कि जहाँ विचार होगा, वहाँ इतिहास भी निर्मित होगा।
नफ़रत के दौर में अंहिसा की ताकत से परिचय कराती है―‘गाँधी का सैंतालीस’ पुस्तक
छठे सत्र में पुष्यमित्र की पुस्तक ‘गाँधी का सैंतालीस’ पर चर्चा हुई, जिसमें निखिल आनंद गिरी और पुष्पेंद्र ने लेखक से बातचीत की। निखिल आनंद गिरी ने किताब के अंश के संदर्भ से चर्चा की शुरुआत की, जिस पर पुष्यमित्र ने कहा कि यह पुस्तक खासकर उन लोगों के लिए है जो गाँधी की आलोचना करते हैं।
उन्होंने कहा कि गाँधी सांप्रदायिकता के खिलाफ सक्रिय रहे और संवाद को अपना सबसे बड़ा माध्यम मानते थे।
‘सैंतालीस’ के संदर्भ पर पुष्पेंद्र ने कहा कि यह किताब विभाजन के दौर में गाँधी को समझने का एक प्रयास है। पुष्यमित्र ने जोड़ा कि गाँधी के लिए बलिदान एक महत्वपूर्ण साधन था और वे आदर्शवाद के साथ-साथ व्यवहारिक भी थे। दर्शकों के सवालों के जवाब में पुष्यमित्र ने कहा कि गाँधी की सबसे बड़ी ताकत उनका संवाद था और वे पूर्वाग्रह से दूर रहकर विरोधी पक्ष से भी बातचीत करते थे। पुष्पेंद्र ने बताया कि पुस्तक में उस दौर में गाँधी की गतिविधियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है।
समकालीन कहानियों में स्त्री, विस्थापन और स्मृति के सरोकार
सातवें सत्र में ‘समकालीन कहानी: सवाल और सरोकार’ विषय पर चर्चा के साथ ज्योति चावला के कहानी-संग्रह ‘चाभी, घर और अँधेरा’ और कविता के कहानी-संग्रह ‘वो रेन लिली खिलने के दिन थे’ का लोकार्पण हुआ। इस दौरान फरीद ख़ाँ ने उनसे संवाद किया।
विभाजन की कहानियों पर बात करते हुए ज्योति चावला ने कहा कि तीसरी पीढ़ी का हिस्सा होने के नाते वे इन्हीं अनुभवों के बीच बड़ी हुईं और बाद में पढ़ाई-लेखन ने उन्हें समझाया कि ये सिर्फ़ कहानियाँ नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास हैं। अपने लेखन के अनुभव पर कविता ने कहा कि उनकी कहानियाँ उन स्त्रियों के दर्द को व्यक्त करती हैं, जो जीवन के एक पड़ाव पर बहुत कुछ सहती हैं, लेकिन परिवार तक उसे पहुँचने नहीं देतीं।
‘चाभी’ कहानी के संदर्भ में ज्योति चावला ने बताया कि यह विस्थापन का प्रतीक है—विभाजन के समय लोग अपने घरों की चाभियाँ इस उम्मीद में साथ ले गए थे कि वे लौटेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी कहानियों में पंजाब और बिहार दोनों की पृष्ठभूमि उनके व्यक्तिगत अनुभवों से आई है। ‘वो रेन लिली खिलने के दिन थे’ कहानी के बारे में कविता ने बताया कि यह कहानी उन्होंने अपने एक मित्र को समर्पित की है और आज के सोशल मीडिया के दौर में लोगों के भीतर छिपे भावनात्मक अनुभवों को सामने लाने का प्रयास है।
‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री वर्ष’ पर केंद्रित विशेष सत्र
आठवाँ सत्र राजकमल प्रकाशन द्वारा मनाए जा रहे ‘हिन्दी उपन्यास का स्त्री वर्ष’ पर केंद्रित रहा। स्त्री वर्ष के अंतर्गत राजकमल नौ स्त्री-कथाकारों के उपन्यास एकसाथ लेकर आया है जिसमें अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित गीतांजलि श्री का नया उपन्यास भी शामिल है। स्त्री के उपन्यासों के सन्दर्भ में बोलते हुए वन्दना राग ने कहा, नौ लेखिकाओं का लगभग एक जैसे विषय पर उपन्यास लिखना एक सुन्दर संयोग है। उन्होंने कहा कि अमूमन स्त्रियों के बारे में एक राय है कि वो अपने जीवन में कड़े फैसले नहीं लेती लेकिन अब स्थिति बदलती हुई दिखाई पड़ती है। गंभीर मुद्दों पर अब लेखिकाएँ खुल कर लिखती हैं और अपने उपन्यासों में जटिल विषयों पर चर्चा करती हैं। इसके बाद कृष्ण सम्मिद्ध, मोना झा और दीपशिखा ने नौ उपन्यासों से अंशपाठ किया।
रविवार को होंगे ये कार्यक्रम
किताब उत्सव में 5 अप्रैल, रविवार के कार्यक्रम में विनय कुमार के खण्डकाव्य ‘श्रेयसी’, दिनेश कुमार मिश्र की किताब ‘पानी का शाप : बिहार में बाढ़-सुखाड़’, साहित्य अकादमी पुरस्कार-2025 से पुरस्कृत ममता कालिया की कृति जीते जी इलाहाबाद, पुष्पेश पंत के संस्मरणों की किताब ‘नैनीताला नैनीताला : एक शहर स्मृतियों में’, जसिंता केरकेट्टा के कहानी-संग्रह ‘औरत का घर’ पर चर्चा होगी। वहीं दिन का समापन ‘गुलज़ार के गीत, गीतों की कहानियाँ’ विषय पर बातचीत के साथ होगा।
पुस्तक प्रदर्शनी बनी आकर्षण का केंद्र
किताब उत्सव में भव्य पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई गई है जिसमें हिन्दी पुस्तकों के विशाल संग्रह के साथ 27 भारतीय भाषाओं और 9 भारतीयेतर भाषाओं से हिन्दी में अनूदित पुस्तकें शामिल हैं। साथ ही बच्चों के लिए भी सैकड़ों रोचक और सचित्र पुस्तकें उपलब्ध है। पुस्तक प्रदर्शनी का समय सुबह 11 बजे से रात 8 बजे तक रखा गया है। यह उत्सव 7 अप्रैल तक चलेगा।