नई दिल्ली
“रूमी और कबीर: एक तक़ाबुली मौतला” विषय पर बोलते हुए प्रो. आसिफ ने रूमी और कबीर के विचारों की तुलना करते हुए दर्शकों को गहन और विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि दोनों महान सूफी और संत कवियों के विचार कई विषयों पर मिलते-जुलते हैं। अपने व्याख्यान में प्रो. आसिफ ने क़ुरान, हदीस और फारसी, उर्दू एवं हिंदी काव्य के उद्धरणों का विस्तार से हवाला दिया। उन्होंने मानव मूल्यों, प्रेम, इंसानियत और भाईचारे पर दोनों कवियों की समान शिक्षाओं को प्रमुखता से उजागर किया।
उनके व्याख्यान ने दर्शकों को साझा रहस्यमयी और आध्यात्मिक परंपराओं पर विचार करने का अवसर प्रदान किया। प्रो. आसिफ ने कार्यक्रम में सत्र की अध्यक्षता स्वीकार करने और छात्रों को अंतरराष्ट्रीय संबंधों और राजनीति के क्षेत्र में मार्गदर्शन देने के लिए प्रो. महताब आलम रिज़वी का धन्यवाद भी किया।
मानविकी और भाषाओं के संकाय के डीन, प्रो. इक़्तिदार मोहम्मद खान ने क़ुरान और विश्व की विभिन्न भाषाओं से जुड़े उनके ज्ञान की सराहना की। कार्यक्रम के अवसर पर आर्काइव्स के निदेशक, प्रो. शहजाद अंजुम ने इस व्याख्यान का उद्घाटन किया और वीसी प्रो. आसिफ को आभार व्यक्त किया कि उन्होंने ऐसे शैक्षणिक प्रयासों को समर्थन देकर छात्रों, विद्वानों और संकाय के बीच संवाद और बहस के स्तर को बढ़ाया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. खालिद मुबश्शिर (विभाग उर्दू) ने किया। आर्किविस्ट डॉ. सैयद मोहम्मद अमीर ने कुर्रतुलऐन हैदर का परिचय देते हुए उनके प्रमुख लेखन और साहित्यिक योगदान को साझा किया। आर्किविस्ट स्निग्धा रॉय ने प्रो. आसिफ और उनके शैक्षणिक योगदान का परिचय दिया। कार्यक्रम का समापन असिस्टेंट आर्किविस्ट श्रध्दा शंकर द्वारा धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।
कुर्रतुलऐन हैदर (1928–2007) भारतीय उर्दू साहित्य की प्रमुख लेखिका थीं। उन्हें उत्कृष्ट गद्य शैली और बहुभाषी लेखन के लिए सराहा जाता है। उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी दोनों में लिखा, और उनके कार्य कई भारतीय भाषाओं में अनुवादित हैं। 1989 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार और 2005 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।





