पल्लव भट्टाचार्य
फिल्म 'हनुमान अंश' के अप्रत्याशित सिनेमैटिक चमत्कार नेजो एक साधारण शुरुआत से आगे बढ़ते हुए हाल के दिनों में बॉक्स ऑफिस के बड़े-बड़े कीर्तिमान ध्वस्त कर चुकी है,केवल व्यावसायिक रिकॉर्ड ही नहीं बदले हैं; बल्कि इसने आस्था की शाश्वत शक्ति पर एक गहन राष्ट्रीय और वैश्विक विमर्श को पुनः प्रज्वलित कर दिया है।
इस सांस्कृतिक तरंग के ठीक केंद्र में रहस्यमयी और प्रिय आध्यात्मिक विभूति नीम करोली बाबा हैं, जिन्हें श्रद्धालु स्नेहपूर्वक 'महाराजजी' कहते हैं। महाराजजी का सादगीपूर्ण और हनुमान जी के प्रति अनन्य भक्ति से परिपूर्ण जीवन आज भी भौगोलिक, सांस्कृतिक और भाषाई सीमाओं से परे लोगों को प्रेरित कर रहा है।
उत्तर प्रदेश में लगभग 1900 के आसपास जन्मे महाराजजी (जिनका मूल नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था) ने कोई औपचारिक धार्मिक ग्रंथ या लिपिबद्ध शास्त्र नहीं छोड़े। इसके बजाय, उनकी शिक्षाएं साधारण मानवीय आचरण से प्रकट हुईं,हर किसी से प्रेम करना, सभी की सेवा करना, भूखों को भोजन कराना और संपूर्ण सृष्टि में निहित एकरूपता को पहचानना।
उनका संदेश सादगी से भरा किंतु अत्यंत क्रांतिकारी था, जिसने आध्यात्मिक सिद्धांतों को व्यावहारिक करुणा में बदलकर हर मिलने वाले के हृदय को गहराई से स्पर्श किया। यह उनकी अत्यधिक विनम्रता, एक ऊनी कंबल, एक लकड़ी की खाट और लोगों को पूरी तरह से समझने व अपनाने की अद्भुत क्षमता का ही संगम था, जिसने भांति-भांति के साधकों को उनके सानिध्य में खींच लिया।
महाराजजी द्वारा प्रतिपादित प्रेम और सेवा के दर्शन में एक ऐसा सार्वभौमिक नैतिक मूल्य था जो स्वाभाविक रूप से भारत की सीमाओं को पार कर गया। इसने उन प्रमुख पश्चिमी विचारकों और साधकों के मन को मोह लिया जो गूढ़ सत्य की खोज में पूर्व की ओर आए थे।
इनमें रीचर्ड एल्पर्ट (Richard Alpert) भी शामिल थे, जो हार्वर्ड के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक थे और साइकेडेलिक अनुसंधान में गहराई से लगे हुए थे। संत से मिलने और 'राम दास' नाम प्राप्त करने के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। 1971की कालजयी आध्यात्मिक पुस्तक “बी हियर नाउ” (Be Here Now) जैसे अपने महान कार्यों के माध्यम से, राम दास ने भारतीय भक्ति के इस अंतरंग अनुभव को एक ऐसी भाषा में प्रस्तुत किया, जो पारंपरिक संस्थागत धर्मों से मोहभंग हो चुकी पश्चिमी पीढ़ी के लिए आसानी से समझ में आने योग्य थी।
इस सेतु ने महाराजजी के विचारों को पूरी तरह से अलग क्षेत्रों में पहुँचाया, जिसने संगीतकारों, वैज्ञानिकों और समाजसेवियों को समान रूप से प्रेरित किया। लैरी ब्रिलियंट (Larry Brilliant) जैसे व्यक्तियों ने इस आध्यात्मिक संदेश को व्यावहारिक सामाजिक कार्यों में बदला, जिसने चेचक (Smallpox) के उन्मूलन जैसे ऐतिहासिक वैश्विक जनस्वास्थ्य अभियानों को दिशा दी; वहीं अन्य लोगों ने ध्यान और साधना के अभ्यासों को शिक्षा और संस्थागत ढाँचों में समावेशित किया।
यहाँ तक कि स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग जैसी टेक-जगत की दिग्गज हस्तियाँ भी उनके हिमालयी आश्रमों के आध्यात्मिक वातावरण और प्रतीकात्मक शक्ति की ओर खिंची चली आईं, ताकि आधुनिक नवाचार की आपाधापी के बीच वे अपने मन की शांति पा सकें। यह अनोखा अंतर-सांस्कृतिक प्रवाह यह सिद्ध करता है कि सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान किसी आक्रामक धर्म-प्रचार या धार्मिक साम्राज्यों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह प्रामाणिक मानवीय जुड़ाव और साझा अनुग्रह की शांत, परिवर्तनकारी शक्ति पर टिका होता है।
समकालीन भक्ति गाथाओं और वृत्तांतों में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि नीम करोली बाबा के श्रद्धालुओं में हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी और बिना किसी औपचारिक धार्मिक विश्वास वाले लोग भी शामिल थे।
रफी अहमद किदवई (1894–1954) उन सर्वाधिक प्रतिष्ठित मुस्लिम सार्वजनिक हस्तियों में से हैं जिन्हें नीम करोली बाबा की परंपराओं में नियमित रूप से एक भक्त या आदरणीय प्रशंसक के रूप में पहचाना जाता है।
भक्तिपूर्ण जीवनियों के अनुसार, बाबा किदवई को एक संत-तुल्य व्यक्ति मानते थे और किदवई के निधन के बाद वे उनकी मज़ार पर भी गए थे—हालाँकि इस आध्यात्मिक संबंध का उल्लेख किदवई के आधिकारिक दस्तावेज़ों में स्पष्ट रूप से नहीं मिलता, इसलिए इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय बाबा के अनुयायियों द्वारा सहेजी गई एक परंपरा के रूप में देखा जाना चाहिए।
हबीब खान (जिन्हें बाद के विवरणों में हबीबुल्लाह खान भी कहा गया है) 1960और 1970के दशक की शुरुआत में ड्राइवर के रूप में नीम करोली बाबा से जुड़े एक भारतीय मुस्लिम थे और वे महाराजजी के अत्यंत निकट थे।
Hanuman Ansh - Neem Karoli Baba. 🙏🏽
— Pradnya (@PradnyaNayan) September 23, 2026
It is believed by countless devotees that Neem Karoli Baba’s life reflected an extraordinary devotion to Hanumanji.
His teachings were simple yet profound - love everyone, serve everyone, and remember God.
This AI-generated
source:fb pic.twitter.com/TnRIroycwT
यहाँ तक कि राम दास की प्रसिद्ध पुस्तक “मिरेकल ऑफ लव” (Miracle of Love),जो बाबा के संस्मरणों का एक प्रमुख संग्रह है—में भी एक गुमनाम मुस्लिम भक्त का स्पष्ट विवरण है, जिसने बाबा को अपने घर एक धार्मिक आयोजन में आमंत्रित किया था।
वहाँ उनके परिवार, मुस्लिम विद्वान और धार्मिक नेता कुरान की आयतों के पाठ और सूफी गायन के लिए एकत्र हुए थे। इसी तरह एक अन्य प्रसंग शेख मुजीबुर रहमान के एक छोटे भाई से जुड़ा है, जिन्होंने कथित तौर पर 1971में बाबा के दर्शन किए थे, जब मुजीब पश्चिम पाकिस्तान में कैद थे।
कहा जाता है कि बाबा ने उन्हें आश्वासन दिया था कि उनके भाई जल्द ही रिहा हो जाएंगे और नए देश का नेतृत्व करेंगे; इसके बाद जनवरी 1972में शेख मुजीब रिहा हुए और लौटकर बांग्लादेश के संस्थापक नेता बने।
हमारी समकालीन दुनिया में, जो भू-राजनीतिक तनावों, ध्रुवीकरण और पहचान, इतिहास व स्मृतियों की जटिल रेखाओं के कारण लगातार विभाजित हो रही है, नीम करोली बाबा का यह शाश्वत संदेश एक सशक्त आधार प्रदान करता है।
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ मानवता के सामने ऐसी साझी चुनौतियाँ हैं जिनके लिए अभूतपूर्व सहयोग की आवश्यकता है, फिर भी लोग अक्सर धर्म, क्षेत्र और विचारधारा के संकीर्ण दायरों में बँटकर दूर हो रहे हैं।

सच्ची सहनशीलता और सामूहिक समृद्धि भौतिक आडंबर या विभाजन से हासिल नहीं की जा सकती, बल्कि यह सार्वभौमिकता, परस्पर निर्भरता और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा को स्वीकार करने जैसे पारंपरिक मूल्यों से ही संभव है।
जब अध्यात्म को कट्टरता से मुक्त करके केवल सेवा, आतिथ्य और सहानुभूति के रूप में व्यक्त किया जाता है, तो यह एक शक्तिशाली एकजुट करने वाली शक्ति बन जाता है जो समुदायों के घावों को भरता है और अलगाव के बंधनों को तोड़ता है।
'हनुमान अंश' की यात्रा और महाराजजी की वैश्विक विरासत हमें याद दिलाती है कि तमाम सीमाओं के पार, हमारी साझी चिंताएँ और भविष्य के साझें सपने लोगों को एक साथ लाने की असीम क्षमता रखते हैं।
करुणा और सामूहिक कल्याण पर आधारित दृष्टिकोण को अपनाकर ही मानवता समान धरातल खोज सकती है, ऐतिहासिक घावों को भर सकती है और आशा, शांति व साझी नियति की एक नई भावना के साथ आगे बढ़ सकती है।