आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
बचपन में हममें से कई लोगों को बताया जाता है कि बाल गीले होने पर बाहर निकलने से सर्दी लग जाती है। बड़े होने पर भी हम बाहर जाने से पहले बाल अच्छी तरह सुखाने में अतिरिक्त समय लगा देते हैं।
अंग्रेजी भाषी देशों में कई ऊंची इमारतों में 13वीं मंजिल को अंकित नहीं किया जाता, जबकि पूर्वी एशिया में अक्सर चौथी मंजिल को छोड़ दिया जाता है।
यदि जिस खिलाड़ी का मैं समर्थन करता हूं और वह लगातार जीत रहा हो तथा कोई कमेंटेटर उसका जिक्र कर दे, तो मुझे लगता है कि अब अपशगुन हो जाएगा और उसकी जीत का सिलसिला टूट जाएगा।
ये सब अंधविश्वास और पारंपरिक मान्यताएं हैं। विज्ञान के प्रति जागरूक समाज होने के बावजूद ये मान्यताएं कायम रहती हैं।
सवाल यह है कि ऐसा क्यों होता है और क्या इसमें कोई नुकसान है?
ऐसी कई मान्यताओं की जड़ें पुराने चिकित्सा और सांस्कृतिक विश्वासों में हैं। प्राचीन यूनानी और चीनी चिकित्सा में स्वास्थ्य को शरीर और पर्यावरण के संतुलन से जोड़ा जाता था। तापमान को बीमारी का कारण माना जाता था।
आज विज्ञान स्पष्ट करता है कि सर्दी-जुकाम का मुख्य कारण वायरस है। हालांकि कुछ शोध बताते हैं कि ठंड में शरीर वायरस के प्रति थोड़ा अधिक संवेदनशील हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गीले बाल ही बीमारी का कारण बनते हैं।
मनोविज्ञान बताता है कि मनुष्य स्वभाव से “सेंस-मेकिंग” प्राणी है—यानी वह हर घटना की व्याख्या करना चाहता है। यह प्रेरणा भूख या अकेलेपन जैसी मूल मानवीय जरूरतों के समान हो सकती है। लेकिन व्याख्या करने की यह इच्छा सही निष्कर्ष की गारंटी नहीं देती। हमारा ज्ञान अलग-अलग स्रोतों से आया बिखरा हुआ “पज़ल” होता है—कुछ विज्ञान की कक्षा से, कुछ पारिवारिक परंपराओं से। जरूरत पड़ने पर हम इन टुकड़ों को जोड़कर निष्कर्ष निकाल लेते हैं, भले ही वे पूरी तरह वैज्ञानिक न हों।