मधुमेह बढ़ा सकता है लिवर रोग का खतरा

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 22-06-2026
Diabetes can increase the risk of liver disease.
Diabetes can increase the risk of liver disease.

 

नई दिल्ली।

टाइप-2 मधुमेह (डायबिटीज) केवल रक्त शर्करा को प्रभावित करने वाली बीमारी नहीं है, बल्कि यह शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों पर भी गंभीर असर डाल सकती है। एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि मधुमेह से पीड़ित बड़ी संख्या में लोगों में लिवर की क्षति बिना किसी स्पष्ट लक्षण के मौजूद हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति भविष्य में सिरोसिस, लिवर फेलियर और यहां तक कि लिवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है।

यह निष्कर्ष ‘डायफिब-लिवर अध्ययन’ से सामने आए हैं, जो प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट रीजनल हेल्थ–साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि हृदय, गुर्दे और आंखों की बीमारियों की तरह लिवर रोग को भी मधुमेह की एक प्रमुख जटिलता माना जाना चाहिए।

अध्ययन में क्या पाया गया?

शोधकर्ताओं ने भारत के विभिन्न हिस्सों से टाइप-2 मधुमेह से पीड़ित 9,200 से अधिक वयस्कों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य लिवर फाइब्रोसिस की जांच करना था। फाइब्रोसिस वह स्थिति है जिसमें स्वस्थ लिवर ऊतक धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त ऊतक में बदलने लगता है।

अध्ययन के परिणाम चिंताजनक रहे। लगभग 26 प्रतिशत प्रतिभागियों में चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण लिवर फाइब्रोसिस पाया गया, जबकि 14 प्रतिशत लोगों में उन्नत स्तर का फाइब्रोसिस मौजूद था। इतना ही नहीं, लगभग 5 प्रतिशत प्रतिभागियों में संभावित सिरोसिस के संकेत मिले, जबकि उन्हें किसी प्रकार के स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं हो रहे थे।

फैटी लिवर से भी आगे की समस्या

अध्ययन में यह भी सामने आया कि लगभग दो-तिहाई प्रतिभागियों के लिवर में अतिरिक्त वसा जमा थी। इस स्थिति को अब मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) कहा जाता है।

हालांकि शोधकर्ताओं को सबसे अधिक आश्चर्य इस बात से हुआ कि लिवर फाइब्रोसिस केवल फैटी लिवर वाले मरीजों तक सीमित नहीं था। कुछ ऐसे मरीज भी मिले जिनके लिवर में अतिरिक्त वसा नहीं थी, लेकिन उनमें गंभीर फाइब्रोसिस के संकेत मौजूद थे। इससे पता चलता है कि लिवर की क्षति लंबे समय तक बिना किसी चेतावनी के विकसित हो सकती है।

मधुमेह और लिवर रोग का संबंध

विशेषज्ञों के अनुसार, टाइप-2 मधुमेह, इंसुलिन प्रतिरोध, मोटापा और लगातार उच्च रक्त शर्करा का स्तर लिवर में वसा जमा होने का कारण बनते हैं। समय के साथ यह वसा सूजन और ऊतक क्षति को बढ़ाती है, जो फाइब्रोसिस और अंततः सिरोसिस में बदल सकती है।

नियमित जांच क्यों जरूरी?

शोधकर्ताओं ने फाइब्रोस्कैन नामक एक आधुनिक और गैर-आक्रामक जांच तकनीक का उपयोग किया। यह परीक्षण लिवर की कठोरता को मापकर फाइब्रोसिस का पता लगाता है और इसके लिए बायोप्सी की आवश्यकता नहीं होती।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मधुमेह रोगियों की नियमित रूप से लिवर जांच की जाए, तो गंभीर क्षति होने से पहले ही बीमारी की पहचान और उपचार संभव है। इसलिए मधुमेह से पीड़ित लोगों को केवल शुगर नियंत्रण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि समय-समय पर लिवर की जांच भी करानी चाहिए।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण और मधुमेह का सही प्रबंधन लिवर को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।