क्यों अमन का महीना कहलाता है मुहर्रम

Story by  फिरदौस खान | Published by  [email protected] | Date 20-06-2026
Why is Muharram known as the month of peace?
Why is Muharram known as the month of peace?

 

डॉ. फ़िरदौस ख़ान

इस्लामी कैलेंडर में मुहर्रम का महीना बेहद पाक और पवित्र माना जाता है। यह साल के उन चार विशेष महीनों में शुमार है जिनमें किसी भी तरह की जंग या लड़ाई पर पूरी तरह पाबंदी लगाई गई है। इसी वजह से मुहर्रम को असल में अमन और शांति का महीना कहा जाता है। यह पूरा महीना हमें तौहीद, दिल की पाकीज़गी, बड़े से बड़े त्याग, इंसाफ़ और सब्र की सीख देता है। इन्हीं रास्तों पर चलकर कोई भी इंसान अपने परवरदिगार की रज़ा और उसकी मर्जी हासिल कर सकता है। मुहर्रम का इतिहास आज के दौर में भी इंसानियत को सही राह दिखाने का दम रखता है।

तौहीद का सीधा और सरल मतलब है एकेश्वरवाद। इसका अर्थ है केवल एक अल्लाह की इबादत करना और उसके बताए नियमों के मुताबिक अपनी जिंदगी गुजारना। अल्लाह के आखिरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर जो आसमानी किताब यानी पवित्र क़ुरआन नाजिल हुई, उसमें तौहीद का जिक्र बहुत गहराई से मिलता है।

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इसके साथ ही हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की वसीयत भी हमें एक बेहतरीन और आदर्श जीवन जीने का तरीका सिखाती है। एक ऐसी जिंदगी जो सिर्फ नेकी, भलाई और सच्चाई के रास्ते पर चलकर गुजारी जाए। इस बात का प्रमाण हज़रत अबू जाफ़र मुहम्मद बिन जरीर अत्तबरी की मशहूर किताब ‘तारीख़-ए-तबरी’ समेत कई पुरानी ऐतिहासिक किताबों में साफ तौर पर मिलता है।

पाकीज़गी की बात करें तो इसका मतलब सिर्फ अच्छे और साफ़-सुथरे कपड़े पहनना या खुद को बाहरी तौर पर साफ रखना नहीं है। पाकीज़गी का असली मतलब खुद को दुनिया की तमाम बुराइयों, लालच और गलत कामों से बचाकर रखना है।

बाहरी सफाई से कहीं ज्यादा जरूरी मन की अंदरूनी सफाई होती है। कर्बला का ऐतिहासिक वाकया हमेशा बुराई के खिलाफ अच्छाई की सबसे बड़ी जीत के रूप में याद किया जाता है। उस समय का शासक यज़ीद खुद के हक पर होने का झूठा दावा कर रहा था।

सत्ता के लालच में विद्वानों का एक बड़ा दल भी उसके साथ खड़ा हो गया था। यज़ीद ने अपने राज्य में जुआ, शराब और ब्याज जैसी तमाम सामाजिक बुराइयों को खुलेआम बढ़ावा देना शुरू कर दिया था। हालांकि इस्लाम धर्म में इन सभी चीजों को पूरी तरह हराम यानी प्रतिबंधित माना गया है।

वह आम जनता पर बहुत जुल्म भी कर रहा था। ऐसे माहौल में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उसके इस अन्याय और अत्याचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। यज़ीद ने उन पर अपनी अधीनता स्वीकार करने का दबाव बनाया लेकिन इमाम हुसैन ने उसके सामने झुकने से साफ इनकार कर दिया। इस बात से गुस्सा होकर यज़ीद ने उन्हें खत्म करने का फरमान जारी कर दिया।

कर्बला के मैदान में अल्लाह के आखिरी रसूल के प्यारे नवासे हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने सत्य की रक्षा के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों की यह महान कुर्बानी दुनिया को संदेश देती है कि इंसान को हमेशा सच के रास्ते पर ही आगे बढ़ना चाहिए। चाहे इस रास्ते पर कितनी ही मुश्किलें, कांटे या मुसीबतें क्यों न आएं, पैर पीछे नहीं खींचने चाहिए।

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असल में देखा जाए तो इस्लाम का सच्चा पैगाम कर्बला के इस घटनाक्रम में ही छिपा हुआ है। कर्बला की इस घटना ने हमेशा के लिए साबित कर दिया कि कौन सच के साथ खड़ा है और कौन अपने निजी फायदे के लिए धर्म का ढोंग कर रहा था।

कर्बला का यह पूरा वाकया इस्लाम की हिफाजत का सबसे मजबूत स्तंभ साबित हुआ। अगर कोई इंसान इस्लाम को सही मायने में समझना चाहता है तो उसके लिए कर्बला के इतिहास को गहराई से जानना बेहद जरूरी है। इसके बिना इसे समझना मुमकिन ही नहीं है।

इस ऐतिहासिक मोड़ ने कयामत तक के लिए सच और झूठ के बीच एक ऐसी साफ लकीर खींच दी जिससे साफ पता चलता है कि कौन सही रास्ते पर है और कौन गुमराह हो चुका है। इस घटना ने दुश्मनों के चेहरों से नकाब हटा दिया था।

पवित्र क़ुरआन में साफ कहा गया है कि हर जानदार को एक न एक दिन मौत का स्वाद चखना ही है। यानी जो इस दुनिया में आया है उसका जाना तय है। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि जब हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मुहर्रम का चांद देखा तो उनकी जुबान से सबसे पहले यही शब्द निकले कि हम सब अल्लाह के हैं और उसी की तरफ लौटकर जाने वाले हैं।

इमाम हुसैन का मानना था कि हक और सच की राह में मरना बहुत आसान और सुकून देने वाला होता है। सम्मान की मौत ही असल में वास्तविक जिंदगी है जबकि जिल्लत और गुलामी की जिंदगी किसी बदतर मौत से कम नहीं होती।

मुहर्रम हमें हर तरह के अन्याय के खिलाफ खड़े होने का हौसला देता है। हज़रत इमाम हुसैन, उनके परिवार के सदस्य और उनके वफादार साथी आखिरी सांस तक सच्चाई के साथ डटे रहे। उन्होंने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी लेकिन कभी किसी गलत व्यवस्था या जुल्म का समर्थन नहीं किया। उनका एकमात्र मकसद अपने नाना के दिखाए शांति के रास्ते की रक्षा करना था। वे समाज में फैली बुराइयों को खत्म कर लोगों को अच्छाई की तरफ लाना चाहते थे।

सब्र यानी धैर्य की अगर बात की जाए तो कर्बला का रेगिस्तान इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। वहां हज़रत इमाम हुसैन, उनका परिवार और साथी तपती धूप में तीन दिनों तक भूखे-प्यासे रहे। छोटे-छोटे मासूम बच्चे पानी की एक-एक बूंद के लिए तड़प रहे थे लेकिन इसके बाद भी किसी ने धैर्य का साथ नहीं छोड़ा।

उन्हें बहुत बेरहमी से शहीद किया गया। हालात इतने दर्दनाक थे कि उन्हें सही समय पर पानी और कफ़न तक नसीब नहीं हुआ। इस भयंकर संकट के बाद भी पूरे परिवार ने अपने ईश्वर पर अटूट भरोसा बनाए रखा और उसकी मर्जी को ही अपना भाग्य माना।

हज़रत इमाम हुसैन कभी भी युद्ध या खून-खराबा नहीं चाहते थे। वे हमेशा शांति से बातचीत के जरिए किसी भी विवाद को सुलझाने के पक्ष में थे। कर्बला की इस घटना को पारंपरिक युद्ध कहना बिल्कुल गलत होगा क्योंकि युद्ध हमेशा दो बराबर की फौजों के बीच लड़ा जाता है।

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यह तो एकतरफा हमला और जुल्म की पराकाष्ठा थी। एक तरफ इमाम हुसैन के साथ महज 123 लोग थे जिनमें छोटे बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और बीमार शामिल थे। दूसरी तरफ यज़ीद की एक बहुत बड़ी और हथियारों से लैस सेना खड़ी थी।

जब हमला तय हो गया तो इमाम हुसैन ने अपने साथियों से कहा कि जो जाना चाहता है वह रात के अंधेरे में जा सकता है। लेकिन उनके वफादार साथियों ने उनका साथ छोड़ने से मना कर दिया। उन्होंने साबित किया कि सिद्धांतों के लिए जान देना भी पड़े तो वे पीछे नहीं हटेंगे।

इमाम हुसैन को अंत में केवल अपनी आत्मरक्षा के लिए ही तलवार उठानी पड़ी थी। इससे यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि इस्लाम ने हमेशा अमन और भाईचारे को ही प्राथमिकता दी है। जंग तो हमेशा उस पर जबरन थोपी गई है। मुहर्रम का यह पूरा महीना आज भी हर इंसान को अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर पूरे समाज और मानवता की भलाई के लिए काम करने की सबसे बड़ी सीख देता है।

 (लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)