Technology can verify the authenticity of photographs, but will it solve the problem of fake images?
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
किसी दावे की पुष्टि करनी हो तो इंटरनेट पर लोग कभी कहा करते थे, ‘‘तस्वीर दिखाओ, तभी मानेंगे।’’ लेकिन तकनीक ने अब यह स्थिति बदल दी है।
आज हम अक्सर ऐसी तस्वीरों और वीडियो से रूबरू होते हैं, जिनमें अविश्वसनीय और काल्पनिक चीजें वास्तविक नजर आती हैं। वैश्विक नेताओं को ऐसी बातें कहते हुए दिखाया जाता है, जो उन्होंने कभी कही ही नहीं। सार्वजनिक हस्तियां ऐसे नकली उत्पादों का समर्थन करती नजर आती हैं, जिनसे उनका कोई लेना-देना नहीं होता। यहां तक कि ऐसी आपदाएं भी हमारी आंखों के सामने घटती दिखाई देती हैं, जो वास्तव में हुई ही नहीं।
अब कोई भी व्यक्ति कृत्रिम मेधा (एआई) की मदद से अलग-अलग उद्देश्यों के लिए वास्तविक जैसी दिखने वाली तस्वीरें और वीडियो बना सकता है। इससे दृश्य साक्ष्य की प्रकृति और तस्वीरों तथा वीडियो के साथ हमारे जुड़ाव में व्यापक बदलाव आया है।
इंटरनेट पर एआई से तैयार हो रही बेतहाशा भ्रामक सामग्री संस्थाओं के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर कर रही है, संसाधनों की भारी बर्बादी कर रही है और लोगों को धोखाधड़ी का शिकार बनाकर उनकी मेहनत की कमाई हड़प रही है।
ऐसे में सवाल उठता है कि एआई के दौर में हम किन तस्वीरों पर भरोसा कर सकते हैं? और इस चुनौती से निपटने के लिए लोग और संस्थाएं क्या कदम उठा रही हैं?