नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने खनिजों के औसत बिक्री मूल्य (एवरेज सेल प्राइस-एएसपी) की गणना में रॉयल्टी, जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ) और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण न्यास (एनएमईटी) के अंशदान को बिक्री मूल्य का हिस्सा मानने वाले नियमों की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था राजस्व की चोरी रोकने और खनिज कीमतों में हेरफेर पर अंकुश लगाने के लिए बनाई गई एक वैध नियामकीय व्यवस्था है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने किरलोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और एक अन्य याचिकाकर्ता की याचिका खारिज करते हुए कहा कि खनिज (परमाणु और हाइड्रोकार्बन ऊर्जा खनिजों को छोड़कर) रियायत नियम, 2016 के नियम 38 और खनिज संरक्षण एवं विकास नियम, 2017 के नियम 45(8)(ए) के तहत जोड़े गए स्पष्टीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(जी) का उल्लंघन नहीं करते और न ही वे खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (एमएमडीआर अधिनियम) की धारा 9 के विपरीत हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवादित प्रावधान केवल बिक्री मूल्य की गणना की पद्धति तय करते हैं, जो औसत बिक्री मूल्य (एएसपी) निर्धारित करने का एक आधार है। इससे न तो रॉयल्टी की प्रकृति बदलती है और न ही उसकी दर में कोई वृद्धि होती है।
अदालत ने माना कि केंद्र सरकार द्वारा अपनाई गई यह प्रणाली रॉयल्टी और अन्य वैधानिक देयों की चोरी रोकने के उद्देश्य से तार्किक और उचित है।
फैसले में कहा गया कि लौह अयस्क पर एमएमडीआर अधिनियम की धारा 9 के तहत एएसपी का 15 प्रतिशत रॉयल्टी देय है। नियमों में केवल यह स्पष्ट किया गया है कि रॉयल्टी, डीएमएफ और एनएमईटी के मद में किए गए भुगतान को बिक्री मूल्य से घटाया नहीं जाएगा। इसलिए इसे नई वसूली नहीं, बल्कि गणना की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाएगा।
पीठ ने केंद्र सरकार की इस दलील को स्वीकार किया कि लौह अयस्क का एएसपी खनन कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराए गए बाजार आंकड़ों पर आधारित होता है, जिससे मूल्य में हेरफेर की आशंका रहती है।
सरकार ने अदालत के समक्ष ऐसे आंकड़े और रिकॉर्ड पेश किए, जिनसे पता चलता है कि कुछ मामलों में खनन कंपनियों ने कम मात्रा की आपूर्ति पर अधिक एक्स-माइन कीमत और अधिक मात्रा की आपूर्ति पर कम कीमत दिखाई, जिससे औसत बिक्री मूल्य कृत्रिम रूप से कम हो गया और रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम तथा अन्य देयों का भुगतान भी घट गया।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि केंद्र सरकार ने कोयले के मामले में रॉयल्टी, डीएमएफ और एनएमईटी को गणना से बाहर कर दिया है, जबकि लौह अयस्क के लिए पुरानी व्यवस्था जारी रखी गई है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोयला और लौह अयस्क की मूल्य निर्धारण प्रणालियां पूरी तरह अलग हैं। कोयले की रॉयल्टी राष्ट्रीय कोयला सूचकांक (नेशनल कोल इंडेक्स) से जुड़ी है, जबकि लौह अयस्क का एएसपी बाजार के आंकड़ों के आधार पर तय होता है। इसलिए दोनों की तुलना करना "सेब और संतरे की तुलना" करने जैसा है।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि बिक्री मूल्य में रॉयल्टी, डीएमएफ और एनएमईटी को शामिल करने से 'रॉयल्टी पर रॉयल्टी' की स्थिति बनती है और संसद द्वारा निर्धारित सीमा से अधिक रॉयल्टी वसूली जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सरकार को बिक्री मूल्य के घटकों को निर्धारित करने का अधिकार है, ताकि मूल्य में हेरफेर और राजस्व की चोरी रोकी जा सके। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक राजस्व की सुरक्षा के लिए ऐसी गणना पद्धति अपनाना पूरी तरह वैध है।
पीठ ने कहा कि आर्थिक और राजकोषीय नीतियों के मामलों में अदालतों को अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए। यदि कोई व्यवस्था कर या राजस्व की चोरी रोकने के उद्देश्य से बनाई गई है, तो उसमें न्यायिक संयम बरतना आवश्यक है।
अदालत ने लैटिन सिद्धांत "Salus populi suprema lex" (जनकल्याण ही सर्वोच्च कानून है) का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक हित और सरकारी राजस्व की रक्षा के लिए कुछ परिस्थितियों में व्यक्तिगत हितों को पीछे रखना पड़ सकता है।
याचिकाकर्ताओं ने प्रवीण कुमार समिति और डॉ. अरुणा शर्मा समिति की उन सिफारिशों का भी हवाला दिया था, जिनमें कथित 'कैस्केडिंग इफेक्ट' को समाप्त करने की बात कही गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समिति की रिपोर्टें केवल सिफारिशात्मक होती हैं और उनके आधार पर किसी वैधानिक प्रावधान की संवैधानिक वैधता तय नहीं की जा सकती।
मामला तब सामने आया जब केंद्र सरकार ने विभिन्न परामर्शों और समितियों की सिफारिशों के बावजूद नियमों में संशोधन नहीं किया। इसके बाद किरलोस्कर फेरस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने 2016 और 2017 के नियमों में जोड़े गए स्पष्टीकरण को चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए केंद्र सरकार की रॉयल्टी गणना प्रणाली को वैध ठहराया और एमएमडीआर व्यवस्था के तहत लागू मौजूदा नियमों को बरकरार रखा।