मलिक असगर हाशमी
हमारे देश में पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर काम करने वाली महिलाएं उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं। इसी फेहरिस्त में एक उभरता हुआ नाम उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले की हिना सैफी का है। हिना एक बेहद साधारण और छोटे से गांव से आती हैं। आज वे देशभर में घूम-घूमकर जिस तरह से पर्यावरण संरक्षण और क्लाइमेट चेंज को लेकर अलख जगा रही हैं वह वाकई काबिलेतारीफ है।
मेरठ के एक प्रतिष्ठित संस्थान से एमबीए की पढ़ाई पूरी करने वाली 25वर्षीय हिना सैफी अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहती हैं कि शुरुआत में यह काम बिल्कुल असंभव सा लगता था। फिर धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए और कारवां बनता चला गया। आज उनकी संस्था ने पूरे देश में अपनी एक खास पहचान बना ली है।
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित सिसोला गांव की रहने वाली हिना सैफी को संयुक्त राष्ट्र भारत के नए अभियान #WeTheChangeNow में देश के 17युवा जलवायु परिवर्तन नेताओं की सूची में शामिल किया गया है। वे इस वैश्विक अभियान का एक प्रमुख चेहरा बन चुकी हैं।
संयुक्त राष्ट्र की इस खास पहल का मुख्य उद्देश्य भारत के युवा पर्यावरण प्रेमियों द्वारा तैयार किए गए जमीनी समाधानों को पूरी दुनिया के सामने लाना है। हिना साल 2018से ही '100%उत्तर प्रदेश अभियान' और 'द क्लाइमेट एजेंडा' जैसी प्रतिष्ठित मुहिमों से जुड़कर काम कर रही हैं।

हिना सैफी का पक्का मानना है कि अगर समाज में पर्यावरण को लेकर जागरूकता आ जाए तो हम प्रकृति को काफी हद तक बेहतर बना सकते हैं। ऐसा तभी मुमकिन है जब आम लोग खुद आगे बढ़कर जलवायु के अनुकूल आदतों और व्यावहारिक बदलावों को अपनाएंगे।
यही वजह है कि हिना ने ग्रामीण स्तर पर लोगों को एकजुट करने और उनमें चेतना जगाने को अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य बना लिया है। हिना को पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने की सबसे बड़ी प्रेरणा अपने ही गांव की दयनीय स्थिति को देखकर मिली थी। उन्होंने देखा कि गांव में वायु प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा था और लोगों में पर्यावरण को लेकर कोई समझ नहीं थी।
वे मानती हैं कि लोगों के रोजमर्रा के व्यवहार को बदलने के लिए जमीनी स्तर पर सक्रिय रहना बेहद जरूरी है। इसके लिए वे अपने साथियों के साथ मिलकर 'स्वच्छ हवा के लिए मार्च' निकालती हैं। वे गांव-गांव जाकर पर्चे बांटती हैं और जनसभाओं का आयोजन करती हैं।
इसके अलावा वे घर-घर जाकर लोगों से निजी तौर पर मिलती हैं और पर्यावरण से जुड़े सर्वे करती हैं। हिना वायु प्रदूषण के स्थाई समाधान के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरणों के इस्तेमाल पर जोर देती हैं। वे ग्रामीण इलाकों में सौर पंप लगाने और सामुदायिक भवनों की छतों पर सोलर पैनल लगाने के लिए लगातार अभियान चला रही हैं।
हिना सैफी द्वारा चलाए जा रहे ये तमाम जमीनी प्रयास देश के 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान' यानी एनडीसी के लक्ष्यों को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। भारत सरकार ने साल 2030तक देश की कुल ऊर्जा क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी को बढ़ाकर 40फीसदी तक पहुंचाने का एक बड़ा लक्ष्य रखा है। हिना वर्तमान में मेरठ के एक स्थानीय गैर सरकारी संगठन 'एन ब्लॉक' के साथ मिलकर अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रही हैं।

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जारी इस लड़ाई में हिना सैफी के साथ देश के 16अन्य युवा चैंपियन भी शामिल हैं। ये सभी युवा संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक वेबसाइट पर अपनी संघर्ष और सफलता की कहानियां साझा कर रहे हैं। इनका मकसद देश के अन्य युवाओं को भी इस मुहिम से जुड़ने के लिए प्रेरित करना है। 'वी द चेंज' आंदोलन के ये चेहरे आज पूरी दुनिया को जलवायु न्याय और पर्यावरण संरक्षण की एक नई राह दिखा रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव की सतत विकास लक्ष्यों की एडवोकेट और मशहूर अभिनेत्री दीया मिर्ज़ा ने भी इस डिजिटल अभियान की सराहना की है। दीया मिर्ज़ा का कहना है कि हिना और उनके साथियों की कहानियों ने उन्हें काफी प्रभावित किया है। उन्हें उम्मीद है कि इन युवाओं से प्रेरणा लेकर देश के दूसरे लोग भी पर्यावरण बचाने में अपना योगदान देंगे।
भारत में संयुक्त राष्ट्र की रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर डिएड्रे बॉयड के मुताबिक यह अभियान हमें जलवायु संकट से लड़ने के लिए नए और व्यावहारिक नजरिए अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। इस अभियान के जरिए देश की विभिन्न राज्य सरकारों और स्थानीय समुदायों को बड़े कदम उठाने की प्रेरणा मिलेगी। यह पूरी मुहिम युवाओं द्वारा शुरू किए गए उन नवाचारों का जश्न मनाती है जो प्रकृति के अनुकूल और टिकाऊ हैं।
हिना सैफी की निजी जिंदगी की कहानी भी बेहद संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक रही है। सिसोला गांव में सिर्फ आठवीं कक्षा तक का ही एक सरकारी स्कूल है। हिना के माता-पिता उसे आगे की पढ़ाई के लिए गांव से बाहर भेजने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे। ऐसे समय में उनकी मां ने उनका साथ दिया और आगे की पढ़ाई के लिए खतौली में उनकी मौसी के घर भेज दिया।
वहां से हिना ने दसवीं की परीक्षा पास की। इसके बाद बारहवीं की पढ़ाई पूरी करना भी एक बड़ी चुनौती थी। तब 'एन ब्लॉक' संस्था के मुकेश कुमार ने उनके परिवार को समझाकर हिना को कॉलेज भेजने के लिए राजी किया।
सिसोला गांव की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। गांव के ज्यादातर पुरुष पत्थर की खदानों में मजदूरी करते थे। वहीं दूसरी तरफ महिलाएं और छोटे बच्चे स्थानीय फुटबॉल फैक्ट्रियों में काम करते थे। वहां एक फुटबॉल की सिलाई करने के बदले महज 20रुपये मजदूरी मिलती थी।
हिना बताती हैं कि उनके गांव में गरीबी के कारण बाल श्रम एक आम बात थी। आठवीं के बाद उन्हें भी पढ़ाई छोड़ने की सलाह दी गई थी। लेकिन वे अपने फैसले पर अडिग रहीं। अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए हिना ने खुद भी फुटबॉल फैक्ट्री में पार्ट-टाइम काम किया।
बचपन के इसी माहौल ने हिना को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने देखा कि अशिक्षा के कारण गांव में चारों तरफ गंदगी फैली रहती थी। लोग कूड़ा-कचरा तालाबों और नदियों में फेंक देते थे या उसे खुले में जला देते थे। गांव में शौचालयों की भारी कमी थी और लोग खुले में शौच जाने को मजबूर थे। नालियां हमेशा कीचड़ से उफनती रहती थीं। हिना को समझ आ गया था कि अगर गांव को बदलना है तो सबसे पहले बच्चों को स्कूल भेजना होगा। उन्होंने अपनी शिक्षिकाओं के साथ मिलकर घर-घर जाकर माता-पिता को मनाया।

साल 2018में हिना अपने गांव की पहली ऐसी लड़की बनीं जो पर्यावरण कार्यशाला में हिस्सा लेने लखनऊ गईं। वहां उन्होंने वायु प्रदूषण और एयर क्वालिटी इंडेक्स की बारीकियों को समझा। इसके बाद उन्होंने गांव लौटकर महिलाओं और बच्चों की छोटी-छोटी टोलियां बनाईं। हिना ने 20लड़कियों का एक विशेष समूह तैयार किया जो गांव में पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम चलाता है। 'विमेन क्लाइमेट कलेक्टिव' के मंच से जुड़कर आज वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं।
हिना ने हाल ही में ग्रामीण इलाकों के लिए 'सूरज से समृद्धि' नाम की एक नई मुहिम शुरू की है। इस मुहिम के तहत वे ग्रामीणों को ग्रिड से अलग सौर ऊर्जा प्रणालियों के फायदे समझा रही हैं। वे स्कूली बच्चों के बीच जाकर पोस्टर मेकिंग और भाषण प्रतियोगिताओं का आयोजन भी करती हैं ताकि बचपन से ही बच्चों में पर्यावरण के प्रति प्रेम पैदा हो सके। वे कहती हैं कि किसी भी सामाजिक बदलाव में महिलाओं की भूमिका सबसे अहम होती है क्योंकि पर्यावरण संकट का सबसे पहला और सीधा असर उन्हीं पर पड़ता है।

आज हिना के प्रयासों से सिसोला गांव की तस्वीर काफी बदल चुकी है। अब गांव के माता-पिता अपनी बेटियों को बाहर के कॉलेजों में पढ़ने भेजने से नहीं हिचकिचाते। गांव की सड़कों पर सफाई दिखने लगी है और कचरे का निपटान भी बेहतर तरीके से हो रहा है। हिना अक्सर गांव के प्रधान के साथ मिलकर नई विकास योजनाओं पर चर्चा करती हैं।
मेरठ के एक पिछड़े गांव से निकलकर संयुक्त राष्ट्र के मंच तक पहुंचने वाली हिना सैफी की यह यात्रा देश की हर उस लड़की के लिए एक मिसाल है जो तमाम बंदिशों को तोड़कर समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाना चाहती है।