'स्पाइडरमैन' और नोलन ने जहां पी चाय: जानिए, मुंबई के ईरानी समुदाय और 108 साल पुराने कॉफी हाउस की कहानी

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 14-07-2026
Where Spider-Man and Nolan Had Tea: The Story of Mumbai's Irani Cafés
Where Spider-Man and Nolan Had Tea: The Story of Mumbai's Irani Cafés

 

मलिक असरग हाशमी

मुंबई का कोलाबा इलाका हमेशा से अपनी चहल-पहल के लिए जाना जाता है। मगर 11 जुलाई 2026 की सुबह यहाँ कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। हॉलीवुड के दिग्गज डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन अपनी नई फिल्म 'द ओडिसी' के इंडिया प्रीमियर के लिए मुंबई आए हुए थे। उनके साथ 'स्पाइडर-मैन' फेम टॉम हॉलैंड और सुपरस्टार मैट डेमन भी थे। इंटरव्यू और स्क्रीनिंग के व्यस्त शेड्यूल के बीच इन तीनों सितारों ने कुछ वक्त निकाला। वे सीधे पहुंच गए शहीद भगत सिंह रोड पर स्थित 108 साल पुराने 'ओलंपिया कॉफी हाउस एंड रेस्टोरेंट' में। वहां उन्होंने मुंबई की मशहूर दूध वाली कड़क चाय और ताज़ा बन-मस्का का लुत्फ उठाया।

यह विज़िट इतनी अचानक थी कि रेस्टोरेंट के मैनेजर इनायत मारेडिया भी शुरुआत में उन्हें पहचान नहीं पाए। दरअसल ,इन सितारों के कुछ मेहमान दोपहर ढाई बजे ही आकर कैफे के बाहर इंतजार कर रहे थे। मैनेजर को लगा कि कोई आम ग्राहक होंगे। जब तीनों हॉलीवुड स्टार्स आए तो उन्होंने बेहद सादगी से चाय-नाश्ता किया।

करीब 10 से 15 मिनट रुकने के बाद जब वहां भीड़ बढ़ने लगी तो वे अपने बॉडीगार्ड्स के साथ निकल गए। उनके जाने के बाद जब मैनेजर ने इंटरनेट पर सर्च किया तब उन्हें पता चला कि साधारण तरीके से चाय पीने आया वह लड़का दुनिया भर में मशहूर 'स्पाइडर-मैन' है। इस दिलचस्प वाकये ने एक बार फिर मुंबई के ऐतिहासिक ईरानी कैफे और यहाँ सदियों से बसे ईरानी समुदाय को चर्चा में ला दिया है।

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क्या है ओलंपिया कॉफी हाउस का इतिहास और मेनू?

गेटवे ऑफ इंडिया और ताज महल पैलेस होटल से चंद कदमों की दूरी पर स्थित ओलंपिया कॉफी हाउस मुंबई की जीती-जागती विरासत है। इस कैफे की शुरुआत साल 1918 में एक ईरानी बिजनेसमैन सैयद मोहम्मद मेराब् ने की थी।

शुरुआती दौर में यह केवल एक रेस्टोरेंट नहीं था बल्कि एक जनरल स्टोर भी था। यहाँ राशन, साबुन, बिस्कुट और टॉफियां भी बिका करती थीं। साल 1954 में सैयद मोहम्मद मेराब् ने इस रेस्टोरेंट को अपने ही चार वफादार कर्मचारियों को बेच दिया और खुद ईरान लौट गए। इन कर्मचारियों में अब्दुल रहीम सुलेमान, अब्दुल रहीम चौधरी, गुलाम रसूल और वली मोहम्मद शामिल थे।

आज इस रेस्टोरेंट को उन्हीं कर्मचारियों की तीसरी पीढ़ी संभाल रही है। 30 साल के अमीर चौधरी अपने तीन पार्टनर्स के साथ मिलकर इसे चलाते हैं। अमीर बताते हैं कि उनके दादाजी गुजरात से रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई आए थे। यह एक इत्तेफाक था कि चारों को इसी कैफे में नौकरी मिली। मालिकाना हक मिलने के बाद वे न सिर्फ बिजनेस पार्टनर बने बल्कि एक बड़े संयुक्त परिवार की तरह रहने लगे।

ओलंपिया कैफे ने 108 साल बाद भी अपने पुराने मिजाज को जिंदा रखा है। यहाँ आज भी वही पुराना लकड़ी का काउंटर, पैनल वाली दीवारें और संगमरमर (मार्बल) के टॉप वाली गोल टेबल देखने को मिलती हैं। हालांकि वक्त के साथ कुछ बदलाव जरूर हुए हैं। जैसे फर्श पर ग्रेनाइट लगाना और पुरानी कुर्सियों को बदलना। रेस्टोरेंट का मुख्य शटर भी बदला गया था।

इसके पीछे 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों की एक खौफनाक याद जुड़ी है। उस रात जब पास के लियोपोल्ड कैफे के बाहर गोलीबारी शुरू हुई तो ओलंपिया के मैनेजर ने समझदारी दिखाते हुए तुरंत शटर गिरा दिया था। शटर पर गोलियां लगीं जरूर मगर वे उसे भेद नहीं पाईं और अंदर मौजूद सभी ग्राहक सुरक्षित रहे।

स्वाद की बात करें तो बाकी ईरानी कैफे जहां सिर्फ चाय और बन-मस्का के लिए जाने जाते हैं वहीं ओलंपिया अपने लजीज मुग़लाई और ईरानी खाने के लिए मशहूर है। यहाँ का मटन कीमा पाव, मटन मसाला फ्राई (150 रुपये), भेजा मसाला फ्राई (240 रुपये), एग मसाला फ्राई (85 रुपये) और दाल गोश्त (180 रुपये) सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं।

यहाँ आम लोगों और टैक्सी ड्राइवरों के बजट का खास ख्याल रखा जाता है। अमीर चौधरी का मानना है कि अच्छा खाना सिर्फ अमीरों के लिए नहीं होना चाहिए। शाकाहारी लोगों के लिए भी यहाँ चना मसाला (70 रुपये) और पनीर टिक्का मसाला (140 रुपये) जैसे विकल्प मौजूद हैं। कैफे की एक और बड़ी खासियत यह है कि यहाँ बटर चिकन जैसी बनावटी चीजें नहीं मिलतीं और मसालों को आज भी खुद कूटकर तैयार किया जाता है।

मुंबई और ईरानी समुदाय का दो हज़ार साल पुराना नाता

इस घटना ने लोगों के मन में यह उत्सुकता जगा दी है कि आखिर मुंबई में रहने वाले ये ईरानी लोग कौन हैं। भारत और ईरान का रिश्ता बेहद पुराना है। 1947 में भारत के विभाजन से पहले दोनों देश भौगोलिक रूप से पड़ोसी थे। दोनों संस्कृतियों के बीच लगभग दो हजार साल से व्यापारिक और सामाजिक संबंध रहे हैं।

मुंबई के आधुनिक इतिहास में ईरानी प्रवासियों की दो मुख्य लहरें देखने को मिलती हैं। पहला था अनिवार्य प्रवास जिसमें राजनीतिक उथल-पुथल या धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए लोग ईरान छोड़कर भारत आए। दूसरा था स्वैच्छिक प्रवास जिसमें लोग व्यापार के नए अवसरों की तलाश में खुद मुंबई पहुंचे।

खासकर 1860 से 1900 के बीच जब मुंबई में सूती मिलों की शुरुआत हुई, रेलवे का जाल बिछा और स्वेज़ नहर खुली तो व्यापार चरम पर पहुंच गया। इसी दौर में ईरान के शिराज, बुशहर और इसफ़ाहान शहरों से शिया मुस्लिम व्यापारी मुंबई आए।

वे अपने साथ घोड़े, सूखे मेवे, इत्र (अत्तर), रेशमी शॉल और फारसी किताबें लाते थे। वापसी में वे मुंबई से चावल, मसाले, घी और सूती कपड़े ईरान ले जाते थे। इसी बढ़ते व्यापार के कारण मुंबई में फारसी दूतावास की स्थापना भी हुई।

इसी तरह साल 1848 में इस्माइली शिया समुदाय के 46वें इमाम आगा खान प्रथम (हसन अली शाह) ईरान से आकर मुंबई में बस गए। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें विशेष संरक्षण दिया था। मुंबई के माझगांव इलाके में स्थित 'हसन आबाद दरगाह' आगा खान प्रथम का ही मकबरा है। अपनी भव्य गुंबदों और राजस्थानी संगमरमर की नक्काशी के कारण इसे 'मुंबई का ताजमहल' भी कहा जाता है।
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मंसूर शोघी यज़दी के बेटे मोहम्मद मुंबई में काउंटर कैफे ईरानी चाय का प्रबंधन करते हैं।

यज़्द प्रांत के प्रवासियों से जन्मी कैफे संस्कृति

मुंबई की पहचान बन चुके ज्यादातर ईरानी कैफे की शुरुआत ईरान के सूखाग्रस्त प्रांतों यज़्द और केरमान से आए लोगों ने की थी। इन प्रवासियों में शिया मुस्लिम और ज़ोरोस्ट्रियन (पारसी) दोनों शामिल थे। ईरान के इन इलाकों में पारंपरिक रूप से कॉफी हाउस या 'कहवा-खाना' चलाने का पुराना तजुर्बा लोगों के पास था।

जब ये लोग मुंबई आए तो उनके पास बहुत ज्यादा पैसे नहीं थे। उस जमाने में मुंबई के स्थानीय हिंदू व्यापारी नुक्कड़ या कोने (कॉर्नर) की दुकानों को व्यापार के लिहाज से अशुभ मानते थे। ईरानी प्रवासियों ने इस मौके का फायदा उठाया और उन्हें ये कोने की दुकानें बहुत सस्ते किराए पर मिल गईं। यहीं से मुंबई के नुक्कड़ों पर ईरानी कैफे की नींव पड़ी।

इन कैफे ने मुंबई की संस्कृति को पूरी तरह बदल दिया। ईरान में पारंपरिक रूप से बिना दूध की कड़क काली चाय पी जाती थी। मगर मुंबई के कामकाजी वर्ग, मिल मजदूरों और टैक्सी ड्राइवरों के स्वाद को देखते हुए ईरानियों ने इसे मीठी और गाढ़ी दूध वाली चाय में बदल दिया।

इसके साथ ही उन्होंने बन-मस्का, कड़क ब्रुन ब्रेड, कीमा-पाव और पुडिंग जैसे सस्ते और पेट भरने वाले व्यंजन परोसना शुरू किया। कैफे का माहौल भी बेहद अनोखा होता था जिसमें दीवारों पर बड़े-बड़े आईने लगे होते थे और काउंटर पर बैठे मालिक कैफे की हर गतिविधि पर नजर रखते थे।
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पुणे में आगा खान पैलेस का निर्माण 1892 में इमाम सुल्तान मुहम्मद शाह आगा खान तृतीय ने करवाया था।

पारसी समुदाय का ऐतिहासिक योगदान

ईरानी समुदाय का एक बड़ा हिस्सा पारसी समाज के रूप में भारत की पहचान बन चुका है। पारसी का शाब्दिक अर्थ ही है 'पारस या फारस (Persia) के लोग'। सातवीं शताब्दी में जब फारस पर अरबों का आक्रमण हुआ तो अपने ज़ोरोस्ट्रियन धर्म की रक्षा के लिए ये लोग नावों में बैठकर भारत के गुजरात तट पर पहुंचे। वहां के स्थानीय राजा ने जब उन्हें दूध से भरा गिलास भेजकर यह संदेश दिया कि उनके राज्य में जगह नहीं है तो पारसियों ने उस दूध में चीनी मिलाकर वापस भेज दिया। इसका मतलब था कि वे स्थानीय समाज में शक्कर की तरह घुल-मिल जाएंगे और उसे मीठा बना देंगे।

समय के साथ पारसी समुदाय गुजरात से मुंबई की तरफ बढ़ा। १६४० में दोराबजी नानाभॉय मुंबई आने वाले पहले पारसी बने। इसके बाद १७३६ में लोवजी वाडिया मुंबई आए जिन्होंने शहर के प्रसिद्ध गोदी (डॉकयार्ड) का निर्माण किया। पारसी समुदाय ने मुंबई को एक आधुनिक महानगर बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। उद्योगपति जमशेदजी टाटा ने भारत के स्टील उद्योग की नींव रखी, तो कावासजी डावर ने १८५४ में पहली स्टीम कॉटन मिल की शुरुआत की।

राजनीति के क्षेत्र में दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद के सदस्य बनने वाले पहले एशियाई बने। उन्होंने संसद में बाइबल के बजाय अपने पवित्र ज़ोरोस्ट्रियन ग्रंथ 'खोरदेह अवेस्ता' पर हाथ रखकर शपथ ली थी। इसके अलावा सर फिरोजशाह मेहता और सर दिनशॉ वाचा ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। आज भी मुंबई की सबसे खूबसूरत इमारतें जैसे जहांगीर आर्ट गैलरी, ताज महल पैलेस होटल और जे.एन. पेटिट लाइब्रेरी पारसी समुदाय की दानशीलता और वास्तुकला की गवाह हैं।

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शिया मस्जिदें और बहाई पंथ की जड़ें

मुंबई में ईरानी संस्कृति सिर्फ खान-पान तक सीमित नहीं रही बल्कि इसका गहरा धार्मिक और सामाजिक प्रभाव भी पड़ा। १८६० में ईरानी व्यापारी मोहम्मद हुसैन शिराज़ी ने मुंबई के भिंडी बाजार इलाके में प्रसिद्ध 'इरानी मस्जिद' का निर्माण करवाया जिसे मुगल मस्जिद भी कहा जाता है।

इस मस्जिद की वास्तुकला पूरी तरह ईरान के शिराज शहर की मस्जिदों जैसी है। इसके मेहराब को बनाने के लिए मिट्टी सीधे इराक के कर्बला से लाई गई थी। इसी मस्जिद के पास मुंबई का इकलौता पारंपरिक 'इरानी हम्माम' (सार्वजनिक स्नानगृह) भी मौजूद है जो मध्य-पूर्व के देशों की याद दिलाता है। हर साल मुहर्रम के दौरान यहाँ ईरान के कोम शहर से विशेष मौलवी आते हैं जो फारसी भाषा में मजलिस पढ़ते हैं।

इसी तरह ईरान के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय यानी बहाई पंथ के लोगों को भी १९वीं सदी में मुंबई में पनाह मिली थी। ईरान के कजार राजवंश के उत्पीड़न से भागकर आए बहाई प्रवासियों ने मुंबई को अपना केंद्र बनाया।

बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह के शुरुआती ग्रंथों की छपाई और प्रकाशन का काम भी मुंबई के 'नासिरी प्रेस' में हुआ था। १९२० में पूरे भारत का पहला राष्ट्रीय बहाई सम्मेलन भी इसी शहर में आयोजित किया गया था। यही वजह है कि बहाई समुदाय आज भी मुंबई को भारत की 'मदर कम्युनिटी' का दर्जा देता है।

एक सिमटती हुई खूबसूरत विरासत

आज के दौर में मॉल संस्कृति और आधुनिक कैफे चेन के आने से ये पारंपरिक ईरानी कैफे धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। नई पीढ़ी के बच्चे अक्सर दूसरे व्यवसायों में जा रहे हैं जिससे कई पुराने कैफे बंद हो चुके हैं। मगर क्रिस्टोफर नोलन, टॉम हॉलैंड और मैट डेमन जैसी अंतरराष्ट्रीय हस्तियों का ओलंपिया कॉफी हाउस आना यह साबित करता है कि असली स्वाद और समृद्ध इतिहास कभी पुराना नहीं होता।

पारसियों के पारंपरिक नववर्ष 'नवरोज़' की टेबल से लेकर ओलंपिया कैफे के कीमा-पाव और बन-मस्का तक, ईरान की यह साझी विरासत आज भी मुंबई की रगों में दौड़ रही है। यह शहर प्रवासियों का स्वागत करना और उन्हें अपने भीतर समेटना बखूबी जानता है, और मुंबई के ईरानी कैफे इसी जिंदादिली की सबसे खूबसूरत मिसाल हैं।