सहारनपुर मस्जिद विध्वंस: जमीयत उलमा-ए-हिंद ने कानूनी विकल्पों की समीक्षा की

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 09-09-2026
Saharanpur Mosque Demolition: Jamiat Ulama-e-Hind Reviews Legal Options
Saharanpur Mosque Demolition: Jamiat Ulama-e-Hind Reviews Legal Options

 

सहारनपुर।

सहारनपुर की ऐतिहासिक कलेक्ट्रेट मस्जिद के विध्वंस के बाद पैदा हुई स्थिति को लेकर जमीयत उलमा-ए-हिंद ने कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर सक्रियता बढ़ा दी है। संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। उनकी हिदायत पर सोमवार को जमीयत उलमा-ए-उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधिमंडल सहारनपुर पहुंचा था। इसके बाद मंगलवार को जमीयत उलमा-ए-हिंद का एक उच्चस्तरीय केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी के नेतृत्व में सहारनपुर पहुंचा।

प्रतिनिधिमंडल ने मस्जिद से जुड़े कानूनी, प्रशासनिक और सामाजिक पहलुओं की विस्तार से जानकारी ली। इस दौरान शहर के जिम्मेदार लोगों, अधिवक्ताओं, राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जमीयत के स्थानीय पदाधिकारियों से मुलाकात कर आगे की रणनीति पर चर्चा की गई।

केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल ने पूर्व सांसद हाजी फज़लुर्रहमान, वर्तमान सांसद इमरान मसूद, भूमि से जुड़े स्वर्गीय याकूब खान के पौत्र फिरोज खान और शाह हारून खान, एडवोकेट नौशाद तथा मुकदमे के पक्षकार एडवोकेट तनवीर अहमद सहित अन्य संबंधित लोगों से मुलाकात की।

दस्तावेजों और राजस्व रिकॉर्ड की जांच

बैठकों के दौरान मस्जिद के विध्वंस, जिला प्रशासन की कार्रवाई और उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर विस्तार से विचार किया गया। चर्चा में उन दस्तावेजों को भी जांच के दायरे में रखा गया, जिन्हें फैसले का आधार बताया जा रहा है।

जमीयत के अनुसार, यह सवाल महत्वपूर्ण है कि संबंधित दस्तावेज न्यायिक रिकॉर्ड में विधिवत दर्ज था या नहीं। इसी तरह जिस रिकॉर्ड में ‘सरकार-ए-हिंद’ का उल्लेख किए जाने की बात सामने आ रही है, उस रिकॉर्ड का विवादित भूमि के स्वामित्व से वास्तविक संबंध क्या है, यह भी जांच का विषय है।

प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि इन सभी पहलुओं की दस्तावेजी और कानूनी जांच की जा रही है। इसके लिए उपलब्ध राजस्व अभिलेखों, मस्जिद से संबंधित ऐतिहासिक दस्तावेजों, भूमि के स्वामित्व संबंधी दावों और अब तक हुई न्यायिक कार्यवाही की समीक्षा की जा रही है।

इसके बाद अधिवक्ताओं के साथ एक विशेष बैठक हुई। इसमें मामले के जटिल कानूनी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि न्याय की लड़ाई को मजबूत बनाने के लिए दस्तावेजी साक्ष्यों और उपलब्ध कानूनी उपायों का प्रभावी इस्तेमाल जरूरी है।

जमीयत के प्रतिनिधियों के मुताबिक, उच्च न्यायालय सहित उपलब्ध उच्चतर न्यायिक मंचों का दरवाजा खटखटाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है। उचित कानूनी राहत के लिए आगे की रणनीति को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया जारी है।

‘बिना मौका दिए बुलडोजर चलाना स्वीकार्य नहीं’

जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि मामले से जुड़े दस्तावेज और साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। इन्हें संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के सामने रखा जाएगा। इसके बाद उनकी सलाह और कानूनी विशेषज्ञों से चर्चा के आधार पर अगला कदम तय किया जाएगा।

मौलाना कासमी ने मस्जिद के विध्वंस पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जिस तरह जल्दबाजी में कार्रवाई की गई, उससे सहारनपुर के लोगों और न्याय में विश्वास रखने वाले नागरिकों के बीच बेचैनी पैदा हुई है।

उन्होंने कहा कि प्रभावित पक्ष को अपना पक्ष रखने, कानूनी बचाव करने और संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने का पर्याप्त अवसर दिए बिना अचानक बुलडोजर चलाना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

उनके मुताबिक, अदालत का दरवाजा खटखटाना किसी नागरिक को मिली महज औपचारिक सुविधा नहीं है। यह संवैधानिक न्याय व्यवस्था का बुनियादी हिस्सा है। प्रशासनिक कार्रवाई ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे प्रभावित पक्ष के लिए उच्च न्यायालय या किसी सक्षम न्यायिक मंच तक पहुंचना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो जाए।

‘मामला केवल एक समुदाय का नहीं’

मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि सहारनपुर की घटना से शहर के लोग दुखी और चिंतित हैं। उनके अनुसार यह मामला केवल किसी एक धर्म या समुदाय से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि कानून के शासन, संवैधानिक अधिकारों और न्याय के मूल सिद्धांतों से संबंधित है।

उन्होंने कहा, “जमीयत उलमा-ए-हिंद न्याय के हर उपलब्ध कानूनी दरवाजे पर दस्तक देगी। सहारनपुर के लोगों को इस मामले में जहां भी कानूनी सहायता की जरूरत होगी, जमीयत उलमा-ए-हिंद उनके साथ मजबूती से खड़ी रहेगी।”

उन्होंने कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिंद का इतिहास संविधान और कानून के दायरे में रहकर नागरिक अधिकारों और न्याय की रक्षा के लिए संघर्ष करने का रहा है। सहारनपुर के मामले में भी संगठन कानूनी, संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीके से आगे की लड़ाई लड़ेगा।

मौलाना कासमी ने कहा कि देश में कानून की नजर में सभी नागरिक समान हैं। पूजा स्थलों समेत प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

शांति और भाईचारा बनाए रखने की अपील

जमीयत महासचिव ने मौजूदा परिस्थितियों में सहारनपुर के नागरिकों द्वारा शांति और आपसी सद्भाव बनाए रखने की सराहना की। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थिति के बावजूद लोगों ने शहर की पुरानी सामाजिक एकता और भाईचारे को कायम रखा है।

उन्होंने कहा कि इस घटना से हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग दुखी और चिंतित हैं। ऐसे समय में आपसी विश्वास और सामाजिक एकता को मजबूत बनाए रखना बेहद जरूरी है।

मौलाना कासमी ने कहा कि यही साझा दुख, आपसी विश्वास और गंगा-जमुनी एकता सहारनपुर और देश की वास्तविक ताकत है। उन्होंने कहा कि जनता की एकता और जागरूकता के बल पर सांप्रदायिकता और नफरत की राजनीति का मुकाबला किया जा सकता है।

जमीयत उलमा-ए-हिंद ने सभी नागरिकों से शांति और सद्भाव बनाए रखने तथा संविधान और कानून के दायरे में रहकर न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाने की अपील की।

प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन शामिल रहे

केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मुहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने किया। उनके साथ मौलाना कासिम नूरी, अध्यक्ष जमीयत उलमा-ए-प्रदेश दिल्ली, मौलाना अली हसन मजाहिरी, अध्यक्ष जमीयत उलमा-ए-हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश, मौलाना अज़ीमुल्लाह सिद्दीकी, सचिव जमीयत उलमा-ए-हिंद, मौलाना मुहम्मद यूसुफ कासमी, नाज़िम-ए-तंजीम, जमीयत उलमा-ए-प्रदेश दिल्ली और हाफिज अबूबकर इब्ने मौलाना हकीमुद्दीन कासमी शामिल रहे।

स्थानीय स्तर पर जमीयत उलमा जिला सहारनपुर के अध्यक्ष मौलाना गुलफाम मजाहिरी, महासचिव मौलाना सरताज अहमद कासमी, उपाध्यक्ष मौलाना शमशीर कासमी, शहर इकाई के अध्यक्ष मौलाना अतहर, सद्भावना मंच के संयोजक मौलाना फरीद मजाहिरी, मौलाना हारिस, तहसील रामपुर मनिहारान के महासचिव कारी शौकीन हुसैनी, मौलाना अब्दुल्लाह शाह, मौलाना अब्दुल अलीम और मौलाना अताउर रशीदी समेत बड़ी संख्या में स्थानीय जिम्मेदार और गणमान्य लोग मौजूद रहे।