नई दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इसमें केंद्र सरकार और अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (ABVIMS)-डॉ. राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे हाल ही में बने सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक (SSB) को तुरंत चालू करें। याचिका में आरोप लगाया गया है कि लगभग 400 करोड़ रुपये की लागत से बना यह इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होने के बावजूद अभी तक चालू नहीं हुआ है।
नागरिक अधिकार समूह 'सोशल ज्यूरिस्ट' की ओर से वकील अशोक अग्रवाल और कुमार उत्कर्ष ने यह याचिका दायर की है। उनका कहना है कि इस ब्लॉक को शुरू करने में हुई लंबी देरी के कारण हजारों मरीज़ स्पेशलाइज़्ड हेल्थकेयर सुविधाओं और अतिरिक्त बेड की क्षमता से वंचित रह गए हैं, साथ ही इससे जनता के पैसे की बर्बादी भी हुई है।
PIL के अनुसार, सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक का मकसद RML अस्पताल में पब्लिक हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर को काफी बेहतर बनाना था। इसके तहत बेड की संख्या लगभग 1,532 से बढ़ाकर 2,198 (लगभग 666 बेड की बढ़ोतरी) करनी थी, साथ ही 18 ऑपरेशन थिएटर, एडवांस्ड डायग्नोस्टिक सुविधाएं और PET-CT सुविधा वाला एक खास ऑन्कोलॉजी विभाग भी बनाना था। याचिकाकर्ता का कहना है कि हालांकि इंफ्रास्ट्रक्चर का काम काफी हद तक पूरा हो चुका है, लेकिन रेगुलेटरी और प्रशासनिक मंज़ूरी न मिलने के कारण यह सुविधा अभी तक चालू नहीं हो पाई है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस देरी के कारण टैक्सपेयर्स के पैसे से बनाए गए हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है, जबकि सरकारी अस्पतालों में भीड़, बेड की कमी और स्पेशलाइज़्ड इलाज की बढ़ती मांग जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। इसमें कहा गया है कि देरी का हर दिन उन मरीज़ों पर बुरा असर डालता है जो सस्ती हेल्थकेयर के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं।
10 अप्रैल, 2026 को छपी 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा है कि प्रोजेक्ट पर खर्च होने के बावजूद सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक एक साल से ज़्यादा समय से बंद पड़ा है। PIL में यह भी कहा गया है कि 22 जून, 2026 को अधिकारियों को एक ज्ञापन सौंपा गया था, जिसमें कमियों को तुरंत दूर करने और सभी कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करने का अनुरोध किया गया था, लेकिन आरोप है कि इस पर कोई असरदार कार्रवाई नहीं हुई।
याचिका में कहा गया है कि यह निष्क्रियता संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है, क्योंकि इससे समय पर हेल्थकेयर सुविधा नहीं मिल पा रही है और भारी सार्वजनिक निवेश के बावजूद एक बड़ी पब्लिक हेल्थकेयर सुविधा बेकार पड़ी है। यह याचिका 'पश्चिम बंगाल खेत मज़दूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले पर भी आधारित है, जिसमें नागरिकों को पर्याप्त मेडिकल सुविधाएँ उपलब्ध कराने की राज्य की संवैधानिक ज़िम्मेदारी को माना गया था।
इस PIL में यह मांग की गई है कि प्रतिवादियों को सभी रेगुलेटरी कमियों को दूर करने, कंप्लीशन सर्टिफ़िकेट, नो ऑब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट और अन्य ज़रूरी मंज़ूरियाँ हासिल करने और सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक को तय समय-सीमा के भीतर पूरी तरह चालू करने का निर्देश दिया जाए। इसमें ब्लॉक में तुरंत हेल्थकेयर सेवाएँ शुरू करने और ज़रूरी मेडिकल, नर्सिंग, टेक्निकल और सपोर्ट स्टाफ़ की तैनाती का निर्देश देने की भी मांग की गई है, ताकि अतिरिक्त हेल्थकेयर इंफ़्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल बिना और देरी के किया जा सके।