आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
इजराइल में चुनाव आमतौर पर मतदाताओं के लिए विकल्प चुनने का अवसर होते हैं। हालांकि, इजराइल के फलस्तीनी नागरिकों के लिए देश के राष्ट्रीय चुनाव एक विकल्प से ज्यादा दुविधा पेश करते हैं।
इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव में फलस्तीनी नागरिकों के सामने मतदान करने या उससे दूर रहने की दुविधा है। देश में मतदान के पात्र लोगों में लगभग छठा हिस्सा फलस्तीनी नागरिकों का है और करीबी मुकाबले में उनके वोट नतीजे को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, कई फलस्तीनी नागरिकों का मानना है कि मतदान करने से ऐसी व्यवस्था को वैधता मिल सकती है, जो उनकी आवाज दबाती है और उनकी नागरिकता को सशर्त मानती है।
2022 के पिछले आम चुनाव के बाद से गाजा में तबाही और बड़े पैमाने पर लोगों की हत्या, फलस्तीनी नागरिकों की अभिव्यक्ति एवं विरोध प्रदर्शन पर पाबंदियों तथा प्रमुख विपक्षी दलों द्वारा अरब राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन से इनकार ने इस दुविधा को और गहरा कर दिया है।
इजराइल के लगभग एक करोड़ नागरिकों में करीब 17 लाख फलस्तीनी हैं। इनमें से अधिकतर उन अरब लोगों के वंशज हैं, जो उस जमीन पर रह गए थे जो बाद में इजराइल का हिस्सा बनी। वहीं, 1948 के अरब-इजराइल युद्ध के दौरान करीब सात लाख 50 हजार फलस्तीनियों को उनके घरों से जबरन निकाल दिया गया था और उनमें से ज्यादातर को लौटने नहीं दिया गया।
आठ नवंबर 1948 को युद्ध के दौरान जल्दबाजी में कराई गई जनगणना ने यह तय करने में भूमिका निभाई कि नए राज्य में किसे शामिल माना जाएगा। तब अपने घरों में अनुपस्थित लोगों को पंजीकरण और नागरिकता की प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। इनमें पड़ोसी देशों या तत्कालीन ब्रिटिश शासन वाले फलस्तीन के अन्य इलाकों में शरण लेने वाले लोग भी शामिल थे। इससे विस्थापित फलस्तीनियों के लिए नागरिकता हासिल करना और घर लौटना लगभग असंभव हो गया।