बासित जरगर/पंपोर/श्रीनगर
कश्मीर के प्रसिद्ध 'केसर शहर' पंपोर के पास अशनुम्बल गांव की करेवा जमीन पर इन दिनों एक अनोखा कृषि प्रयोग चर्चा में है। जहां एक तरफ पूरी घाटी के किसान केसर की वार्षिक फसल और फूलों के खिलने का इंतजार कर रहे हैं, वहीं स्थानीय किसान मोहम्मद सुल्तान राथर के खेत में केसर की पत्तियां और फूल वक्त से पहले ही मुस्कुराते नजर आ रहे हैं।
राथर ने किसी पारंपरिक खुले मैदान में नहीं, बल्कि साल 2025 में लगाए गए उच्च घनत्व (हाई-डेंसिटी) वाले सेब के युवा पेड़ों की पंक्तियों के बीच खाली पड़ी जमीन पर केसर के बल्ब रोपे थे। नतीजा यह हुआ कि अक्टूबर 2026 में आसपास के खेतों की तुलना में उनके खेत में 5 से 15 दिन पहले ही केसर के फूल खिल आए।

खाली जगह का सही इस्तेमाल
उच्च घनत्व वाले सेब के बागों में पेड़ों की पंक्तियों के बीच अक्सर छह से दस फीट की खाली जगह छोड़ दी जाती है। जब तक सेब का बाग पूरी तरह तैयार और बड़ा नहीं होता, तब तक यह जमीन बिना किसी फसल के पड़ी रहती है।
राथर ने इसी खाली जगह को नया रूप देने की सोची। उन्होंने अगस्त 2025 में मिट्टी तैयार करके केसर के बल्ब (कॉर्म्स) लगा दिए। उनका मानना था कि जब तक सेब के पौधे बड़े हो रहे हैं, तब तक इस जमीन को बेकार छोड़ने के बजाय उस पर घाटी की सबसे कीमती फसल उगाई जाए।

ड्रिप सिंचाई और नमी का कमाल
पिछले दो दशकों में कश्मीर में मौसम का मिजाज बदला है। बारिश अब पहले की तरह सही समय पर नहीं होती। केसर को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत तो नहीं होती, लेकिन अगस्त और सितंबर के दौरान हल्की नमी इसके फूलों के विकास के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है।
सेब के बाग में पहले से ही टपकन (ड्रिप) सिंचाई प्रणाली लगी हुई थी। राथर ने इसी ड्रिप सिस्टम का इस्तेमाल केसर की फसल के लिए किया। उन्होंने अगस्त और सितंबर 2026 के महीनों में खेत में दो से तीन बार आवश्यकतानुसार पानी दिया। इसके अलावा, जून से लेकर रोपाई के दौरान मिट्टी की सही समय पर गुड़ाई की गई।
सेब के छोटे पौधों की छाया ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई। तेज धूप में जहां खुले खेतों की नमी जल्दी भाप बनकर उड़ जाती है, वहीं पौधों की हल्की छाया ने मिट्टी में नमी को रोके रखा। इसी नमी और समय पर मिली सिंचाई के कारण केसर के पौधों की जड़ें मजबूत हुईं और फूल समय से पहले खिल गए।

बेहतर गुणवत्ता की उम्मीद
राथर अपने खेत में खिले फूलों की बनावट से काफी उत्साहित हैं। उन्होंने पाया कि फूलों के भीतर मौजूद लाल धागे (स्टिग्मा), जिन्हें सुखाकर असली केसर बनाया जाता है, सामान्य से अधिक लंबे और मोटे दिख रहे हैं।
सामान्य तौर पर एक किलोग्राम ताजे केसर के फूलों से लगभग 20 से 30 ग्राम सूखा केसर मिलता है। राथर का अनुमान है कि उनकी इस फसल से पैदावार और बेहतर हो सकती है। हालांकि, अंतिम उपज और गुणवत्ता का सही अंदाजा फसल की तुड़ाई, सुखाने और वजन करने के बाद ही हो सकेगा।

Farmer Mohammad Sultan grows saffron between rows of high-density apple trees in Pampore, Kashmir. https://t.co/fcCxL63Y8B
— Basit Zargar (باسط) (@basiitzargar) October 20, 2026
क्या हैं भावी चुनौतियां?
यह प्रयोग अभी शुरुआती दौर में है। सेब के बाग में जब कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है, तब केसर की सुरक्षा एक बड़ा सवाल बनकर उभरती है। राथर का कहना है कि उन्होंने कीटनाशकों का छिड़काव केवल सेब के पत्तों पर ही सीमित रखा और केसर या उसकी मिट्टी पर कोई रसायन नहीं डाला।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि केसर के बल्ब गर्मियों में मिट्टी के अंदर सुप्त (डोरमेंट) अवस्था में रहते हैं। इसके बावजूद, हवा या पानी के बहाव से रसायनों के असर को पूरी तरह नकारने के लिए विस्तृत परीक्षण की जरूरत होगी।इसके साथ ही, जैसे-जैसे सेब के पेड़ बड़े होंगे, दोनों फसलों के बीच पानी और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

किसानों में जग रही नई उम्मीद
राथर के इस प्रयास ने आसपास के गांव वालों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है। उनके एक पड़ोसी किसान ने तो 2 से 5 कनाल जमीन पर इस मॉडल को अपनाने की लागत तक पूछ डाली है।
राथर इसे केवल एक व्यावसायिक कोशिश नहीं मानते। वे कहते हैं कि अगर उनकी इस पहल से अन्य किसान भाइयों की आय बढ़ती है और घाटी की पारंपरिक केसर खेती को नया जीवन मिलता है, तो यह उनके लिए एक 'सदका-ए-जारिया' (स्थायी भलाई का कार्य) जैसा होगा।
कश्मीर के करेवा क्षेत्र में यह प्रयोग एक बड़ा व्यावहारिक सवाल उठाता है कि क्या सेब और केसर जैसी दो बिल्कुल अलग फसलें एक साथ मिलकर पनप सकती हैं? अशनुम्बल के इस खेत ने पहले ही साल में सकारात्मक संकेत दिए हैं। आने वाले मौसम यह तय करेंगे कि यह मॉडल पूरी घाटी के लिए कितना कारगर साबित होता है।