अमर शहीद अशफाक उल्ला खां: हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक और काकोरी के महान क्रांतिकारी

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 22-10-2026
Immortal Martyr Ashfaqulla Khan: A Symbol of Hindu-Muslim Unity and a Great Revolutionary of Kakori
Immortal Martyr Ashfaqulla Khan: A Symbol of Hindu-Muslim Unity and a Great Revolutionary of Kakori

 

आवाज द वॉयस/ नई दिल्ली  

19 दिसंबर 1927 को दिसंबर की एक ठंडी सुबह फैजाबाद जेल में 27 वर्ष की अल्प आयु में एक नौजवान फांसी के तख्ते की तरफ बढ़ा। उसने फंदे को चूमते हुए यह ऐलान किया कि उसके हाथ किसी इंसान के खून से नहीं रंगे हैं। उनका नाम था अशफाक उल्ला खां शाहजहांपुर के एक महान शायर, एक गौरवशाली पठान और एक ऐसे क्रांतिकारी जिन्होंने स्वतंत्र भारत के सपने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनकी और उनके सबसे करीबी मित्र, एक हिंदू शायर रामप्रसाद बिस्मिल की दोस्ती भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे अमर और प्रेरणादायक कहानियों में से एक है।

अशफाक उल्ला खां का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था। वे एक इज्जतदार पठान परिवार के छह बच्चों में सबसे छोटे थे। उनके पिता शफिकुल्लाह खान पुलिस विभाग में सेवा में थे और परिवार की इच्छा थी कि बेटा एक शांत और आरामदायक जीवन व्यतीत करे। लेकिन बचपन से ही अशफाक को शायरी, घुड़सवारी और कुश्ती से गहरा प्रेम था तथा वे ब्रिटिश राज के खिलाफ भारत की मुक्ति की कहानियां बड़े चाव से सुना करते थे।
 
किशोरावस्था में ही उन्होंने 'हसरत' (जिसका अर्थ 'तमन्ना' या 'इच्छा' होता है) उपनाम से उर्दू में शायरी लिखना शुरू कर दिया था। उनकी रचनाओं में मोहब्बत, ईमान और देशप्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी। वे देर रात तक अपनी कविताओं व शेरों से दोस्तों की महफिलों को आबाद रखते थे। मजबूत कद-काठी और नरम मुस्कान वाले अशफाक एक बेहद खुशमिजाज और नेकदिल इंसान थे, जो महफिल में हंसाने के साथ-साथ रुलाने का हुनर भी रखते थे। 
 

शाहजहांपुर में ही रामप्रसाद बिस्मिल नाम के एक अन्य शायर और क्रांतिकारी रहते थे जो आर्य समाज के पक्के अनुयाई थे। अशफाक ने उनकी बहादुरी के किस्से सुन रखे थे और वे उनसे मिलने के लिए उत्सुक थे। शुरुआत में बिस्मिल इस युवा पठान से थोड़ा सतर्क रहे, लेकिन अशफाक के बार-बार मिलने के प्रयासों से दोनों का यह फासला खत्म हो गया और वे एक-दूसरे के बिना अधूरे से हो गए। एक हिंदू और एक मुसलमान की यह जोड़ी साथ खाती, साथ शायरी लिखती और मिलकर आजाद भारत का सपना देखती थी। सन 1920 में जब महात्मा गांधी ने 'असहयोग आंदोलन' (नॉन कोऑपरेशन मूवमेंट) का आह्वान किया, तो देश के अन्य युवाओं की तरह अशफाक और बिस्मिल भी पूरे जोश और उत्साह के साथ इसमें कूद पड़े और शाहजहांपुर में सभाओं तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आयोजन किया।
 
लेकिन फरवरी 1922 में चौरीचौरा की घटना के बाद जब गांधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया, तो देश के कई राष्ट्रवादियों की तरह अशफाक और बिस्मिल को भी गहरी निराशा हुई और वे ठगा हुआ महसूस करने लगे। तब उन्हें अटूट विश्वास हो गया कि देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति केवल और केवल सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ही मिल सकती है।
 
इसी उद्देश्य के साथ 1924 में कुछ युवा क्रांतिकारियों ने मिलकर 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HRA) नामक संगठन की स्थापना की, जिसका मुख्य लक्ष्य संगठित क्रांति के जरिए एक स्वतंत्र संघीय गणराज्य भारत की स्थापना करना था। रामप्रसाद बिस्मिल इस संगठन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और अशफाक भी पूरी तत्परता से उनके साथ जुड़ गए। उनके अन्य साथी क्रांतिकारियों में राजेंद्र लाहिड़ी, रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी और युवा चंद्रशेखर आजाद शामिल थे। हालांकि उनके पास अटूट हिम्मत और महान आदर्श थे, लेकिन हथियारों, छपाई और दैनिक गुजारे के लिए धन का भारी अभाव था। तब क्रांतिकारियों ने यह निर्णय लिया कि आवश्यक धन ब्रिटिश सरकार से ही छीना जाएगा।
 
योजना के तहत, हर शाम को सहारनपुर से लखनऊ की ओर जाने वाली ट्रेन (नंबर 8 डाउन ट्रेन) विभिन्न स्टेशनों का सरकारी खजाना और राजस्व लेकर लखनऊ की ट्रेजरी तक जाती थी। बिस्मिल ने यह प्रस्ताव रखा कि इसी ट्रेन को रोककर बिना किसी मुसाफिर को नुकसान पहुँचाए सरकारी धन पर कब्जा कर लिया जाए। शुरुआती दौर में अशफाक ने इस योजना का कड़ा विरोध किया था और चेतावनी दी थी कि इतने बड़े हमले के बाद ब्रिटिश हुकूमत उनके नए संगठन को कुचलने के लिए पूरी ताकत से टूट पड़ेगी। परंतु जब संगठन द्वारा बहुमत से निर्णय ले लिया गया, तो एक सच्चे साथी की तरह अशफाक हर कदम पर अपने मित्रों के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे।
 
आखिरकार, 9 अगस्त 1925 को सहारनपुर से लखनऊ जाने वाली नंबर 8 डाउन ट्रेन जब काकोरी गांव के पास पहुँची, तो अंदर बैठे क्रांतिकारियों ने चेन खींचकर ट्रेन को अंधेरे में रोक दिया। जब बाकी साथी चारों तरफ पहरा दे रहे थे, तब कुछ क्रांतिकारी गार्ड के डिब्बे से भारी लोहे की तिजोरी को खींचकर बाहर ले आए। लेकिन वह तिजोरी आसानी से खुल नहीं रही थी। तब उनमें सबसे अधिक ताकतवर अशफाक उल्ला खां ने आगे बढ़कर हथौड़ा संभाला और तब तक लगातार वार करते रहे जब तक वह तिजोरी टूट नहीं गई। कुछ ही मिनटों में वे सारा सरकारी पैसा लेकर वहां से सुरक्षित निकल गए।
 

इस ऐतिहासिक घटना ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी और अंग्रेज पूरी तरह सकते में आ गए। इस दौरान एक मुसाफिर गलती से चली गोली का शिकार होकर मारा गया, जिसे अंग्रेजों ने एक बड़े कत्ल का मामला बना दिया और पूरे यूनाइटेड प्रोविंसेस में बड़े पैमाने पर तलाश व छापों का दौर शुरू हो गया। सितंबर 1925 तक पुलिस ने दर्जनों लोगों को गिरफ्तार कर लिया, जिनमें रामप्रसाद बिस्मिल भी शामिल थे। लेकिन अशफाक पुलिस की पकड़ से दूर निकलने में सफल रहे। महीनों तक वे भूमिगत रहकर छिपते रहे—पहले बनारस में और बाद में बिहार में, जहाँ उन्होंने अपनी पहचान छिपाकर एक इंजीनियरिंग कंपनी में क्लर्क के रूप में चुपचाप नौकरी की। इसके बाद, 1926 में वे देश से बाहर निकलकर विदेश जाने और लाला हरदयाल सिंह से संपर्क कर क्रांति के लिए बाहरी मदद जुटाने के उद्देश्य से दिल्ली पहुँचे।
 
दुर्भाग्यवश, दिल्ली में उनके ही शहर के एक पुराने परिचित और पठान दोस्त ने उनके साथ विश्वासघात किया और पैसों या अन्य कारणों से उनके बारे में ब्रिटिश पुलिस को मुखबिरी कर दी। फलस्वरूप, 17 जुलाई 1926 की सुबह अशफाक गिरफ्तार कर लिए गए और अपने साथियों के साथ मुकदमे के लिए लखनऊ लाए गए। हिरासत के दौरान एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी ने मजहब और धर्म का वास्ता देकर अशफाक को रामप्रसाद बिस्मिल के खिलाफ भड़काने और गवाही देने की कोशिश की। लेकिन अशफाक ने उस अधिकारी को करारा जवाब देते हुए कहा कि बिस्मिल एक सच्चे और महान हिंदुस्तानी हैं और वह अपने देश व मित्र के साथ गद्दारी करने से कहीं अधिक बेहतर मौत को गले लगाना पसंद करेंगे।
 
काकोरी षड्यंत्र केस की सुनवाई लखनऊ अदालत में चली, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित मुकदमों में शुमार हो गई। मुकदमे के दौरान ये सभी युवा क्रांतिकारी अदालत के भीतर गर्व से देशभक्ति के गीत गाते थे और उनके चेहरों पर ब्रिटिश कानून का कोई खौफ नहीं था। देश के कई दिग्गज राष्ट्रवादी वकीलों ने उनके बचाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी, परंतु ब्रिटिश न्याय व्यवस्था का फैसला बेहद कठोर था। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को मौत की सजा (फांसी) सुनाई गई, जबकि अन्य साथियों को लंबी अवधि की जेल की सजा दी गई। पूरे देश से आई रहम की तमाम अपीलों को ब्रिटिश सरकार ने ठुकरा दिया। फैजाबाद जेल में अपने अंतिम दिन अशफाक ने पूरी तरह से इबादत, नमाज और अपनी डायरी में लिखने में बिताए।
 
उनकी डायरी में उनके गहरे जज्बात और शायरियां दर्ज थीं। 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में अशफाक उल्ला खां को फांसी के तख्ते पर लटकाया गया। अपनी शहादत से पहले उन्होंने हाथ में पवित्र कुरान थाम रखी थी और वे पूरी शांति व गर्व के साथ फांसी की ओर बढ़े। उन्होंने फंदे को चूमकर कहा कि उनके हाथ किसी बेकसूर के खून से नहीं रंगे हैं और अल्लाह ही उनका अंतिम न्याय करेगा। उसी ऐतिहासिक दिन रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में, रोशन सिंह को इलाहाबाद में फांसी दी गई, जबकि राजेंद्र लाहिड़ी को दो दिन पहले 17 दिसंबर को गोंडा में फांसी दी जा चुकी थी। शाहजहांपुर के वे दोनों जिगरी दोस्त—एक हिंदू और एक मुसलमान—एक ही दिन, एक ही ध्येय और एक ही सपने के लिए अमर हो गए।
 

अपने अंतिम लेखों और संदेशों में अशफाक ने देशवासियों से हमेशा एकजुट रहने और मजहब को कभी भी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दीवार न बनने देने की पुरजोर अपील की थी। बिस्मिल के साथ उनकी अटूट दोस्ती हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की सबसे जीवंत और अमर मिसाल बन गई, जिसने आने वाली पीढ़ियों के क्रांतिकारियों—विशेषकर शहीद भगत सिंह को अत्यंत प्रेरित किया, जिन्होंने काकोरी के इन शहीदों के बलिदान को भारी सम्मान के साथ याद किया था।
 
महज 27 वर्ष की उम्र में देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले अशफाक उल्ला खां आज भी भारत के जन-जन के दिलों में अमर हैं। देश भर में अनगिनत सड़कें, पार्क और संस्थान उनके नाम पर सुशोभित हैं, और काकोरी ट्रेन एक्शन को भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सबसे साहसी व गौरवशाली अध्यायों में गर्व से याद किया जाता है। वह केवल एक शायर नहीं थे जिन्होंने क्रांति का कठिन मार्ग चुना, बल्कि वे एक ऐसे उच्च आत्मबल वाले इंसान थे जिनके लिए धर्म और मजहब कभी देशप्रेम के आड़े नहीं आया, और उन्होंने पूरे विश्व को यह दिखा दिया कि अपनी मातृभूमि से अगाध प्रेम किसी भी सीमा या बंधन से परे होता है।