ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
आज के दौर में जहां शादियों में महंगी गाड़ियों, भव्य सजावट और दिखावे पर खूब खर्च किया जाता है, वहीं बिहार के नवादा जिले में एक शिक्षक ने अपने निकाह को सादगी और पारंपरिक ग्रामीण संस्कृति से जोड़कर खास बना दिया। यहां दूल्हा अपनी दुल्हन को किसी लग्जरी कार या आधुनिक वाहन से नहीं, बल्कि फूलों से सजी बैलगाड़ी में बैठाकर गांव लेकर आया। इतना ही नहीं, शादी के निमंत्रण कार्ड पर दूल्हा-दुल्हन के नाम की जगह ‘बापू संग कस्तूरबा’ लिखवाया गया। बैलगाड़ी से दुल्हन की विदाई और शादी के कार्ड पर लिखे इस अनोखे संदेश ने लोगों का ध्यान खींच लिया है।
यह अनोखा निकाह नवादा जिले के रोह प्रखंड स्थित मरुई गांव के रहने वाले शिक्षक एहतेशाम रजा का है। 16 अक्टूबर को निकाह के बाद जब वह अपनी पत्नी जाकरा अकील को फूलों से सजी बैलगाड़ी में लेकर गांव पहुंचे, तो उन्हें देखने के लिए ग्रामीणों, परिजनों और विद्यार्थियों समेत सैकड़ों लोग मौजूद थे। दूल्हा-दुल्हन के इस देसी अंदाज को देखकर गांव के लोग भी हैरान रह गए।
निकाह के बाद बैलगाड़ी से गांव पहुंची दुल्हन
आमतौर पर शादी के बाद दूल्हा-दुल्हन महंगी कारों या सजी-धजी गाड़ियों में घर पहुंचते हैं। कई जगह दूल्हे के लिए खास रथ या अन्य भव्य सवारी का इंतजाम भी किया जाता है। लेकिन नवादा के शिक्षक एहतेशाम रजा ने इस परंपरा से हटकर अपनी पत्नी को बैलगाड़ी में घर लाने का फैसला किया। 16 अक्टूबर को निकाह के बाद एहतेशाम अपनी पत्नी जाकरा अकील के साथ फूलों से सजी बैलगाड़ी पर सवार होकर मरुई गांव पहुंचे। एहतेशाम ने सफेद शेरवानी और पारंपरिक पगड़ी पहन रखी थी, जबकि उनकी पत्नी जाकरा लाल जोड़े में सजी हुई थीं। बैलगाड़ी को भी फूलों से सजाया गया था, जिससे यह पूरे गांव में आकर्षण का केंद्र बन गई।
जब यह अनोखी बारात गांव पहुंची, तो ग्रामीणों के साथ-साथ परिजन और उनके विद्यार्थी भी स्वागत के लिए मौजूद थे। आधुनिक दौर में बैलगाड़ी से दुल्हन को घर लाने का यह नजारा लोगों के लिए अलग अनुभव था। गांव में इस अनोखी सवारी को देखने के लिए लोगों की भीड़ जुट गई। हालांकि, एहतेशाम का यह फैसला केवल लोगों को चौंकाने के लिए नहीं था। इसके पीछे उनकी इच्छा पारंपरिक ग्रामीण संस्कृति को फिर से जीवंत करने और अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाए रखने की थी।
शादी के कार्ड पर लिखा ‘बापू संग कस्तूरबा’
एहतेशाम रजा और जाकरा अकील के निकाह में बैलगाड़ी जितनी चर्चा में रही, उतना ही ध्यान उनके शादी के कार्ड ने भी खींचा। आमतौर पर शादी के निमंत्रण पत्र पर दूल्हा-दुल्हन के नाम लिखे जाते हैं, लेकिन इस जोड़े ने अपने कार्ड पर एक अलग ही संदेश छपवाया। कार्ड पर लिखा था ‘बापू संग कस्तूरबा’। इस लाइन को पढ़कर कई लोग हैरान रह गए और इसके पीछे की वजह जानना चाहने लगे। दरअसल, ‘बापू’ महात्मा गांधी के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला लोकप्रिय संबोधन है, जबकि कस्तूरबा गांधी उनकी पत्नी थीं। एहतेशाम ने अपने निकाह के कार्ड पर इन नामों को जगह देकर महात्मा गांधी के प्रति अपनी प्रेरणा और अपनी पत्नी के साथ अपने आत्मीय रिश्ते को व्यक्त किया।
एहतेशाम बताते हैं कि वह महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित हैं। वह अपनी पत्नी जाकरा को प्यार से ‘कस्तूरबा’ कहकर बुलाते हैं, जबकि जाकरा उन्हें ‘बापू’ कहती हैं। दोनों के बीच इस्तेमाल होने वाले इन प्यार भरे संबोधनों को ही उन्होंने शादी के कार्ड पर लिखवाने का फैसला किया। इस तरह शादी का निमंत्रण पत्र केवल एक औपचारिक कार्ड नहीं रहा, बल्कि उनके रिश्ते और विचारों को दर्शाने वाला खास संदेश बन गया। जहां एक ओर बैलगाड़ी ने ग्रामीण परंपरा की याद दिलाई, वहीं ‘बापू संग कस्तूरबा’ ने इस निकाह को एक अलग पहचान दी।
कौन हैं एहतेशाम रजा और जाकरा अकील?
एहतेशाम रजा नवादा जिले के रोह प्रखंड स्थित मरुई गांव के रहने वाले हैं। वह सरसमसुद्दीन मेमोरियल स्कूल, मरुई में शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। उनके पिता का नाम मोहम्मद नैयर है। वहीं, उनकी पत्नी जाकरा अकील नवादा के मुस्लिम रोड निवासी अकिलूज्जमा की पुत्री हैं। जाकरा ने अमृतसर से स्नातक की पढ़ाई पूरी की है और फैशन डिजाइनिंग का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एहतेशाम और जाकरा दोनों की उम्र 22-22 वर्ष है। दोनों ने अपने निकाह को यादगार बनाने के लिए किसी भव्य आयोजन या महंगी सवारी के बजाय पारंपरिक ग्रामीण संस्कृति को प्राथमिकता दी। उनकी शादी में अपनाया गया यह अंदाज अब लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
ग्रामीण संस्कृति से जुड़ाव बनाए रखना चाहते हैं एहतेशाम
एहतेशाम रजा के मुताबिक, बैलगाड़ी से दुल्हन को घर लाने के पीछे उनकी मंशा पुरानी ग्रामीण संस्कृति को फिर से जीवंत करने और अपनी परंपराओं से जुड़े रहने की थी। बैलगाड़ी कभी ग्रामीण जीवन का अहम हिस्सा हुआ करती थी। गांवों में लोगों के आने-जाने और सामान ढोने के लिए इसका व्यापक इस्तेमाल होता था। समय के साथ आधुनिक वाहनों ने इसकी जगह ले ली, लेकिन आज भी बैलगाड़ी ग्रामीण जीवन और पारंपरिक संस्कृति की पहचान मानी जाती है।
ऐसे में एहतेशाम ने अपने निकाह के बाद दुल्हन को बैलगाड़ी से घर लाकर उसी परंपरा को एक बार फिर चर्चा में ला दिया। उनका यह फैसला दिखाता है कि आधुनिकता अपनाने के साथ-साथ अपनी पुरानी परंपराओं को भी याद रखा जा सकता है। उनकी शादी में पारंपरिक पहनावे से लेकर बैलगाड़ी और शादी के कार्ड तक हर चीज में एक खास सोच नजर आई। सफेद शेरवानी और पगड़ी में सजे दूल्हे तथा लाल जोड़े में बैठी दुल्हन का बैलगाड़ी से गांव पहुंचना लोगों के लिए यादगार दृश्य बन गया।
दहेज और फिजूलखर्ची के खिलाफ दिया संदेश
एहतेशाम रजा अपनी शादी के जरिए युवाओं को एक और महत्वपूर्ण संदेश देना चाहते हैं। उनका मानना है कि शादी को दिखावे और खर्च की होड़ में बदलने के बजाय सादगी के साथ मनाया जाना चाहिए। आजकल शादियों में महंगी गाड़ियों, भव्य सजावट, बड़े-बड़े समारोह और दूसरे खर्चों पर काफी पैसा खर्च किया जाता है। कई बार इन आयोजनों के कारण परिवारों पर आर्थिक दबाव भी बढ़ जाता है। ऐसे में एहतेशाम का कहना है कि शादी को यादगार बनाने के लिए महंगी गाड़ियों या भव्य सजावट की जरूरत नहीं होती।
उनके मुताबिक, शादी बिना दहेज और फिजूलखर्ची के भी यादगार बनाई जा सकती है। इसके लिए अच्छे विचार, सादगी और अपनी परंपराओं से जुड़ाव होना जरूरी है। एहतेशाम चाहते हैं कि युवा शादी को सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने का माध्यम बनाने के बजाय इसे दो लोगों के जीवन की नई शुरुआत के रूप में देखें। उनके विचार में शादी की खूबसूरती खर्च की मात्रा से नहीं, बल्कि उसमें शामिल भावनाओं और विचारों से तय होती है।
सादगी, गांधीवादी सोच और देसी अंदाज का मेल
एहतेशाम और जाकरा का निकाह कई वजहों से खास रहा। पहली वजह फूलों से सजी बैलगाड़ी थी, जिसके जरिए दुल्हन को गांव लाया गया। दूसरी वजह शादी के कार्ड पर लिखा ‘बापू संग कस्तूरबा’ संदेश था। वहीं, तीसरी वजह शादी को सादगी, दहेज से दूरी और पारंपरिक ग्रामीण संस्कृति से जोड़ने की उनकी सोच रही। इस अनोखे निकाह में आधुनिकता से अलग हटकर अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देखने को मिला। एहतेशाम ने यह दिखाने की कोशिश की कि किसी समारोह को खास बनाने के लिए जरूरी नहीं कि उसमें बहुत पैसा खर्च किया जाए। कभी-कभी एक साधारण लेकिन विचारपूर्ण पहल भी लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकती है। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर अपनी पत्नी को ‘कस्तूरबा’ और खुद को ‘बापू’ कहने वाला यह जोड़ा अपने अनोखे अंदाज के कारण चर्चा में है। हालांकि, इस शादी की खासियत केवल इसके नाम या बैलगाड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े सादगी और परंपरा के संदेश में भी है।
दिखावे के दौर में पेश की अलग मिसाल
नवादा के शिक्षक एहतेशाम रजा और जाकरा अकील का निकाह इस बात की मिसाल है कि शादी को यादगार बनाने के लिए महंगे इंतजाम हमेशा जरूरी नहीं होते। एक ओर जहां आजकल शादियों में भव्यता और दिखावे पर जोर दिया जाता है, वहीं इस जोड़े ने बैलगाड़ी और एक अनोखे निमंत्रण कार्ड के जरिए अपनी शादी को खास बना दिया।
फूलों से सजी बैलगाड़ी पर दुल्हन को घर लाने का फैसला हो या कार्ड पर ‘बापू संग कस्तूरबा’ लिखवाना, दोनों ही पहल उनकी व्यक्तिगत सोच और पारंपरिक संस्कृति के प्रति लगाव को दर्शाती हैं।
एहतेशाम का संदेश स्पष्ट है शादी को यादगार बनाने के लिए दिखावे और फिजूलखर्ची के बजाय सादगी, अच्छे विचार और परंपराओं से जुड़ाव को महत्व दिया जाना चाहिए। बिहार के नवादा में हुआ यह अनोखा निकाह लोगों को एक बार फिर सोचने का मौका देता है कि क्या शादी की पहचान महंगी गाड़ियों और भव्य सजावट से होनी चाहिए, या फिर एक अच्छी सोच और सादगी भी उसे यादगार बना सकती है?