सर सैयद डे पर फिर याद आया जौन एलिया का कथन-अलीगढ़ के चंद लौंडों की शरारत से बना पाकिस्तान !

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 20-10-2026
On Sir Syed Day, I was once again reminded of a remark by Jaun Elia:
On Sir Syed Day, I was once again reminded of a remark by Jaun Elia: "Pakistan was created by the mischief of a few boys from Aligarh!"

 

मलिक असगर हाशमी

पाकिस्तान के बारे में मशहूर शायर जौन एलिया का एक बयान अक्सर चर्चा में आता है। कहा जाता है कि उन्होंने पाकिस्तान के निर्माण को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कुछ लौंडों  (लड़कों) की शरारत करार दिया था। इस कथन में छिपा व्यंग्य जितना तीखा है, उसका ऐतिहासिक संदर्भ उतना ही दिलचस्प है। आखिर एक शायर ने पाकिस्तान जैसे देश के निर्माण को कुछ युवाओं की शरारत क्यों कहा? और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का नाम इस बहस में बार-बार क्यों उभरता है?

इन सवालों ने एक बार फिर ध्यान खींचा है। वजह इंग्लैंड में आयोजित सर सैयद डे का एक कार्यक्रम है, जहां एक महिला कार्यकर्ता ने जौन एलिया से जोड़े जाने वाले इस कथन का जिक्र किया। कार्यक्रम में मौजूद लोग इस टिप्पणी पर हंस पड़े। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ, जिसमें श्रोताओं की हंसी सुनाई देती है।

दिलचस्प बात यह है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के संस्थापक सर सैयद अहमद खान की जयंती भारत ही नहीं, विदेशों में भी मनाई जाती है। एएमयू के पूर्व छात्र दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इस अवसर पर जुटते हैं। ऐसे ही मौके पर पाकिस्तान में जौन एलिया से जुड़ा यह कथन सामने आना इतिहास, सियासत और शायरी के एक पुराने रिश्ते की याद दिलाता है।

जौन एलिया का तंज और पाकिस्तान का सवाल

जौन एलिया उर्दू के उन शायरों में गिने जाते हैं, जिनकी पहचान केवल उनकी शायरी तक सीमित नहीं रही। अपनी बेबाकी, तल्ख टिप्पणियों और व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले अंदाज के कारण भी वह चर्चित रहे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुआ था। बाद में वह पाकिस्तान चले गए और कराची में रहने लगे।

पाकिस्तान के निर्माण को लेकर उनके नाम से प्रचलित कथन का आशय यह है कि देश बनाने का विचार कुछ लोगों की राजनीतिक शरारत का नतीजा था, लेकिन इसकी कीमत पूरी कौम को चुकानी पड़ी। यह टिप्पणी पाकिस्तान के निर्माण से जुड़े राजनीतिक फैसलों और उनके दूरगामी परिणामों पर एक तीखा व्यंग्य मानी जाती है।

हालांकि, इस कथन के मूल स्रोत और इसके ठीक-ठीक शब्दों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। सोशल मीडिया पर इसके कई रूप प्रचलित हैं। इसलिए इसे जौन एलिया का प्रमाणित शब्दशः उद्धरण मानने के बजाय उनके नाम से प्रचलित कथन के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

इस कथन का महत्व केवल इसकी भाषा में नहीं है। इसके पीछे विभाजन की वह त्रासदी भी है, जिसने लाखों लोगों की जिंदगी बदल दी। 1947 में भारत के विभाजन के साथ एक नया देश पाकिस्तान अस्तित्व में आया। इसके साथ विस्थापन, हिंसा, बिछड़ते परिवारों और नई राष्ट्रीय पहचानों का एक लंबा सिलसिला शुरू हुआ।

जौन एलिया की टिप्पणी को इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है। यह सवाल उठाती है कि राजनीतिक फैसले लेने वाले लोग जिन विचारों और उम्मीदों के साथ आगे बढ़ते हैं, उनके परिणामों का बोझ आखिर किसे उठाना पड़ता है।

अलीगढ़ से पाकिस्तान तक पहुंची राजनीति

पाकिस्तान के निर्माण और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संबंधों की चर्चा कोई नई बात नहीं है। एएमयू का इतिहास आधुनिक मुस्लिम शिक्षा, सामाजिक सुधार और उपमहाद्वीप की राजनीति से गहराई से जुड़ा हुआ है।

सर सैयद अहमद खान ने 1875 में अलीगढ़ में एक शैक्षणिक संस्था की शुरुआत की थी। यह आगे चलकर मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज बना और 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के रूप में स्थापित हुआ। इसका उद्देश्य आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देना और भारतीय मुसलमानों को नए दौर की चुनौतियों के लिए तैयार करना था।

समय के साथ यह संस्थान केवल शिक्षा का केंद्र नहीं रहा। यहां से निकले विद्यार्थियों ने प्रशासन, कानून, साहित्य, पत्रकारिता और राजनीति में भी अपनी पहचान बनाई। इनमें ऐसे लोग शामिल थे, जिन्होंने स्वतंत्र भारत के निर्माण में भूमिका निभाई, और ऐसे भी, जो पाकिस्तान की राजनीति में महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे।

पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान का नाम इस संदर्भ में सबसे प्रमुख है। उन्होंने अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की थी। वह पाकिस्तान के शुरुआती राजनीतिक नेतृत्व के केंद्रीय चेहरों में शामिल हुए और 1947 से 1951 तक देश के प्रधानमंत्री रहे।

इसी तरह पाकिस्तान के दूसरे राष्ट्रपति और सैन्य शासक फील्ड मार्शल अयूब खान ने भी अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज में पढ़ाई की थी। वह 1920 के दशक में इस संस्थान से जुड़े रहे। पाकिस्तान के तीसरे गवर्नर-जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद का नाम भी अलीगढ़ से जुड़े व्यक्तित्वों की चर्चा में आता है।

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इन नामों के कारण एएमयू और पाकिस्तान के शुरुआती राजनीतिक नेतृत्व के संबंधों पर बहस होती रही है। हालांकि, किसी संस्थान से पढ़े हुए व्यक्तियों की राजनीतिक भूमिका को उस संस्थान के सभी विद्यार्थियों या उसके पूरे इतिहास का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मोहम्मद अली जिन्ना एएमयू के छात्र नहीं थे। फिर भी पाकिस्तान आंदोलन के दौरान अलीगढ़ के विद्यार्थियों और इस संस्थान का राजनीतिक महत्व रहा। मुस्लिम लीग की राजनीति में अलीगढ़ के शिक्षित युवाओं की भागीदारी ने इसे एक प्रभावशाली केंद्र बनाया।

क्या अलीगढ़ पाकिस्तान के विचार की जन्मभूमि था?

अलीगढ़ और पाकिस्तान के रिश्ते को समझने के लिए इतिहास को एक ही नारे या एक वाक्य में समेटना मुश्किल है। सर सैयद अहमद खान ने जिस शैक्षणिक आंदोलन की शुरुआत की, उसका मूल उद्देश्य आधुनिक शिक्षा और सामाजिक सुधार था। उनके विचारों और बाद की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच संबंध जरूर रहे, लेकिन सर सैयद के शैक्षणिक मिशन को सीधे पाकिस्तान की स्थापना की योजना के बराबर मानना इतिहास को सरल बनाकर देखने जैसा होगा।

पाकिस्तान का निर्माण कई दशकों में विकसित हुई राजनीतिक परिस्थितियों, औपनिवेशिक शासन, प्रतिनिधित्व की बहस, मुस्लिम लीग की राजनीति, कांग्रेस और लीग के बीच मतभेदों तथा 1940 के दशक की घटनाओं का परिणाम था। अलीगढ़ के कुछ शिक्षित युवाओं ने इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन पाकिस्तान का निर्माण केवल कुछ विद्यार्थियों की शरारत का परिणाम नहीं था।

यहीं जौन एलिया से जुड़ा कथन अपना व्यंग्यात्मक अर्थ ग्रहण करता है। यह इतिहास की पूरी व्याख्या नहीं, बल्कि उसके परिणामों पर एक असंतुष्ट नजरिया है। इसमें उस व्यक्ति की पीड़ा भी पढ़ी जा सकती है, जो विभाजन के बाद बने देश में रहते हुए उसकी राजनीति और सामाजिक परिस्थितियों से निराश था।

जौन एलिया की नाराजगी में छिपा था कौन-सा दर्द?

जौन एलिया के नाम से प्रचलित इस कथन को केवल अलीगढ़ पर तंज मानकर छोड़ देना भी पर्याप्त नहीं है। इसके भीतर विभाजन के बाद की पहचान, राजनीतिक उम्मीदों और राष्ट्रीय जीवन की निराशाओं से जुड़े सवाल छिपे हैं।

जौन एलिया ने अपना जीवन भारत में शुरू किया, लेकिन बाद में पाकिस्तान चले गए। उनकी जिंदगी खुद उस ऐतिहासिक बदलाव की गवाह थी, जिसने सरहद के दोनों ओर रहने वाले लोगों के रिश्तों को बदल दिया। अमरोहा की मिट्टी से कराची तक का उनका सफर केवल एक व्यक्ति का पलायन नहीं था। वह उस दौर की कहानी भी था, जब लाखों लोगों को अपने घर, शहर और पुराने सामाजिक संबंध पीछे छोड़ने पड़े।

पाकिस्तान में रहते हुए वहां की राजनीति, समाज और व्यवस्था को लेकर उनकी तल्खी उनके साहित्य और सार्वजनिक छवि का हिस्सा बनी। उनके नाम से प्रचलित कथन में भी यही असंतोष दिखाई देता है। हालांकि, उनके विचारों को समझने के लिए प्रमाणित लेखन, साक्षात्कार और मूल स्रोतों को देखना जरूरी है। सोशल मीडिया पर साझा होने वाले हर कथन को उनके वास्तविक शब्द मान लेना ठीक नहीं होगा।

आज भी क्यों प्रासंगिक है यह बहस?

पाकिस्तान की राजनीति, लोकतांत्रिक व्यवस्था और सामाजिक विविधता को लेकर आज भी कई तरह की बहसें होती हैं। देश के अलग-अलग प्रांतों और समुदायों की राजनीतिक आकांक्षाएं, नागरिक अधिकारों से जुड़े सवाल और सत्ता के स्वरूप पर विवाद वहां के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। लेकिन इन जटिल समस्याओं को किसी एक संस्थान या कुछ विद्यार्थियों के खाते में डाल देना उचित नहीं होगा।

भारत में भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की ऐतिहासिक भूमिका को लेकर अलग-अलग राजनीतिक नजरिए मौजूद हैं। कोई इसे आधुनिक मुस्लिम शिक्षा और सामाजिक सुधार का बड़ा केंद्र मानता है, तो कोई पाकिस्तान आंदोलन में इससे जुड़े कुछ लोगों की भूमिका को सामने रखता है। दोनों संदर्भों को समझने के लिए इतिहास की पूरी तस्वीर देखना जरूरी है।

सर सैयद अहमद खान की विरासत का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा है। उनका प्रयास था कि समाज आधुनिक ज्ञान हासिल करे और बदलते समय के साथ आगे बढ़े। एएमयू की स्थापना इसी शैक्षणिक सोच से जुड़ी थी। बाद में वहां से निकले लोगों ने अलग-अलग राजनीतिक रास्ते चुने। कुछ पाकिस्तान के निर्माण से जुड़े, जबकि अनेक लोगों ने भारत में रहकर शिक्षा, विज्ञान, साहित्य, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में योगदान दिया।

जौन एलिया के नाम से प्रचलित कथन आज भी लोगों को इसलिए आकर्षित करता है, क्योंकि वह एक बड़े ऐतिहासिक प्रश्न को छोटे और चुभते हुए वाक्य में बदल देता है। लेकिन किसी शायर का तंज इतिहास का अंतिम फैसला नहीं होता। उसे उस दौर की राजनीति, विभाजन की मानवीय कीमत और बाद के अनुभवों के संदर्भ में पढ़ना चाहिए।

पाकिस्तान के निर्माण में अलीगढ़ से जुड़े कुछ विद्यार्थियों और नेताओं की भूमिका इतिहास का हिस्सा है। मगर उस पूरी घटना को कुछ लड़कों की शरारत कहना एक शायर की व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति हो सकती है, इतिहास की संपूर्ण व्याख्या नहीं। यही फर्क समझना जौन एलिया के कथन को सुनने और उसके अर्थ तक पहुंचने के बीच का सबसे जरूरी कदम है।