भक्ति चालक
यह वाकया लगभग सात-आठ महीने पुराना है। मूसलाधार बारिश में छत से पानी की बड़ी-बड़ी बूंदें टपक रही थीं। उस झोपड़ी में 82 साल की वत्सला खोत और उनकी 110 साल की मां कांपती हुई बैठी थीं। उस खौफनाक रात कुदरत के कहर ने उनकी उस झोपड़ी को ज़मीनदोज़ कर दिया। उन मां-बेटी की यह हालत देखकर गांव का मुस्तकीम फारुख नदाफ उस पूरी रात बेचैन रहा।
सुबह उठते ही मुस्तकीम ने अपनी मेहनत की कमाई और दोस्तों की मदद से महज़ कुछ ही दिनों में उन दो बुज़ुर्ग महिलाओं के सिर पर पक्के टीन का शेड खड़ा कर दिया। पंखा, गैस चूल्हा और साल भर का राशन देकर उनका घर फिर से बसा दिया। इस पहली घटना ने सांगली के अष्टा में रहने वाले मुस्तकीम की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। पनी इस पहली मदद की यादों के बारे में बात करते हुए मुस्तकीम कहते हैं, “उन मां-बेटी की मदद करने के बाद उनकी आंखों से जो आंसू छलक पड़े और उन्होंने जो दुआएं दीं... बस, वहीं से समाजसेवा की तरफ मेरा सफर शुरू हो गया। एक कदम आगे बढ़ाओ, तो रास्ता अपने आप मिलता जाता है।”

50 फीसद कमाई का दान
मुस्तकीम का बिज़नेस पुश्तैनी है। साल 1972 में उनके दादा द्वारा शुरू किया गया ‘भारत गादी कारखाना’ आज मुस्तकीम आगे बढ़ा रहे हैं। अपने पिता के दौर के रुई के गद्दे बनाने के इस पुश्तैनी काम में उन्होंने वक्त के साथ बदलाव किए। आज वह सोफा, फैंसी पर्दे और मॉडर्न गद्दे बनाते हैं।
लेकिन उनके इस बिज़नेस की एक बहुत ही खास बात है। मुस्तकीम अपने बिज़नेस से होने वाले कुल मुनाफे का पूरे 50 फीसद हिस्सा ज़रूरतमंद लोगों की मदद के लिए खर्च करते हैं। इस बारे में वह कहते हैं, “गद्दे और सोफे बनाने का हमारा पुश्तैनी काम है। ऊपर वाले ने बिना मांगे ही बहुत कुछ अता किया है, इसलिए मैं अपने बिज़नेस की 50 फीसद कमाई रोज़ाना की समाजसेवा के लिए अलग निकाल कर रख देता हूं।”
एक दिन की बच्ची को लिया गोद
मुस्तकीम की निजी ज़िंदगी में अचानक बड़ी उथल-पुथल हो गई। अपनी पत्नी से अलग होने के फैसले के बाद, वह टूटे नहीं बल्कि अपने दोनों बच्चों की परवरिश की पूरी ज़िम्मेदारी खुद अपने कंधों पर ले ली। मुस्तकीम का पहले से ही एक बेटा था। लेकिन उनकी बहन को लगातार चौथी बेटी होने पर, मुस्तकीम ने एक बहुत ही जज़्बाती फैसला लिया। जब वह बच्ची महज़ एक दिन की थी, तब उन्होंने उसे गोद ले लिया और अपनी सगी बेटी की तरह उसकी परवरिश शुरू कर दी।
अपने इस फैसले पर मुस्तकीम कहते हैं, “मैंने एक पल की भी सोचे बिना उस बच्ची को गोद ले लिया। मैंने उसके माता-पिता की ज़िम्मेदारी कुबूल कर ली... वह एक दिन की थी तब से मेरे पास आई है और अब मैं ही उसकी परवरिश करता हूं।”
ग़रीबों की 'मदद का कंटेंट'
आजकल नौजवान सोशल मीडिया पर मशहूर होने या व्यूज़ पाने के लिए अलग-अलग रील्स बनाते हैं। मुस्तकीम ने भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया, लेकिन उनका मक़सद बिल्कुल अलग था। एक दिन रास्ते से गुज़रते हुए उनके छोटे बेटे ने एक दिव्यांग शख्स की मदद करने की ख्वाइश ज़ाहिर की। उस वाकये ने मुस्तकीम के दिमाग में एक नया आईडिया डाल दिया। उन्होंने सोचा कि अकेले मदद करने के बजाय अगर इस वीडियो को लोगों तक पहुंचाया जाए, तो इससे होने वाली कमाई और लोगों की मदद से हज़ारों ग़रीबों का भला हो सकता है।
सोशल मीडिया के इस सफर के बारे में बात करते हुए मुस्तकीम कहते हैं, “वीडियो बनाकर सिर्फ ग़रीबों की हालत दिखाने का क्या फायदा? इसके बजाय उसी सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके पैसे कमाना और उन्हीं पैसों को वापस इन ज़रूरतमंद लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए इस्तेमाल करना, यही मेरा असली प्लान था।”

हर महीने की तारीख पर राशन हाज़िर!
मुस्तकीम की समाजसेवा किसी एक त्योहार या खास मौके तक महदूद नहीं है। उन्होंने अपने गांव और आसपास के इलाकों के बेसहारा, दिव्यांग और बेहद ग़रीब परिवारों की एक लिस्ट बना रखी है। हर महीने की तय तारीख पर वह खुद उनके घर जाकर पूरे महीने का राशन, गैस सिलेंडर और बाकी ज़रूरी चीज़ें पहुंचाते हैं। किसी को व्हीलचेयर चाहिए हो, किसी को ट्राईसाइकिल चाहिए हो, या किसी के घर की मरम्मत करवानी हो, मुस्तकीम वहां मौजूद रहते हैं। सबसे अहम बात यह है कि मदद करते वक्त वह कभी भी सामने वाले का धर्म या जात नहीं देखते। अपने काम करने के इस तरीके के बारे में वह बताते हैं, “मैं पहले खुद जाकर सर्वे करता हूं कि क्या वाकई उस शख्स को मदद की ज़रूरत है? फिर हर महीने की तारीख लिखकर रखी होती है। उस तारीख पर राशन, गैस या जो भी चीज़ चाहिए होती है, मैं खुद पहुंचाता हूं।”

“ग़रीबी और बीमारी का कोई धर्म नहीं होता…”
हमारे समाज में आजकल धर्म और जात-पात के नाम पर हो रही सियासत देखकर मुस्तकीम को बहुत दुख होता है। उनका मानना है कि इंसान जब पैदा होता है, तब उस पर धर्म का टैग लगा दिया जाता है। लेकिन कुदरत के दरबार में सब एक ही हैं। इंसानियत के इसी इकलौते धर्म पर यकीन रखकर काम करने वाले मुस्तकीम बहुत ही सीधे और आसान लफ्ज़ों में कहते हैं, “ग़रीबी या बीमारी कभी हिंदू या मुस्लिम देखकर नहीं आती। मैं एक मुस्लिम घर में पैदा हुआ इसलिए मुस्लिम हो गया, आप एक हिंदू घर में पैदा हुए इसलिए हिंदू हो गए।
लेकिन सबसे बड़ा मज़हब इंसानियत ही है। अगर हम सब अपनी गली के सिर्फ एक ग़रीब को भी संभाल लें, तो सड़क पर भीख मांगने वाला कोई नज़र नहीं आएगा।” दुनिया बदलने के लिए किसी बड़े बजट या ओहदे की ज़रूरत नहीं होती, यह बात मुस्तकीम ने अपने काम से साबित कर दी है। समाज को बेहतर बनाने के लिए बस एक नेक इरादे की ज़रूरत होती है।