सहारनपुर में मस्जिद गिराए जाने पर महमूद मदनी ने उठाए सवाल

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 07-09-2026
Mahmood Madani raises questions over the demolition of a mosque in Saharanpur.
Mahmood Madani raises questions over the demolition of a mosque in Saharanpur.

 

नई दिल्ली।

जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में करीब एक सदी पुरानी मस्जिद को गिराए जाने की कड़ी निंदा की है। उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई को न्याय और कानूनी प्रक्रिया के बुनियादी सिद्धांतों के लिए गंभीर झटका बताया।

मौलाना मदनी ने कहा कि जिस तरीके से मस्जिद को गिराया गया, उससे प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उनके अनुसार, विवादित जमीन कलेक्ट्रेट परिसर से संबंधित थी। ऐसे में प्रशासन और मजिस्ट्रेट स्वयं इस मामले में एक पक्ष की भूमिका में थे।

उन्होंने कहा कि कानून का एक सर्वमान्य सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति या संस्था अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकती। ऐसे मामले में एकतरफा कार्रवाई को न्याय के मूल सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन माना जाना चाहिए।

अदालत के आदेश को लेकर उठाया सवाल

मौलाना मदनी ने कहा कि 4 सितंबर को निचली अदालत की ओर से जारी आदेश में मस्जिद को तत्काल गिराने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था। इसके बावजूद कुछ ही घंटों के भीतर प्रशासन ने रात में मस्जिद को ध्वस्त कर दिया।

उन्होंने आरोप लगाया कि संबंधित पक्ष को कानूनी उपाय अपनाने के लिए पर्याप्त समय तक नहीं दिया गया। यहां तक कि उसे अदालत के आदेश की प्रमाणित प्रति हासिल करने का अवसर भी नहीं मिला।

मौलाना मदनी ने कहा कि निचली अदालत का फैसला अंतिम नहीं माना जा सकता, क्योंकि कानून में उच्च न्यायालय और अन्य उच्च न्यायिक संस्थाओं के समक्ष अपील और राहत मांगने का रास्ता मौजूद है।

उन्होंने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को न्याय के लिए उच्च अदालतों का दरवाजा खटखटाने का अधिकार देता है। जब किसी कार्रवाई से ऐसी क्षति हो सकती हो जिसकी भरपाई संभव न हो, तब प्रभावित पक्ष को न्यायिक हस्तक्षेप का उचित अवसर दिए बिना कार्रवाई करना गंभीर चिंता का विषय है।

‘कार्रवाई में दिखाई गई असाधारण जल्दबाजी’

जमीयत उलेमा ए हिंद अध्यक्ष ने मस्जिद गिराने में दिखाई गई कथित जल्दबाजी पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कार्रवाई इतनी तेजी से की गई कि प्रभावित पक्ष के पास उच्च न्यायालय से राहत मांगने का लगभग कोई अवसर ही नहीं बचा।

मौलाना मदनी ने कहा कि जब किसी प्रशासनिक कार्रवाई के परिणाम वापस नहीं लिए जा सकते, तब अधिकारियों की पहली जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना होती है कि कानून की उचित प्रक्रिया का पालन हो। ऐसी स्थिति में जल्दबाजी के बजाय प्रभावित पक्ष को कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करने का पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि प्रशासनिक अधिकारों का इस्तेमाल कानून और न्याय के दायरे में रहकर होना चाहिए। किसी भी कार्रवाई में प्राकृतिक न्याय और उचित प्रक्रिया के सिद्धांतों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।

हाई कोर्ट जाने की अपील

मौलाना मदनी ने मस्जिद की कमेटी और उसके कानूनी सलाहकारों से बिना देरी किए हाई कोर्ट का रुख करने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रशासन की कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा होनी चाहिए और मामले में कानून का शासन सर्वोपरि रहना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सरकारी अधिकारियों को मिले अधिकारों का इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक निर्णय भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं।

‘सामाजिक और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा जरूरी’

मौलाना मदनी ने व्यापक अपील करते हुए न्याय, संवैधानिक मूल्यों और सांप्रदायिक सौहार्द में विश्वास रखने वाले सभी वर्गों से ऐसी घटनाओं के खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में अगर मनमानी कार्रवाई का सिलसिला जारी रहता है और उसे चुनौती नहीं दी जाती, तो इसका असर समाज पर भी पड़ सकता है।

उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी घटनाओं को अलग अलग मामलों के तौर पर देखने के बजाय उनके व्यापक प्रभाव पर भी विचार किया जाना चाहिए। इस तरह की कार्रवाइयों से सामाजिक विभाजन गहरा हो सकता है और देश के साझा सामाजिक तथा संवैधानिक मूल्यों को नुकसान पहुंच सकता है।

मौलाना मदनी ने कहा कि देश में कानून का शासन, न्याय की समानता और सांप्रदायिक सद्भाव लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद हैं। इन मूल्यों की रक्षा प्रशासन, न्यायपालिका और समाज के सभी वर्गों की साझा जिम्मेदारी है।