आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कहा है कि न्यायिक समीक्षा को न्यायपालिका की सर्वोच्चता के रूप में नहीं, बल्कि संविधान के प्रति उस जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब संवैधानिक संस्थाएं अपनी निर्धारित सीमाओं के भीतर काम करने में विफल हों, तब कानून का शासन कायम रहे।
उन्होंने कहा, “यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि न्यायिक समीक्षा की यह व्यापक शक्ति भारत के संवैधानिक लोकतंत्र की नीव है। यह इस सिद्धांत की पुष्टि करती है कि सरकार की किसी भी शक्ति के प्रयोग के लिए वैधता और संवैधानिकता अनिवार्य पूर्व शर्त हैं।”
प्रधान न्यायाधीश ने ये विचार सोमवार को स्टॉकहोम में ‘इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस’ (आईडीईए) के सम्मेलन को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। सम्मेलन का विषय था ‘कानून के शासन की रक्षा : भारत और स्वीडन के अनुभव।’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कानून का शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक लोकतंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने कहा कि न्यायिक समीक्षा केवल न्यायालयों की शक्ति नहीं, बल्कि संविधान द्वारा उन्हें सौंपी गई जिम्मेदारी है।