एक भी मुस्लिम घर नहीं, फिर भी महाराष्ट्र के इस गांव में ज़िंदा है मोहर्रम की रवायत

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 26-06-2026
Not a single Muslim household, yet the tradition of Muharram lives on in this Maharashtra village.
Not a single Muslim household, yet the tradition of Muharram lives on in this Maharashtra village.

 

भक्ति चालक

मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है। इसके पहले 10 दिनों में कर्बला का वाकया हुआ था, जिसमें पैगंबर मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके परिवार को शहीद कर दिया गया था। इसीलिए यह वक्त मातम यानी दुख का माना जाता है। खास तौर पर शिया समाज में मोहर्रम के दसवें दिन आशूरा का मातम करने की रवायत है। भारत में, खासकर महाराष्ट्र में, सुन्नी मुसलमान भी रिवायती तरीके से मोहर्रम का एहतमाम करते हैं। लेकिन महाराष्ट्र के मोहर्रम की सबसे खास बात यह है कि इसमें हिंदू समाज भी बड़ी तादाद में हिस्सा लेता है।

महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में तो हिंदू-मुस्लिम समाज सैकड़ों सालों से साथ मिलकर मोहर्रम का एहतमाम करता आ रहा है। लेकिन महाराष्ट्र में एक ऐसा गांव भी है जहां एक भी मुसलमान नहीं रहता, फिर भी वहां रामोशी (बेरड) समाज की तरफ से मोहर्रम का एहतमाम किया जाता है। यह गांव है बेरडवाड़ी (भुसणीवाड़ी), जहां के लोग पहले क्रांतिकारी उमाजी नाईक और मराठा साम्राज्य के खुफिया प्रमुख बहिर्जी नाईक की बहादुरी की विरासत अपनी रगों में लिए हुए हैं!

तारीख में अपनी बहादुरी के लिए मशहूर रामोशी समाज की इस बस्ती की असली पहचान यह है कि यहां एक भी मुस्लिम घर नहीं है, फिर भी पीढ़ियों से मोहर्रम का एक बड़ी रवायत की तरह एहतमाम किया जाता है। यह मौका कई सालों से गांव वालों की मिली-जुली तहज़ीब का हिस्सा बन गया है।

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मस्जिद नहीं, फिर भी गूंजता है इमाम साहब का नाम!

भुसणी-भुसणीवाड़ी ग्रुप ग्राम पंचायत के तहत आने वाले इस गांव में बरसों से एक अलग ही रवायत देखने को मिलती है। मोहर्रम के दौरान पूरा गांव बारह इमाम और कासिम इमाम साहब की अकीदत में डूब जाता है। खास बात यह है कि पीर की पूजा की रस्में सही तरीके से हों, इसके लिए पड़ोस के गांव से मुस्लिम मुजावरों को पूरे एहतराम के साथ बुलाया जाता है।

उनके हाथों से इस्लामी तरीके से रस्में पूरी कराई जाती हैं। गांव के नौजवान इकट्ठा होकर 'करबल' का खेल खेलते हैं। रवायतों का मान रखते हुए भाईचारे का यह पैगाम वाकई काबिले तारीफ है।

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मोहर्रम के साथ सामाजिक बदलाव की पहल

रामोशी समाज की तारीख हमेशा नाइंसाफी के खिलाफ लड़ने और बहादुरी की रही है। इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए भुसणीवाड़ी के गांव वालों ने इस मौके को सामाजिक बेदारी से जोड़ दिया है। मोहर्रम के मौके पर गांव में समाज की भलाई के लिए कई काम किए जाते हैं। ब्लड डोनेशन कैंप लगाए जाते हैं ताकि ज़रूरतमंद मरीज़ों की मदद की जा सके। समाज को जागरूक करने वाले गीत गाए जाते हैं और लोक नृत्य होते हैं। नाटकों के ज़रिए अलग-अलग सामाजिक मुद्दों पर सीधी बात की जाती है।

मोहर्रम के इन दिनों में गांव में बहुत ही प्यारा और सुकून भरा माहौल होता है। सभी परिवार एक साथ आते हैं और महाप्रसाद का इंतज़ाम किया जाता है। नौकरी और रोज़गार के लिए मुंबई-पुणे जैसे बड़े शहरों में गए हुए नौजवान भी इस वक्त खास तौर पर गांव लौट आते हैं। इस वजह से पूरी बेरडवाड़ी में एक बड़े पारिवारिक जुड़ाव का माहौल नज़र आता है।

इस मोहर्रम के कई वीडियो आजकल सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहे हैं। बेरडवाड़ी के एक नौजवान उमेश भोकले ने इस अनोखी रवायत के रोज़ाना के वीडियो अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किए हैं। 'आवाज़-द-वॉयस' से बात करते हुए उमेश ने बताया, "इस पुरानी रवायत को आज के दौर से जोड़ने के लिए मैंने हर दिन का वीडियो बनाया और उसे अपने इंस्टा पर शेयर किया। लाखों लोगों ने इसे शेयर किया और लोगों के बहुत ही अच्छे रिएक्शन भी आए।"

उमेश आगे कहते हैं, "गांव में एक भी मुस्लिम नहीं है, फिर भी मेरे गांव ने इस रवायत को आज भी ज़िंदा रखा है, मुझे इस बात पर बहुत फख्र है। और हमारी पीढ़ी भी इस रवायत को ऐसे ही आगे लेकर जाएगी।"इस अनोखी रवायत के बारे में बात करते हुए बेरडवाड़ी के रहने वाले और श्री षण्मुखेश्वर विद्यालय के स्पोर्ट्स टीचर अंकुश मंडले दिल से कहते हैं, "हमारी बेरडवाड़ी का यह मोहर्रम हमारे गांव की एकता की ताकत है।

आज़ादी से पहले के वक्त से हमारे बुज़ुर्ग इस रवायत को निभाते आए हैं, और आज हम इसे आगे ले जा रहे हैं। हमारे गांव में जात-पात और भेदभाव के लिए ज़रा भी जगह नहीं है। हम मानते हैं कि सबके लिए ऊपर वाला एक ही है, इसी भावना से हम सब एक साथ आते हैं। बारह इमाम और कासिम इमाम साहब पर इस गांव की गहरी अकीदत है।"

गांव के उपसरपंच दशरथ मंडले ने गांव की पहचान बताते हुए कहा, "असल में हमारे गांव के तीन नाम हैं। लोग इसे अनंतपुर, भुसणीवाड़ी और बेरडवाड़ी के नाम से जानते हैं। इस गांव में मोहर्रम की वजह से आपसी प्यार और भाईचारा और भी बढ़ गया है। गांव में एक भी मुस्लिम घर नहीं है, फिर भी सभी समाज के लोग एक साथ आकर पीर बाबा के मोहर्रम का एहतमाम करते हैं, यही हमारे गांव की असली पहचान है।पीढ़ियों से चली आ रही यह रवायत हमारे गांव का फख्र है।"

राजस्व सेवक शिवशंकर मंडले ने बताया कि, "बारह इमाम और कासिम इमाम साहब हमारे गांव की आस्था का सबसे बड़ा मरकज़ हैं। गांव का कोई भी शख्स किसी अच्छे या ज़रूरी काम के लिए घर से बाहर निकलता है, तो सबसे पहले इमाम साहब का नाम लेता है, उन्हें याद करता है। हमारी यह अकीदत है कि उनकी मेहरबानी से हर काम कामयाब होता है। मोहर्रम के मौके पर शहर गए हुए सभी लोग घर लौट आते हैं। इसलिए मोहर्रम का यह मौका हमारे लिए जज़्बाती और सांस्कृतिक एकता की पहचान बन गया है।"

तारीख बहादुरी की हो या भाईचारे की, भुसणीवाड़ी ने हमेशा अपनी एक शानदार मिसाल कायम रखी है। एक भी मुस्लिम घर न होने के बावजूद, इस्लाम की पाकीज़ा रवायतों का एहतराम करते हुए एहतमाम किया जाने वाला यह मोहर्रम आज की पीढ़ी के लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा है। बंटे हुए समाज को एक साथ लाने वाली यह रवायत सही मायनों में महाराष्ट्र की मिली-जुली तहज़ीब की सबसे बड़ी दौलत है।