तुर्किए ने छीना मुस्लिम दुनिया का आर्थिक ताज

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 30-06-2026
Türkiye emerges as the biggest power, leaving Indonesia and Saudi Arabia behind.
Türkiye emerges as the biggest power, leaving Indonesia and Saudi Arabia behind.

 

गुलाम कादिर 

पश्चिम एशिया में चल रही भारी तनातनी अब शांत हो रही है। ईरान, अमेरिका, इजरायल और लेबनान के बीच समझौते की खबरें आ रही हैं। इस शांति के माहौल के बीच आर्थिक मोर्चे से एक हैरान करने वाली खबर आई है। इस खबर ने पूरी दुनिया के आर्थिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। मुस्लिम जगत की अर्थव्यवस्था में एक बहुत बड़ा उलटफेर हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ के नए आंकड़ों के अनुसार तुर्किए दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया है।

इस रेस में उसने सालों से पहले नंबर पर काबिज इंडोनेशिया को पीछे छोड़ दिया है। सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात यह है कि ताकतवर सऊदी अरब अब तीसरे नंबर पर खिसक गया है। इस बड़े बदलाव के बाद अब इसके कारणों को लेकर दुनिया भर में मंथन शुरू हो गया है।
 
विशेषज्ञ इस बदलाव को महज एक संयोग नहीं मान रहे हैं। इसके पीछे गहरी भूराजनीति और बदलते वैश्विक समीकरण काम कर रहे हैं। सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या सऊदी अरब को यह झटका ईरान और अमेरिका के बीच उपजे तनाव के कारण लगा है।
 
इस क्षेत्र में हुए हमलों और अशांति ने क्या सऊदी अरब की साख को नुकसान पहुंचाया है। वैश्विक बाजार में उसकी निर्भरता और तेल पर टिकी अर्थव्यवस्था के कारण यह गिरावट देखने को मिली है। आइए इस पूरे आर्थिक घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।
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तुर्किए की लंबी छलांग और ट्रिलियन डॉलर क्लब का नया गणित

इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है जब तुर्किए ने आधिकारिक तौर पर इंडोनेशिया और सऊदी अरब दोनों को जीडीपी के मामले में पछाड़ दिया है। यह बदलाव इतना बड़ा है कि इसे मुस्लिम जगत की आर्थिक संरचना में एक नया मोड़ माना जा रहा है। आईएमएफ के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक तुर्किए की नॉमिनल जीडीपी 1.64 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंच गई है। इसके साथ ही वह पहले स्थान पर मजबूती से खड़ा है।  
 
सालों तक इस लिस्ट में शीर्ष पर रहने वाला इंडोनेशिया अब दूसरे स्थान पर आ गया है। इंडोनेशिया की जीडीपी 1.54 ट्रिलियन डॉलर दर्ज की गई है। वहीं दुनिया भर के तेल बाजारों को नियंत्रित करने वाला सऊदी अरब अब 1.39 ट्रिलियन डॉलर के साथ तीसरे स्थान पर है। पूरे मुस्लिम जगत में केवल यही तीन देश ऐसे हैं जो एक ट्रिलियन डॉलर से बड़ी अर्थव्यवस्था की श्रेणी में आते हैं।
 
इनके बाद संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई 622 बिलियन डॉलर के साथ चौथे स्थान पर है। वहीं दक्षिण पूर्व एशिया का प्रमुख देश मलेशिया 516 बिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ पांचवें नंबर पर बना हुआ है।  
 
सऊदी अरब की साख को कैसे लगी चोट

इस पूरे उलटफेर में सऊदी अरब का तीसरे नंबर पर जाना सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है। जानकारों का मानना है कि हाल के दिनों में खाड़ी क्षेत्र में जो तनाव रहा, उसका सीधा असर सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है।
 
ईरान और अमेरिका के बीच चल रही जंग जैसी स्थिति और क्षेत्रीय अस्थिरता ने सऊदी अरब के तेल उत्पादन और उसकी सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया। तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव और वैश्विक स्तर पर कमोडिटी मार्केट की अनिश्चितता ने उसकी रफ्तार को धीमा किया।
 
सऊदी अरब अपनी महत्वाकांक्षी योजना विजन 2030 के जरिए गैर-तेल क्षेत्रों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। इसके बावजूद उसकी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अब भी ऊर्जा निर्यात पर निर्भर है। जब भी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, इसका सीधा नुकसान निवेशकों के भरोसे को होता है। विश्लेषकों का कहना है कि सुरक्षा चिंताओं और बार-बार होने वाले भूराजनीतिक विवादों ने सऊदी अरब की आर्थिक विश्वसनीयता को प्रभावित किया है। इसी का नतीजा है कि वह तुर्किए और इंडोनेशिया से पीछे रह गया।
तुर्किए की सफलता का असली राज क्या है

तुर्किए की इस अप्रत्याशित कामयाबी के पीछे उसकी मजबूत औद्योगिक क्षमता को माना जा रहा है। तुर्किए की अर्थव्यवस्था केवल कच्चे तेल या प्राकृतिक संसाधनों के भरोसे नहीं चलती। उसकी ताकत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, कपड़ा उद्योग, भारी मशीनरी और मजबूत निर्यात क्षमता में छिपी है। इसके साथ ही कोरोना महामारी के बाद से उसके पर्यटन क्षेत्र में आई बूम ने जीडीपी को बड़ा सहारा दिया है।
 
तुर्किए की भौगोलिक स्थिति भी उसके लिए एक बड़ा वरदान है। यह देश यूरोप और एशिया को आपस में जोड़ता है। इस वजह से इस्तांबुल एक बहुत बड़ा ग्लोबल लॉजिस्टिक्स और फाइनेंशियल हब बन चुका है।
 
विश्लेषकों के अनुसार तुर्किए की विविधतापूर्ण अर्थव्यवस्था ने उसे बाहरी झटकों को सहने की ताकत दी। जहां खाड़ी के देश तेल की कीमतों पर निर्भर रहे, वहीं तुर्किए अपने मजबूत उद्योगों के दम पर आगे बढ़ता रहा। आईएमएफ ने पहले ही संकेत दिए थे कि तुर्किए की विकास दर इस साल शानदार रहने वाली है और आंकड़े इसी बात की तस्दीक कर रहे हैं।
 
इंडोनेशिया और मलेशिया का बढ़ता आर्थिक दायरा

इस पूरी रिपोर्ट में इंडोनेशिया भले ही दूसरे स्थान पर आ गया हो, लेकिन उसकी ताकत को कम नहीं आंका जा सकता। लगभग 27 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाला यह देश मुस्लिम जगत का सबसे बड़ा बाजार है। इंडोनेशिया की घरेलू खपत इतनी मजबूत है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को मंदी से बचाए रखता है। इंडोनेशिया डिजिटल सेवाओं, खनन, कृषि और मैन्युफैक्चरिंग में लगातार निवेश बढ़ा रहा है।
 
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इंडोनेशिया और मलेशिया मिलकर पूरी दुनिया में हलाल इकोनॉमी का नेतृत्व कर रहे हैं। हलाल फूड, इस्लामिक फाइनेंस, मॉडस्ट फैशन और हलाल टूरिज्म के मामले में इन दोनों देशों का कोई मुकाबला नहीं है।
 
जकार्ता और कुआलालंपुर जैसे शहर वैश्विक मुस्लिम उपभोक्ता बाजार को नई दिशा दे रहे हैं। मलेशिया की बात करें तो वह एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों के निर्यात में एक बड़ा नाम बन चुका है। वहां का इस्लामिक बैंकिंग सिस्टम दुनिया में सबसे ज्यादा विकसित माना जाता है।
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दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व के अन्य प्रमुख खिलाड़ी

शीर्ष पांच देशों के बाद अगर हम निचले पायदानों पर नजर डालें तो वहां भी दिलचस्प मुकाबला है। दुनिया भर के प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद ईरान आठवें स्थान पर है। ईरान की जीडीपी 450 बिलियन डॉलर के करीब है। उसके पास मौजूद विशाल ऊर्जा संसाधन और बड़ा घरेलू बाजार उसे इस सूची में बनाए रखने में मदद करता है।
 
मिस्र 380 बिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ उत्तरी अफ्रीका और अरब दुनिया का एक और प्रमुख केंद्र है। स्वेज नहर से होने वाली कमाई और पर्यटन मिस्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। वहीं 24 करोड़ से अधिक आबादी वाला पाकिस्तान 370 बिलियन डॉलर के साथ दसवें स्थान पर है। पाकिस्तान के पास खेती और बड़े बुनियादी ढांचे के कारण भविष्य में आगे बढ़ने की काफी संभावनाएं मौजूद हैं।
 
बदलते वैश्विक परिदृश्य में नया संदेश

मुस्लिम देशों की अर्थव्यवस्था के ये आंकड़े साफ बताते हैं कि अब दुनिया में सिर्फ तेल की ताकत के दम पर नंबर वन नहीं बना रहा जा सकता। आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए उद्योगों का विकास, तकनीक को अपनाना और बाजार में विविधता लाना बेहद जरूरी है। तुर्किए ने अपनी नीतियों से यही साबित किया है।
 
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बादल छंटने के बाद अब इन देशों का पूरा ध्यान अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने पर होगा। सऊदी अरब के लिए यह एक वेक-अप कॉल की तरह है। उसे अपनी सुरक्षा और आर्थिक नीतियों को और ज्यादा मजबूत करना होगा। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सऊदी अरब अपनी खोई हुई पोजीशन वापस पा पाता है या तुर्किए अपनी इस बादशाहत को बरकरार रखता है।